छिटपुट !
छल-फ़रेबी से
बुन के रखते है वो
हर याद अपनी,
बुन के रखते है वो
हर याद अपनी,
मगर जब जिक्र करो
तो कहते है,ये बे-बुनी-याद है !
तो कहते है,ये बे-बुनी-याद है !
जब कभी मौक़ा मिलेगा,
वो तुझे चूसकर फेंक देगा,
वो तुझे चूसकर फेंक देगा,
इसलिए ऐ आम,
आदमी की इस कदर दुहाई न दे !
आदमी की इस कदर दुहाई न दे !
Labels: My lyrics


10 Comments:
सन्नाट..
Very soon the time will show them, their real place. Let them live in their pseudo paradise.
Great Nice one
http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/10/blog-post_17.html
बढ़िया कटाक्ष :):)
This comment has been removed by a blog administrator.
ये लो , हमने भी यही कहा आम नहीं , ख़ास !होना है
@प्रेम-सरोवर जी ,
आपसे इस बात के लिए माफी चाहूँगा कि मैं जब स्पैम में पड़े कुछ कॉमेंट उठा रहा था तो गलती से आपका कोमेंट मुझसे डिलीट हो गया !
बेबुनियाद की भी कभी-न-कभी बुनियाद अवश्य पड़ी होगी......बेहतर कटाक्ष....
आम आदमी ऐसे ही चूसा जायेगा.
:)
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