Friday, December 23, 2011

घर का शौहर !


फिर से देहरी पे 
क्रिसमस और नवबर्ष 

दस्तक  देने को है  और  
मैं जानता हूँ कि मेरी
आरजुओं की थमी झील में
तुम फिर एक बार
ख्वाइशों की तैरती कश्ती से अपनी
फरमाइशों का लंबा जाल फेंकोगी।  


तुम्हारी फरमाइशें भी क्या कहने, 

मासा अल्लाह !
अभी, गुजरे साल की ही तो बात है,
क्रिसमस पर तुम्हे
ताजमहल दिखाने ले गया था,
और तुम अड़ गई थी,
खुद की  अकेली  एक  

फोटो खिंचवाने की जिद पर,
और मैंने भी बड़ी कुशलता से
तारे जमीं पर उतारे बिना ही
तुम्हारी वह ख्वाइश भी पूरी की थी।
मगर तुम हो कि
मेरी अक्लमंदी की दाद देने के बजाये,
पड़ोसनो के शौहरों  का ही
गुणगान करते नहीं थकती,
खैर, तुम खुश रहो,
इसी में समूचे जगत का
सुख निहितार्थ है,
मेरा क्या,
पैदाइशी चार आँखे लेकर आया था,
दो तुम्हें तकते फूटी, दो इंटरनेट  पर   !!




छवि नेट से साभार !

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13 Comments:

Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

तारे न जमीं पर न ही आसमां पर..

Friday, 23 December, 2011  
Blogger S.N SHUKLA said...

सुन्दर रचना, मुग्ध करते भाव, सादर.

Friday, 23 December, 2011  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा ! फोटोग्राफर हो तो ऐसा !
सुन्दर रचना ।

Friday, 23 December, 2011  
Blogger Pragya Sharma said...

Very funny .

enjoy this bite
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=vUC__Xm-MBQ

Friday, 23 December, 2011  
Blogger vandana gupta said...

हा हा हा……………जय हो।

Friday, 23 December, 2011  
Blogger चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि..... :)

Friday, 23 December, 2011  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

दो तुम्हें तकते फूटी, दो अंतर्जाल पे !!

हा हा हा हा हा हा हा भाई वाह वाह वाह...बेजोड़ रचना...दिन भर की थकन इसे पढ़ते ही उड़न छू हो गयी...बधाई स्वीकारें.

नीरज

Friday, 23 December, 2011  
Blogger शूरवीर रावत said...

पैदाइशी चार आँखे लेकर आया था,
दो तुम्हें तकते फूटी, दो अंतर्जाल पे !!
एक बेहतरीन कविता.

Friday, 23 December, 2011  
Blogger भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

:) हा हा हा...

Friday, 23 December, 2011  
Blogger लोकेन्द्र सिंह said...

मेरी अक्लमंदी की दाद देने के बजाये,
पड़ोसनो के शौहरों का ही
गुणगान करते नहीं थकती !
बहुत बढ़िया साहब.

Friday, 23 December, 2011  
Blogger BS Pabla said...

पैदाइशी चार आँखे लेकर आया था,
दो तुम्हें तकते फूटी, दो अंतर्जाल पे !!

:-)

Saturday, 24 December, 2011  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

वाह वाह ... क्या इस्तेमाल है चार आँखों का ... मज़ा आ गया गौदियाल साहब ...

Sunday, 25 December, 2011  
Blogger डॉ. जेन्नी शबनम said...

bahut mazedaar...

पैदाइशी चार आँखे लेकर आया था,
दो तुम्हें तकते फूटी, दो अंतर्जाल पे !!

shubhkaamnaayen.

Sunday, 01 January, 2012  

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