गूढ़ सत्य






अपने तमाम एहसास हमने, 

कुछ यूं लफ्जो़ मे पिरोए हैं,

तुम साथ तो चेहरे पे मुस्कुराहट बिखेरी,

और अकेले मे रोए हैं।




Comments

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(१८-११-२०२१) को
    ' भगवान थे !'(चर्चा अंक-४२५२)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. उम्दा, हृदय स्पर्शी!

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  3. आपने बहुत कम शब्दों में गहरी बात कह दी। मैं पढ़ते ही उस एहसास से जुड़ गया। हम सब कभी न कभी यही करते हैं, सामने मुस्कुरा लेते हैं और अकेले में टूट जाते हैं। मुझे आपकी सादगी पसंद आई, क्योंकि आपने दर्द को सजाया नहीं, सीधे रखा।

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