स्तब्ध खड़ा देखता देखता है----------------- खूब सूरत कबिता देश भक्तिपूर्ण लेकिन बिद्रोह करती हुई -----बहुत-बहुत धन्यवाद देश जगाते रहने के प्रयत्न ---आभार
जायदाद आधी मिले, कानूनन यह सत्य | बेटी को दिलवा दिया, हजम करो यह कृत्य | हजम करो यह कृत्य, भृत्य हैं गिरिजा सिब्बल | चाटुकारिता काम, दिया उत्तर बेअक्कल | माँ की दो संतान, बटेगा आधा आधा | देखे हिन्दुस्तान, कहीं डाले ना बाधा ||
बहुओं पर इतनी कृपा, सौंप दिया सरकार । बेटी से क्या दुश्मनी, करते हो तकरार । करते हो तकरार, होय दामाद दुलारा । छोटे मोटे गिफ्ट, पाय दो-चार बिचारा । पीछे ही पड़ जाय, केजरी कितना काला । जाएगा ना निकल, देश का यहाँ दिवाला ।
वाह सर ! देश के वर्तमान हालातों पर कलम ( कीबोर्ड) की पैनी नजर देखने ही बनती है...... विडंबना देखिये की - देश के लिए एक कतरा खून भी नहीं और उनके लिए जान भी हाजिर है....
ये दिल निसार करके जाना कि राहे जफा होते है लोग, सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी बावफा होते है लोग ! सोचते थे कि नेमत है खुदा की ये जज्बा , इल्म न था कि वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग ! दिल और आँख का ऐसा आपसी देखा जो समन्वय 'परचेत', नजर देखे, दिल शकूं पाए, मनीषी ऐसे ही नफ़ा होते है लोग !
तमाम जंगल के बीहड़ों में जो कुछ घटित हो रहा हो, उससे क्या उस जंगल का राजा अंविज्ञ रह सकता है? या फिर यूं कहा जाए कि यदि उसे उसके राज्य में अन्याय होता दिखाई न दे, तो फिर क्या ऐसे नजरों से लाचार प्रतिनिधि को राजा बने रहने का कोई हक़ है? यदि उसे हमेशा किसी तीसरे ने ही आकर जगाना है, तो पूरे जंगलात के लिये यह निश्चिततौर पर एक बड़ी चिंता का विषय है। और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उसे जगाने वाला भी वाकई ईमानदार प्रयास कर रहा है, या सिर्फ खानापूर्ति, ताकि सिर्फ सुहानुभूति बटोरने के लिए जंगल की तमाम वादी की आँखों मे धूल झोंक सके ? और ठीक इसी सन्दर्भ में श्रीमती सोनिया गांधी के उस पत्र को भी रखा जा सकता है, जो उन्होंने कल इस देश के प्रधानमन्त्री श्री मनमोहन सिंह को लिखा और जिसमे उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि आईएएस अधिकारी सुश्री दुर्गा शक्ति के साथ कोई अन्याय न हो। उत्तर प्रदेश में बैठे...
पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग जगत पर एक ख़ास बात के ऊपर नजर गडाए था ! देखना चाहता था कि अक्सर किसी एक ख़ास मुद्दे पर एक साथ लेखों की बाढ़ निकाल देने वाले हमारे ब्लॉगर बंधू-बांधव इस मामले पर कितने संजीदा है ! लेकिन यह जानकर निराशा हाथ लगी कि किसी ने भी इस और ध्यान देकर लिखना तो दूर, कहीं पर टिपण्णी करना भी मुनासिब नहीं समझा( हाँ अगर कुछ मेरी नजरो से ही छूट गया हो तो क्षमा चाहूंगा ) ! इस ब्लॉग जगत पर मैं अक्सर देखता हूँ कि महिलाओं से सम्बंधित बातो पर कुछ लोग नाहक ही दुबले हुए जाते है! साथ ही कुछ महिला ब्लोगर किसी ब्लोगर की सार्थक पहल को भी महज एक ढकोस्लाबाजी कहकर कई बार अप्रिय शब्दावली इस्तेमाल करती है! अभी हाल का एक उदहारण मैं इस तरह से देता हूँ कि इस ब्लॉग जगत के हमारे एक वरिष्ठ और सम्मानित ब्लॉगर श्री सी.एम् प्रसाद जी ने एक लेख लिखा था, 'महिला सुशिक्षित और सशक्त हो', उस लेख की कड़ी में एक महिला ब्लोगर की टिपण्णी निराशाजनक लगी ! मैं उस टिप्पणी की चर्चा यहाँ नहीं कर रहा, मगर इस लेख के माध्यम से एक छोटा सा संदेस उन लोगो तक पहुंचाना चाहता हूँ कि आपको यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ '...
स्तब्ध खड़ा देखता देखता है-----------------
ReplyDeleteखूब सूरत कबिता देश भक्तिपूर्ण लेकिन बिद्रोह करती हुई -----बहुत-बहुत धन्यवाद
देश जगाते रहने के प्रयत्न ---आभार
बहुत खूब सर जी ... क्या बात है !
ReplyDeleteविश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर देश के नेताओं के लिए दुआ कीजिये - ब्लॉग बुलेटिन आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम और पूरे ब्लॉग जगत की ओर से हम देश के नेताओं के लिए दुआ करते है ... आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !
काश इस देश को भी स्थायित्व मिले।
ReplyDeleteजायदाद आधी मिले, कानूनन यह सत्य |
ReplyDeleteबेटी को दिलवा दिया, हजम करो यह कृत्य |
हजम करो यह कृत्य, भृत्य हैं गिरिजा सिब्बल |
चाटुकारिता काम, दिया उत्तर बेअक्कल |
माँ की दो संतान, बटेगा आधा आधा |
देखे हिन्दुस्तान, कहीं डाले ना बाधा ||
बहुओं पर इतनी कृपा, सौंप दिया सरकार ।
ReplyDeleteबेटी से क्या दुश्मनी, करते हो तकरार ।
करते हो तकरार, होय दामाद दुलारा ।
छोटे मोटे गिफ्ट, पाय दो-चार बिचारा ।
पीछे ही पड़ जाय, केजरी कितना काला ।
जाएगा ना निकल, देश का यहाँ दिवाला ।
जो कुछ सासू जी ने लूटा,तो कुछ जमाई ने !
ReplyDeleteछलकपट, धोखाधड़ी और खुद नुमाई ने, (खुद नुमाई= खुद की तारीफ़ )
क्या-क्या न सितम ढाये, इस बेहयाई ने !
साम,दाम,दंड,भेद, उपाय अपनाके सभी,
किये वश में सब लुटेरे, परदेशी माई ने !
जल,थल, आकाश, कुछ भी तो न छोड़ा,
रिकॉर्ड तोड़ डाले, उजली-काली कमाई ने !
शर्मशार करके रख दिया इंसानियत को,
देशद्रोही इन, रहनुमाओं की रहनुमाई ने !
स्तब्ध खडा देखता है अपना वतन 'परचेत',
जो कुछ सासू जी ने लूटा,तो कुछ जमाई ने !!
बेहद सशक्त रचना .
बहुत बढ़िया .... और देश के नेता सब उनको बचाने में लगे हैं ॥
ReplyDeleteबहुत बढ़िया सामयिक ग़ज़ल बढ़िया कटाक्ष
ReplyDeleteदेश की समसामयिक स्थिति पर कटाक्ष करती उम्दा रचना |
ReplyDeleteनई पोस्ट:-
ओ कलम !!
वाह सर ! देश के वर्तमान हालातों पर कलम ( कीबोर्ड) की पैनी नजर देखने ही बनती है......
ReplyDeleteविडंबना देखिये की -
देश के लिए एक कतरा खून भी नहीं
और उनके लिए जान भी हाजिर है....