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सुरक्षा खोखली,देश खोखला !

कुछ साल पहले मैंने अपने इस ब्लॉग पर एक लेख में बताया था कि किस तरह हमारी सेनायें हथियारों की कमी से जूझ रही है, उनके पास उन्नत किस्म के हथियार और यंत्र-उपकरण की भारी कमी महसूस की जा रही  है ! सेना में कुशल अधिकारियों की निरंतर कमी बनी हुई है, शिक्षित और कुशल युवाओं का नित इस पेशे से मोह भंग हो रहा है ! आज आख़िरकार सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह की प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी ने उन बातों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है ! यही लगता है कि सत्ता में बैठे लोग देशवासियों को बेवकूफ बनाने के लिए रक्षा जरूरतों के नाम पर बड़े-बड़े प्रावधान बजटों में दिखाकर उस राशि को कहीं अन्यत्र खर्च कर रहे है ! मंत्री से लेकर संतरी तक सारे ईमानदार लोग सरकार में बैठे बुढापे के मजे लूट रहे है ! लेकिन कोई यह पूछने और बताने वाला नहीं है कि जब देश आज दुनिया के तमाम देशों के मुकाबले सबसे बड़े हथियार आयातकों की श्रेणी में शीर्ष पर खडा है, तो आखिरकार वे हथियार हैं कहा जिनका आयात हो रहा है ? साथ ही पिछले कुछ सालों में समय-समय पर यह आशंका भी व्यक्त की जाती रही है कि बाहरी ताक...

तरक्की की अधोगति

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धन-शोहरत की चकाचौंध को शहर कहते है लोग !

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इस माह के द्वितीय सप्ताह में, किसी काम से दक्षिण को जाते हुए एक दिन के लिए मुंबई में रुका था ! मुंबई में गंतव्य की ओर बढ़ते हुए टैक्सी की पिछली सीट पर खामोश बैठा उस शहर को बस यूँ ही बारीकी से निहार रहा था, तो सहसा उर्दू के मशहूर शायर अखलाक़ मौहम्मद खान 'शहरयार' , जिनका गत माह ७६ साल की उम्र में निधन हो गया था, और जिन्होंने आम आदमी के जीवन से जुड़ी तल्ख हकीकत को बड़ी सादगी से अपने गीतों में शब्द दिए, उनकी वे पंक्तियाँ " ...इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है..." बरबस याद आ गई! उनकी इन पंक्तियों को ही गुनगुना रहा था कि अचानक अपने शहर के लिए भी बस यूं ही गजल की दो लाइने बन पडी और मैंने उन्हें उसी वक्त अपने मोबाइल फोन में टाईप कर संचित कर लिया था! कल जब उस पर फिर से नजर गई तो जो चंद और लाइने बन पडी, आपकी खिदमत में पेश है ; उजले हैं वसन, सुनहरे बदन, दिल काला क्यों है, यहाँ हर शख्स के मुंह पे पडा ये ताला क्यों है। धन-शोहरत की चकाचौंध को शहर कहते है लोग, शठ-शैतानो के ही महलों में मगर उजाला क्यों है। सीने में कपट, निगाहों में हवस लिए फिरते हैं, चोरी के माल ...

कार्टून कुछ बोलता है- गरीबी रेखा !

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नए मानक गरीबी के : शहरों में : रु० २८.६५ प्रतिदिन गाँवों में:   रु० २२.४४ प्रतिदिन  चित्र संकलन नेट से साभार !

हद-ऐ-हठ !

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Good Bye Falak !

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You have chosen sacred silence, no one will miss you, no one will hear your cries. No one will come to put roses on your grave with choked voice and flood in eyes. Butcher's door will remain open, for your such a fiendish bastard dad. There's nothing more depressing than having it all and still feeling sad. You got a helpless and cruel mom, don't know, why do you have so much bad luck. Now you have left for a better world, may your soul rest in eternal peace, good bye Falak !!

कार्टून कुछ बोलता है- आगाज ऐसा तो अंजाम कैसा ?

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खैर, रुत्तड गर्देश की सलामती की दुआओं संग आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाये ! . .