अजीब सी पशोपेश मे हूँ, मैं इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ? इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ। हो क़दरदान तुम बहुत, गुल़रुखों के नगमा-ए-साज के, तारों भरी रात, नयनोँ मे बरसात, धुन कौन सी बजाऊँ? अजीब सी पशोपेश मे हूँ, मैं इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ? इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ।। अजीबोग़रीब अफ़साने हैं, इस मुक्त़सर सी जिंदगी के, लबों पे कबतक लिए फिरूँ, क्यों न कागज़ पर उतर जाऊँ? अजीब सी पशोपेश मे हूँ, इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ? इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ।। थे अबतक हम भी खामोश तेरी खामोशी को देखकर, हमें महफिलों की शान नहीं बनना, सिर्फ़ बात तुम्हें दिल की बता पाऊँ। अजीब सी पशोपेश मे हूँ, इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ? इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ।।