Sunday, August 16, 2009

एक कहानी- बयाल

पिछली दफ़ा दिल्ली से गांव जाते वक्त, एक दिन के लिये ऋषिकेश मे अपने चचेरे भाई के पास रुका था! बातो-बातो मे, कुछ सालों से अपने दिल मे पाले रखी यह भडांस मैने जमकर निकाली थी कि वे लोग गांव की अपनी जमीन-जायदाद बस यूं ही छोड आये थे, और पिछले पांच सालो से वे वहां देखने भी नही गये थे ! इस बात पर मै उन्हे ढेर सारे उपदेश भी दे आया था, खासकर भाभी को ! भाभी जी ने मेरी हर इक बात को बडे ध्यान से सुना था, और वे मेरी किसी बात का बुरा भी नही मानती ! वे मुझे तभी से अपने छोटे भाई की तरह मानती है, जबसे मेरे स्कूल के दिनो मे वे नई- नई गांव मे ब्याहकर आई थी, और गांव के कुछ असामाजिक तत्वों ने उन्हे एक झूठे इल्जाम मे फ़सांने की चेष्ठा की थी, किन्तु मैं उस घटना का एक चश्मदीद गवाह था, अत: मैने सारा सच घर-गांव के बडे-बुजुर्गो के समक्ष प्रमाण सहित प्रस्तुत कर दिया था ! तभी से भाभी मेरी बडी इज्जत करती है और मुझे कई बार यह भी कह चुकी है कि तुम एकदम मेरे छोटे भाई जैसे हो ! ऋषिकेश मे मेरे उनके यहां ठहरने के दर्मियां मैने यह भी नोट किया था कि कुछ सवाल जो मैने भाभी जी से पूछे थे, उन्हे सुनकर वह थोडा असहज सी हो गई थी, और उस वक्त सफ़ाई से उन सवालो को टाल भी गई थीं !

उत्तरांचल के एक पहाडी भू-भाग मे बसा, हमारा वह छोटा सा गांव ! यूं तो कहने को वह १५-२० परिवारों का गांव है, किन्तु एक-एक कर लोग गांव से खिसकते और मैदानी प्रदेशो तथा शहरों की ओर प्लायन करते चले गये ! आज स्थिति यह है कि पूरा का पूरा गांव वीरान पडा है, उन इधर-उधर बिखरे घरों मे से कुछ ही घर अब ऐसे है, जिनमे इक्का-दुक्का लोग रहते है! मेरा अपने गांव के प्रति भरपूर लगाव है और जीवन की मजबूरियों के चलते मै भी एक तरह से उसे छोड आया हूं, किन्तु जब कभी अपने बचपन की यादें वहा खींच ले जाती है तो हमेशा यही कोशिश बनाये रखनी पडती है कि रात होने से पहले नजदीकी कस्बे तक पहुंच जाऊ, जहां ठहरने के लिये छोटे होटल इत्यादि हैं ! मुझे याद है कि जब मैं गांव मे पढता था तो बुनियादी सुविधावों के नाम पर गांव मे कुछ भी नही था, सिवाये पास मे स्थित एक इन्टरमीडियेट स्कूल के ! रात-विरात अगर पेट खराब हो जाये तो पहाडो के बीच बसे उस गांव मे, पहाडो की छाया के घुप अन्धेरे मे ही पास के जंगल मे जाना पडता था, घर और उसके आस-पास भी टायलेट जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी! और ऐसे मे जंगल जाते वक्त हाथ मे रोशनी के नाम पर होता था सिर्फ़ चीड के पेड की वह लकडी जो लीसे की वजह से किसी पैट्रोल मे भीगी लकडी के जैसे जलती थी ! अगर तेज हवा के झोंके मे वह बुझ जाये तो फिर सब कुछ भगवान भरोसें ही चलता था! जब मैं बारह्वीं मे पढता था, उस समय गांव मे उन भाभी जी के परिवार मे वह, उनका एक नन्हा बेटा, देवर बीरु, जोकि मेरा क्लासमेट भी था, और ससुर यानि मेरे चाचा रहते थे, मेरी चाची यानि उनकी सासू मां की उनकी शादी से पूर्व ही मृत्यु हो चुकी थी ! उनके पति भारतीय सेना मे कमीशन्ड आफीसर है !



कुछ साल पहले वीरु भी ग्रेजुएशन करने के उपरान्त आई एम ए की परीक्षा पास कर, खड्गवास्ला से तीन साल की ट्रेनिंग समाप्त करने के बाद, सेना मे कमीशन्ड आफीसर बन गया था ! करीब पांच साल पहले पिता की मृत्यु के दौरान वह दो महिने के वार्षिक अवकाश पर गांव आया था तो एक रात जंगल गया और अगले दिन सुबह वहीं गांव के पास के जंगल से उसकी लाश मिली थी ! उसकी गर्दन पर पीछे बाघ के पंजे का निशान पाया गया था, और गांव के लोगो का यह मानना था कि जंगल से नित्यकर्म से लौटते वक्त बाघ ने पीछे से उस पर हमला कर दिया होगा , जिससे उसकी मृत्यु हो गई ! उसके अगले ही दिन बडे भाई सहाब, जो पिता की मृत्यु की सूचना मिलने के बाद छुट्टी लेकर गांव आये थे, पिता और भाई के क्रिया-क्रम के उपरान्त अपने बच्चो को लेकर गांव से चले गये थे ! चूंकि उस समय उनकी पोस्टिंग लेह थी, अत: बच्चो को वे पढाने के उद्देश्य से ऋषिकेश मे अपने एक रिश्तेदार के घर के समीप एक घर किराये पर लेकर, भाभी जी और बच्चो को वहां सेट्ल कर गये थे !

ऋषिकेश मे एक रात उनके घर मे रुकने के बाद, मैं गांव गया और एक दिन वहीं पास के कस्बे मे रुकने के बाद वापस अपने शहर लौट आया था ! कुछ दिनों तक अपने गांव की माटी की खुशबू और यादें दिलो-दिमाग मे बसाये रखने के बाद, मैं धीरे-धीरे उन यादों को भुलाता चला जा रहा था कि अचानक एक दिन जब शाम को मैं दफ़्तर से घर लौटा तो मेरी पत्नी ने विस्मित सा चेहरे बनाया हुआ था और पानी का गिलास मुझे देने के बाद उसने डाईनिंग टेबल के ऊपर रखा एक लिफ़ाफ़ा मुझे थमा दिया था ! पत्र उन भाभी जी का भेजा हुआ था! मैने वह पत्र पढा और कुछ लम्हों के लिये मै भी एक विस्मय भरे संसार मे खो सा गया था! मुझे याद आने लगे थे वो बचपन के अपने बडे-बुजुर्गों के मुख से सुने गांव मे प्रचलित वे तरह-तरह के किस्से ! उस खत को मै कुछ जरूरी बातों के स्पष्ठीकरण के साथ यहां ज्यों का त्यों रख रहा हूं :
प्रिय देवर जी,
छुटकू-छुट्की और भुली (यानि देवरानी) को मेरी ओर से शुभ-चिरमजीव एवं आपको सपरिवार पवित्र रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाये ! भगवान आप सब लोगो को सदा सुखी रखे !

पिछली बार आप जब यहां हमारे घर आये थे, तो आपने मुझसे कुछ सवाल पूछे थे! मैने जानबूझकर आपके सवालों को इसलिये अनसुना कर दिया था, क्योकि मेरे दोनो बच्चे, नेहा और राहुल पास बैठे हमारी बातों को गौर से सुन रहे थे, और मै यह नही चाहती थी कि उनके नन्हे दिमाग पर हमारी बातों का कोई बुरा असर पडे ! हालांकि बर्षो से उस तूफ़ान को मैं अपने अन्दर समेटे हुए हूं और चाहती थी कि उस घटना की एक-एक बात आपको बताऊ, क्योंकि मै अच्छी तरह से जानती हूं कि आप जैसे साहित्यकार लोग तो इसी तरह के चटपटे और सनसनीखेज मसाले की हरदम तलाश मे रहते है ! पता नही आप मेरे इस पत्र को किस रूप मे लेते है, और मै भी एक शिक्षित महिला होने के नाते यह बात भली भांति समझती हूं कि आज के इस शिक्षित, सभ्य और वैज्ञानिक समाज मे यह महज एक दकियानूसी और अन्धविस्वास से परिपूर्ण बात है ! लेकिन जो चीज मैने अपने पूरे होशो-हवाश मे अपनी आंखो से देखी हो, अपने कानों से सुनी हो, उसे भला मैं कैसे झुठला सकती हूं ? आपके लिये भले ही यह महज एक चट्पटा और सनसनीखेज मसला हो, लेकिन मै वह सब देखने-सुनने के बाद भी किस आधार पर सिर्फ़ विज्ञान जगत की ही दुहाई देती फिरु ?

अपनी इन बातों की शुरुआत मैं उस घटना से करती हूं, जब राहुल चार साल का था और नेहा उस वक्त गर्भ मे थी ! ऐसी अवस्था मे एक स्त्री को बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पडता है और आपको तो मालूम ही है कि हमारे गांव मे तो रात को अगर इन्सान को लघुशंका की भी शिकायत हो तो घर से बाहर निकलने के लिये भी दस बार सोचना पडता है ! उस रात भी मै कुछ इसी समस्या से दो-चार हो रही थी और जाग रही थी ! गर्मी की वजह से मेरे बुजुर्ग ससुर जी बाहर खुले बरामदे मे एक कोने पर चारपाई डाल सो रहे थे ! कि तभी हमारे घर से थोडा नीचे की तरफ़ बडे से पेड के पास एक जोर की चीख सुनाई दी ! वह चीख सुन मेरे कान कुछ देर के लिये मानो सांय-सांय करने लगे थे ! अभी मुश्किल से दो मिनट ही गुजरे होंगे कि बाहर सो रहे ससूर जी ने गले से एक अजीब तरह की जोर की आवाज निकाली ! यह तुम भी जानते होंगे कि कभी जब गांव मे कोई पूजा-पाठ होता था तो उन पर स्थानीय कुल-देवता प्रकट होते थे! फिर उसके थोडी देर बाद गांव के देवी मां के मंदिर के पास से वही चीख पुन: सुनाई दी ! अन्दर ही अन्दर मैं बहुत डर गयी थी, मैने अपनी बगल मे सो रहे बेटे राहुल के ऊपर हाथ धरा तो वह भी जाग रहा था, और बोल पडा कि ममा कौन रो रहा है इतनी रात को ? मैने उसे कहा कि कुछ नही बेटा, तुम सो जावो और मै उसे थपकी देकर सुलाने लगी !

अगले दिन सुबह उठी तो सिर भारी था और बुरी तरह दुख रहा था ! रोज की भांति जब मै ससुर जी के लिये चाय बनाकर देने गई तो ससुर जी भी जाग गये थे और चारपाई पर उठ बैठे थे ! मैने गरम चाय का गिलास कटोरी समेत उनके हाथ मे पकडाया, तो वे रोज की तरह गिलास पकडते हुए बस इतना ही बोले, हां ला बेटा! मुझे वहीं खडी देख उन्होने फिर कहा, क्या बात है बेटा ? कुछ पूछना है ? …. मैने झिझकते हुए कहा, पिता जी….. वो कल रात को…… वो चीख….. आपने भी सुनी ? वो बोले, अरे बेटा, तुम डर गई थी क्या….? इसमे डरने की कोई बात नही है ! वो क्या है कि असूज (आश्विन) का महिना चल रहा है, सुदूर चमोली जिले के मैठाणा नामक भगवती के प्रसिद्ध मन्दिर मे सप्ताह भर चलने वाले अठारह पुराण और यज्ञ चल रहे थे, अत: आस-पास के इलाकों से सभी देवियां भी वहां गई हुई थी ! कल शाम इसका समापन होने के उपरान्त अपनी देवी मां भी रात को अपने थान ( मंदिर) लौट आई ! मैने पूछा तो क्या वे चीखें देवी मां की थी ? ससुर जी बोले, हां उनके साथ-साथ पूरा बयाल ( परियों और देवियों का रथ) भी चलता है, तुम बिल्कुल मत डरो, बेटा …!!

इस घटना के बाद से कई बार देर रातों को मैने ससुर जी को पुकारते हुए सुना था कि हे बच्चों ! बाहर मत निकलना, बयाल चल रही है ! मेरे दिलो-दिमाग पर इन बातों ने एक डर की सी स्थिति पैदा कर दी थी ! एक-डेढ साल बाद जिस रात ससुर जी का देहावासन हुआ, मै घर पर अपने दोनो मासूम बच्चों के साथ अकेली थी ! शाम का खाना-पीना निपटाने के बाद, मुझे अभी मुश्किल से बिस्तर पर लेटे पन्द्रह मिनट ही हुए थे कि बाहर चौक(आगंन) के किनारे पर बने टिन के छप्पर, जिसे हम सर्दियों के लिये लकडियां इत्यादि संग्रह करने के लिये इस्तेमाल करते थे, के ऊपर टिन के बजने की कुछ ऐसी जोर की आवाज आई मानो, किसी ने उस पर लाठी से वार किया हो ! उस दिन ससुर जी अपने कमरे मे दरवाजा खुला छोड सो रहे थे ! कुछ देर बाद मुझे ससुर जी की बहु- बहु पुकारने की आवाज सुनाई दी ! मैने अपने कमरे मे जल रही लालटेन जिसे मैने सोते वक्त बिल्कुल धीमी लौ पर कर दिया था, उसे फिर से तेज किया और आहिस्ता से अपने कमरे की सांकल ( चट्कनी) खोल बाहर निकली और फिर बाहर से कमरे के किवाड पुन: बन्द कर दिये, ताकि अन्दर सो रहे मेरे दोनो बच्चो पर अन्धेरे मे कोई जंगली जानवर हमला न कर सके ! मै लालटेन हाथ मे लिये ससुर जी के कमरे की तरफ़ बढी, ज्यों ही मैने उनके कमरे के पायदान से कदम अन्दर कमरे मे रखे, कि वहां का नजारा देख, मेरे मुंह से एक जोर की चीख निकल गई ! ससुर जी चारपाई के बगल मे ठीक नीचे फर्श पर अचेतावस्था मे पडे थे! इस बीच मेरी चीख-पुकार सुन गांव के कुछ लोग घर पर पहुंच चुके थे ! उनमे से एक बुजुर्ग ने ससुर जी की नब्ज टटोली और बोले कि वह मर चुके है, शायद उन्हे दिल का दौरा पडा है ! मै भय से थर-थर कांप रही थी, कुछ बुजुर्ग लोग वहीं रत जगे के लिये ससुर जी की लाश के पास ही बैठ गये थे, एवं चार लोगों को उन्होने बगल के गांव स्थित पोस्ट आफ़िस जाने को कहा, ताकि वहां लगे टेलीफोन से वीरु, जोकि उस समय कोट्द्वार मे पोस्टेड था, को फोन कर सकें ! इन्हें तुरन्त बुलाना सम्भव नही था, क्योंकि ये उस समय लेह मे पोस्टेड थे, अत: इनके लिये टेलीग्राम करने की बात कही गई !

खबर पाते ही अगले दिन करीब बारह बजे के आस-पास बीरु घर पहुच गया था ! गांव के लोगो की सलाह पर, इनका इन्तजार किये बगैर ससुर जी का वीरु के हाथों उसी दिन अन्तिम संस्कार कर दिया गया ! ससुर जी के देहान्त की दूसरी रात, मेरे लाख मना करने पर भी बीरु तकिया के नीचे खुंखरी रखकर बाहर बरामदे मे पडी चारपाई पर ही सो गया ! वह पूर्णिमा की रात थी, अत: बाहर खूब चांदनी फैली थी ! रोज की भांति मै अपने साथ घटित हुई घट्नाऒं से दुखी, यु ही बिचारों मे खोई थी कि एक बार फिर बाहर छप्पर पर जोर की लठ्ठी मारने की वही चिरपरिचित आवाज मेरे कानों मे गूंज उठी ! सिर से पैर तक मेरे शरीर मे एक ठण्डी सिहरन सी दौड गई थी ! मै तेजी से बिस्तर से उठी और मैने दरवाजे पर लगी सांकल के बीचोबीच दरवाजे के उस मोटे तख्ते पर बने सुराख से अपनी एक आंख चिपका कर बाहर का जायजा लिया ! बीरु खर्राटे मारकर सो रहा था कि तभी मुझे एक कुत्ते जैसी आकृति की छाया चांदनी की रोशनी मे फर्श पर पडती दिखी ! मै चिल्लाना चाह रही थी, मगर मेरे गले से आवाज नही निकल रही थी ! मै सांस रोककर यह सब देख रही थी कि तभी वह छाया एकदम वीरु की चारपाई के पास आ गई थी और मुझे लगा कि जैसे वह आकृति धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी ! कुछ पल बाद यह देख मेरी आंखे फटी की फटी रह गई कि वह आकृति एक पहाडी भेष-भूषा वाली महिला के रूप मे परिवर्तित हो गई थी ! उसने काले रंग की पाहडी आंग्डी (कम्बलनुमा धोती ) पहन रखी थी और कमर पर सफ़ेद रंग का पठवा ( सांफ़ा) बांध रखा था! करीब एक मिनट तक वह औरत वहां खडी रही और फिर धीरे-धीरे डग बढाती हुई बरामदे से बाहर निकली, उसके तुरन्त बाद बीरु भी उठ खडा हुआ और उसके पीछे-पीछे चल दिया ! मै दरवाजे के पीछे से बस हाथ खडा कर उसे रुक जाने का मौन ईशारा करती रह गई थी और वहीं पर कब बेहोश होकर गिर पडी, मै नही जानती ! और फिर अगले दिन सुबह लोग जब बीरु की लाश उठाकर दरवाजे पर लाये तो……….. ! मैने अगले दिन जब यह बात गांव की कुछ सयानी औरतों को बताई तो वे कहने लगी कि हो सकता है कि तुम्हारे घर पर किसी भूत-प्रेत का साया हो ! कुछ का कहना था कि वह कोई बोक्सु ( आधा मनुष्य, आधा बाघ ) रूप वाली कोई चुडैल या प्रेतात्मा हो सकती है जिसने पहले बीरु को बसीभूत कर अपने साथ ले गई और फिर बाघ का रूप धारण कर उसे मार दिया !

अब तुम्हीं बतावो कि मै किस आधार पर आधुनिकता का लिवास पहन उन सब बातों को भुला दू और किस हिम्मत पर गांव जाने का दुस्साह्स करु ? खैर, बहुत दिनो से सोच रही थी कि ये सब बातें तुम लोगों को बता कर किसी तरह अपने मन का बोझ हल्का करु ! उम्मीद करती हूं कि मेरी बातों को आप लोग अन्यथा नही लोगे !
आपकी भाभी,

1 comment:

  1. kya yah sach hai??
    ya ek kahani matr hai??

    sansmaran hai / ya sansmaran jaisee kahani hai??

    kya sach mein aise kisse aaj bhi gaanv dehaat mein sune jaate hain??

    --agar yah kahani hai to sach mein marmsparshi hai aur shuru se ant tak baandhe rakhti hai...
    -ek arse baad ek achchee kahani padhee jisne ek minute ko bhi ध्यान यहाँ वहां नहीं होने दिया.
    -agar yah sachchayee hai to bahut hi dukhdayi sansmaran hai..sochti hun kaun si adhunikta mein jee rahe hain ham sab??
    bhabhi ki baat sahi hai...ankhon dekhi aur sath ghati ghtnaon ko koi nazar andaaz kaise kar sakta hai?
    shukriya is katha ke liye.

    [sorry..transliteration is not working properly ..]

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