Tuesday, December 30, 2025

संकल्प-२०२६

सलीके से न खुशहाली जी पाया, न फटेहाल में, 

बबाल-ए-दुनियांदारी फंसी रही,जी के जंजाल में, 

बहुत झेला है अब तक, खेल ये लुका-छिपी का,

मस्ती में जीयूंगा तुझे अब ऐ जिंदगी, नए साल में।

Monday, December 29, 2025

हल?

 हां, उलझनें हैं क्योंकि 

बीच हमारे अनबन है,

दरमियां फासले हैं, मगर

मिलने  का भी मन है।

Friday, December 26, 2025

सलाह

दीवार सामर्थ्य की और तू फांद मत,

अपनी औकात में रह, हदें लांघ मत,

संवेदनाएं अगर जिंदा रहे तो अच्छा है,

बेरहम बनकर उन्हें खूंटी पे टांग मत।

Wednesday, December 24, 2025

मलाल

साफगोई की भी तहज़ीब होती है,

डूबने वालों की भी यह सदा आई,

आखिरी उम्मीद थी मेरी तुम मगर,

बुलाने पर भी मेरे शहर नहीं आई।

Tuesday, December 23, 2025

ऐ धोबी के कुत्ते!

सुन, प्यार क्या है,

तेरी समझ में न आए तो,

अपने ही प्यारेलाल को काट खा,

किंतु, ऐ धोबी के कुत्ते!

औकात में रहना, ऐसा न हो,

न तू घर का रहे, न घाट का।


सुनो पथिक!



कोई  दयार-ए-दिल की रात मे

वहां चराग सा जला गया,

जो रहता था कभी उधर,

सुना है, अब वो शहर चला गया।



Saturday, December 20, 2025

मलाल

इस मुकाम पे लाकर मुझे, तू बता ऐ जिन्दगी!

दरमियां तेरे-मेरे, अचानक ऐंसी क्या ठन गई,

जिन्हें समझा था अपनी अच्छाइयां अब तक,

वो सबकी सब पलभर मे बुराइयां क्यों बन गई।

दगा किस्मत ने दिया, दोष तेरा नहीं, जानता हू,

जीने का तेरा तर्क़ मुझसे भी बेहतर है, मानता हूं,

मगर, इसे कुदरत का आशिर्वाद समझूं कि बद्दुआ 

मुखबिर मेरे खिलाफ़, मेरी ही परछाईं जन गई।

Friday, December 12, 2025

व्यथा

 तुझको नम न मिला

और तू खिली नहीं,

ऐ जिन्दगी !

मुझसे रूबरू होकर भी

तू मिली नहीं।

Thursday, December 11, 2025

दुआ !

 हिन्दुस्तान हमारा विकास की राह पर है,

बस, अब आप अपनी गुजर-बसर देखना,

मैंने भी आप सबके लिए दुआएं मांगी हैं,

अब, तुम मेरी दुआओं का असर देखना।

Saturday, December 6, 2025

उलझनें

 थोडी सी बेरुखी से  हमसे जो

उन्होंने पूछा था कि वफा क्या है,

हंसकर हमने भी कह दिया कि

मुक्तसर सी जिंदगी मे रखा क्या है!!


Friday, December 5, 2025

मौसम जाड़े का..

सुना न पाऊंगा मैं, कोई कहानी रस भरी,

जुबां पे दास्तां तो है मगर, वो भी दर्द भरी,

सर्द हवाएं, वयां करने को बचा ही क्या है?

यह जाड़े का मौसम है , दिसम्बर-जनवरी।


सोचा था कर दूंगा आज, इश्क तुम्हारे नाम,

बर्फ से ढकी हुई पहाड़ी ठिठुरन भरी शाम,

दिल कहता था, छलकागें इश्कही-विश्कही,

मगर, "बूढ़े साधू" ने बिगाड़ दिया सारा काम।








Thursday, December 4, 2025

दास्तां!

जिंदगी पल-पल हमसे ओझल होती गई,

साथ बिताए पलों ने हमें इसतरह रुलाया,

व्यथा भरी थी हर इक हमारी जो हकीकत ,

इस बेदर्द जगत ने उसे इत्तेफ़ाक बताया।


कभी दिल किसी और का न हमने दुखाया,

दर्द को अपने हमेशा हमने, सीने मे छुपाया,

रुला देना ही शायद फितरत है इस ज़हां की,

बोझ दुनियां का यही सोच, कांधे पे उठाया।


छंद

पर्व लोहड़ी का था और हम आग देखते रहे, उद्यान राष्ट्रीय था और हम बाघ देखते रहे। ताक में बैठे शिकारी हिरन-बाज देखते रहे, हुई बात फसल कटाई की, ...