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फुलदेई..

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जनि प्यारी बेट्ळौंन तख 'फूलदेई' सुबेरी-सुबेर कै तेरी देळी मा, वनि, 'फुलदेई' की खबर पौंछी यख टीवी परै, मेरी 'देहळी' मा। फूल मेट्या, फूल जनि बेट्ळौंन सग्वाडि, पुंग्डी, बौण बिटीकी, नांगि खुट्यौंन, सुबेरी-सुबेर, चसा पाळा, ह्यूं  मा हिटीकी। जसिलो ब़िंसरी घाम पौंछी, डा़ंंडी, पांखी, गद्वारी, भेळी मा, वनि, 'फुलदेई' की खबर पौंछी यख टीवी परै, मेरी 'देहळी' मा।

खलिश..

जब वो, दर्द-ऐ-दिल अपना,  शब्दों मे न समेट पाया तो कमबख़्त, आंसू बनके उसकी आँखों से छलक आया।

जम़ाना...

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  जिसदिन से तरसीम ऊपर गया मिरी शख़्सियत और हैसियत का, ख़्याल सताने लगा है जमाने को,  मिरी खै़रियत और  कैफि़यत का। तरसीम/तर्सीम= लेखाचित्र(graph)

ऐ जिंदगी...

ऐ जिंदगी, तू मेरे घर मत आना... अकेला ही रहता हूँ, हर गम अकेले ही सहता हूँ, दिनभर दौड-धूप का मारा,  दुनियांं से थका हारा, साफ-सफाई का मोहताज..... पसंद नहीं आएगा तुझको, ये मेरा कबाड़खाना। ऐ जिंदगी, तू मेरे घर मत आना... यही काफी है मेरे लिए कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ, हर गम-ओ-खुशी तेरे दरमियाँ से गुजरता हूँ, मगर रूठे जो तू कभी... तो फिर मनाने को , दे न पाऊंगा तुझको मैं दिल का कोई नज़राना । ऐ जिंदगी, तू मेरे घर मत आना...

तलब

  बयां हरबात दिल की मैं,सरे बाजार करता हूँ,  मेरी नादानियां कह लो,जो मैं हरबार करता हूँ। हुआ अनुरक्त जबसेे मैं,तेरी हाला का,ऐ साकी, तलब-ऐ-शाम ढलने का,मैं इन्त्तिजार करता हूँ। नहीं अच्छा हद से कुछ,कहते लोग हैं मुुुझसे, मगर तेरे इस़रार पर,मैंं हर हद पार करता हूँ। खुद पीने में नहीं वो दम,जो है तेरे पिलाने में, सरूरे-शब तेरी निगाहों में,मैं इक़रार करता हूँ। ईशाद तेेरा कुछ ऐसा,मुमकिन नहीं कि ठुकरा दूँ, जाम-ऐ-शराब-ऐ-मोहब्बत,मैं कब इंकार करता हूँ। कहे'परचेत',ऐ साकी,है कहने को न कुछ बाकी, कुछ तो बात है तुझमे,तेरी मधु से प्यार करता हूँ।

बुजदिलों,अपना कायरकृत्य 'पुलवामा' देखो...

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खुद  की हिंसावादी सोच का  कारनामा देखो, बुजदिलों,  कायराना  कृत्य 'पुलवामा' देखो। छल कर के जिन वीरों को, तुमने सीना ठोका, हमारे उन वीरों की शहादत का पंचनामा देखो। बुझा दिये तुमनें घर, देहलीज़ के चराग जिनके उम्रदराज़ उन मांं-बाप ने कैसे है दिल थामा देखो। पलभर मे खत्म हो गई खुशहाल दुनियां जिनकी, इंतजार मे गुमशुम बैठी शहीदों की वो वामा देखो। पाखंड तुम्हारे सब पराजित होगे, ऐ क्षद्म-वेशियो, अपना वह विद्वंशी,दुष्कुलीनजनक ओसामा देखो। है भूल तुम्हारी,कमजोर समझना सहिष्णुता 'परचेत', मित्रता सीखो द्वेष प्रेमियों, हमारे कृष्ण-सुदामा देखो।

असमंजस

प्रश्न विकट है, समय निकट है, देह-ईमान किधर दफना़ऊ?  चहूंओर, गिद्ध हैं, गीदड़ हैं।  डाल-डाल से, ताल-ताल से, हैं नज़र गढा़ए निष्ठा-भक्षी,  शठ,लुच्चे-लफंगे, लीचड़ हैं।  गजब येह भंवरधारा,'परचेत', कुटिल, कपटमय कीचड़ हैं, पतितता के आकंठ मे डूबे,  जहां भ्रष्टाचार के बीहड़ हैं।।