अरे, जब ५०-६० रूपये की भी औकात नहीं थी तो कार खरीदना क्या जरूरी था ?
आज सबेरे-सबेरे अपने पढ़ोसी मुत्तुस्वामी जी से एक बार फिर से मुकालात हो गई ! मदर डेयरी से दूध लेकर आ रहे थे ! अपने को सतारूढ़ दल का दांया अथवा बांया ( पता नहीं कौन सा, मुझे ठीक से नहीं मालूम ) हाथ समझते है! शक्ल से कुछ खीजे से प्रतीत आ रहे थे ! अपनी तो आदत है परत चढ़ते घाव को कुरेदना, अत: झठ से राम-राम ठोक दी ! थोबड़े को हल्का सा पिघलाते हुए, मेरे राम-राम का जबाब दिए बगैर बोले ; ये हमारे लोग भी न, च. चु... क्या बताऊ, कभी नहीं सुधरेंगे ! मैंने शांत होकर पूछा : क्या हुआ मुत्तुस्वामी जी, खीजे हुए क्यों हो इतने ? वे बोले : अरे, गोदियाल जी , कल रात को ग्याराह बजे घर पहुंचा ! मैंने कहाँ : ट्रैफिक जाम की वजह से लेट पहुंचे होंगे, मैं भी देर से ही पहुंचा था! क्या करे, दिल्ली में ट्रैफिक ही इतना हो गया ! वे बोले : अरे ट्रैफिक को मारो गोली, ये तो अपने देश के इन महान नागरिकों की वजह से जाम लगा था कल..... क्यों कल ऐसा क्या था? मैंने बीच में उनकी बात काटते हुए पूछा ! वे बोले : अरे भाई तुम भी न, साहित्यकार बनने के चक्कर में मुझे लगता है कि तुम्हे रास्ते में ड्राइव करते हुए भी ब्लोगबाणी और चिठ्ठाजगत ही ...