ऐ साल 2020 !

 











असहज छटपटाहट, 

नकाबी हितस्वार्थ, 

अहंवादी हठता और 

प्रतिद्वंद्विता की शठता, 

शाश्वत चीखती रह गई

कुछ सर्द सी आजमाइशें।

है फैला चहुंओर, 

इक तिजा़रती शोर,

बेचैन दिल के अंतस मे ही

कहींं दफ्ऩ होकर के रह गई ,

कुछ कुत्ती सी ख्वाहिशें।


दिल मे बची है तो बस,
लॉकडाउन की खलिश
और राहबंदी की टीस,
तूने छाप ऐसी छोडी
तु याद रहेगा सदा,
अलविदा,
ऐ साल, दो हजार बीस।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

यूं भी बावफा होते है लोग !

धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !

'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !