Friday, April 30, 2010

खुदा न करे कभी आपके भी कॉकरोच घुसे ! ( आप बीती )


कल मेरे ब्लॉग पर एक टिप्पणीकार ने निम्नलिखित टिपण्णी दी , तो सोचा क्यों न उनकी ख्वाइश के मुताविक आज मैं भी एक अच्छी पोस्ट लिख डालूँ ;

Kumar Jaljala said...

"महीने दो महीने में एकाध पोस्ट अच्छी भी लिखो करो गोदियाल साहब। सब लोग वेरी गुड-वेरी गुड कर सकते हैं क्योंकि आप इनकी पोस्टों पर जाकर वेरी गु़ड और हा... हा.. हा...करते हो। इससे ब्लाग जगत का कोई फायदा नहीं होने वाला। बाकी आपकी फोटो देखने से तो लगता है कि आप समझदार हो।"

ये जनाव , वैसे तो जाने पहचाने और डाक्टर घोटा विरादरी के अच्छे लोगो में से सुमार है, और पहले भी ब्लॉग जगत पर अपनी किस्मत बहुत से फर्जी नामो जैसे राहुल, निखिल, रोहित इत्यादि से आजमा चुके है , लेकिन ख़ास सफलता इन्हें हासिल नहीं हुई ! आइये इसबार हम सब मिलकर खुदा से इनके लिए यह दुआ मांगे कि खुदा इन्हें सदबुद्धि दे, और ये एक सफल ब्लॉगर बने !

अब आपको अपनी एक आप बीती सुनाता हूँ ;
सुबह तैयार होकर जब घर से दफ्तर या अपने किसी गंतव्य की और ड्राइव करते हुए निकलों तो शुरु होती है दिल्ली की भीड-भाड वाली सड़क, आगे-पीछे दांये-बाएं से रेंगती गाडिया, बायाँ हाथ गियर पर, दांया हाथ स्टेयरिंग पर, बांया पैर कभी कलच के ऊपर, कभी कलच के बगल में नीचे, और एक्सीलेटर तथा ब्रेक के ऊपर कत्थक डांस कर रहा होता है दायिना पैर , नजरें कभी सामने सड़क पर तो कभी साइड मीरर पर ! बस, यही सब कुछ चलता है घर से मंजिल तक के सफ़र की जद्दोजहद में !

अभी कुछ दिन पहले की बात है, घर से जब दफ्तर के लिए निकला था तो इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं था कि मेरे संग एक और प्राणी भी यात्रा कर रहा है ! हल्के-फुल्के जाम में गाडी करीब ३५-४० की स्पीड पर थी, कि अचानक मुझे लगा कि मेरे दाहिने पैर में कुछ हलचल हो रही है, सोचा कि हो सकता है कि दाहिने पैर की एक्सीलेटर और ब्रेक पैडलों के ऊपर हो रही एक्सरसाइज की वजह से कोई नस-वस फड़क रही होगी ! करीब तीन मिनट बाद फिर वही हलचल हुई, और अचानक किसी जीव के मेरे घुटने की तरफ धीरे-धीरे बढ़ने का अहसास हुआ ! मैं तिलमिला कर रह गया कि क्या करू, एक तो गाडी जाम में थी, तुरंत कहीं अगलबगल साइड लगाकर रोक भी नहीं सकता था, जहां था अगर वहीं ब्रेक मार देता तो पीछे वाले हार्न बजा-बजा के जीना हराम कर देते !

एक अच्छे पर्वतारोही की भांति वह प्राणी धीरे-धीरे टांग में ऊपर की ओर चड़ता जा रहा था! इस अचानक आई मुसीबत से कैसे निपटू यही सोच रहा था कि उस जीव ने अपनी कंटीली टांगों से अपनी गति बढ़ा दी ! मैंने भी आव देखा न ताव, और पैंट के बाहर से ही अपनी जांघ पर जनाव को धर धबोचा! मगर इस कुश्ती के दरमियान ध्यान बंट जाने से अपने आगे चल रही मारुती ८०० के बम्पर को हल्के से ठोक दिया ! बस फिर क्या था, इधर मैं अपनी गाडी की ड्राविंग सीट पर कॉकरोच महाराज को अपनी पैंट के अन्दर जांघ पर दबोचे बैठा था, और उधर उस मारुती ८०० में सफ़र कर रहे दम्पति, जोकि ३०-३२ की उम्र के रहे होंगे , बाहें बिटोते हुए अपनी गाडी से उतर कर अपनी मधुर बाणी में शब्द्कीर्तन करते हुए मेरी गाडी की ड्राइविंग सीट वाली विंडो की तरफ बढे !

ए सी चला होने की वजह से खिड़की का शीशा बंद था, वरना तो जिस हाव-भाव में वे दिख रहे थे, तो गाडी के बाहर से ही मेरा कचूमर निकाल देते ! मैंने चेहरे पर शान्ति बनाए रखते हुए उन्हें बांये हाथ से कुछ इशारा किया! चूँकि दाहिने हाथ ने 'कॉकरोच श्री' को दबोच रखा था इसलिए उस हाथ से गाडी का दरवाजा भी नहीं खोल सकता था , फिर बाएं हाथ से दरवाजे को खोला और आहिस्ता से पैर बाहर निकाला ! वे दम्पति महोदय बोले ही जा रहे थे और साथ में मेरे सब्र की भी शायद अन्दर ही अन्दर दाद भी दे रहे होंगे कि इतना सुनने के बाद भी इस बेशर्म शख्स ने अभी तक एक भी शब्द जुबां से नहीं निकाला! राह चलते कुछ और तमाशबीन भी इर्द-गिर्द खड़े हो गए थे! मैं धीरे से बाहर निकल एक तरफ आधा झुकी हुए स्थिति में ही खडा हो गया ! और फिर मैंने उस भीड़ में खड़े उस दम्पति को अपनी तरफ बुलाया और बोला, सॉरी , आप लोगों को तकलीफ हुई , इसके लिए क्षमा चाहता हूँ , मगर आप इधर देखिये , मैंने बाए हाथ से उस ओर इशारा किया जिस तरफ दाहिने हाथ से जांघ के ऊपर कॉकरोच को पकडे रखा था ! सभी की नजर अब उसी तरफ थी , मैंने धीरे से बांये हाथ से अपनी पैंट के उस हिस्से को थोड़ा ऊपर उठाते हुए कॉकरोच को छोड़ा, तो वह एकदम सड़क पर आ गिरा और तेजी से एक तरफ को भागा !

उस विषम परिस्थिति में भी हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए, शांत स्वर में मैंने उन दम्पति महोदय से पूछा , अब आप ही बताइये कि खुदा न करे , अगर यह कॉकरोच आपके घुस गया होता तो आप क्या करते ? मेरे इस मासूम सवाल को सुनकर न सिर्फ वह दम्पति अपितु और वहाँ खड़े तमाशा देख रहे लोग भी जोर से हँसे और अपने-अपने गंतव्य को चल दिए ! मैंने भी अपनी गाडी का दरवाजा खोला और पुन: ड्राइविंग सीट पर बैठ , गाडी स्टार्ट की और एक पुराने गीत को इस अंदाज में गाते हुए मंजिल की ओर चल पडा ;
अगर तुम, ड्राइव करते हुए कहीं जा रहे हों, और कॉकरोच घुस जाये............... !

Thursday, April 29, 2010

आज देश को एक लौह पुरुष की दरकार है, किसी भले आदमी की नहीं !

पाकिस्तान के इस बयान का भले ही ज्यादा कुछ महत्व न हो , जिसमे उसने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी तो पाकिस्तान के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने के इच्छुक है, मगर कौंग्रेस पार्टी रोड़े अटका रही है ! पाकिस्तान क्या कह रहा है, उस बात को भले ही हमें ज्यादा अहमियत नहीं देनी चाहिए, मगर यह बात गौर करने लायक है कि उसके इस बयान के अन्दर सन्देश क्या छुपा है! इसे देश के लिए क्या समझे कि देश को प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह जी जैसा "भला आदमी" मिला, जबकि आज देश को किसी भले आदमी की नहीं अपित किसी लौह पुरुष ( कृपया भूल से भी लौह पुरुष का आशय यहाँ पर आडवानी जी से न लें ) की जरुरत थी !यह बात किसी से छुपी नहीं कि देश में पिछले ५-७ सालों में भ्रष्टाचार, महंगाई और अराजकता ने अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले है, देश के किसी कोने में कहीं सुशासन नाम की कोई चीज नहीं रह गई ! यह स्थिति क्यों आती है ? साधारण सी बात है कि जब देश का नेतृत्व किसी भले आदमी के हाथों में हो, जो सिर्फ दिखावे के लिए देश की बजाय अपनी स्वच्छ छवि को ज्यादा अहमियत देता हो, तो निश्चित तौर पर फिर देश के लिए पैदा होता है शर्म-अल-शेख का शर्म, देश के लिए पैदा होती है, अमेरिका की कुटिल राजनीति! पैदा होती है देश के गृह और गुप्तचर विभागों की बेईमानी की समस्या ! पैदा होता है भ्रष्टाचार, पैदा होती है जमाखोरी और महंगाई ! पैदा होता है माओवाद और नक्सलवाद ! क्योंकि सत्ता पर एक भला आदमी जो काविज है, जो इन सब बुराइयों को रोकने की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता ! पाकिस्तान को कहीं से तो यह हिंट मिला होगा कि मनमोहन सिंह जी तो भले आदमी है, और वार्ता के पक्ष में है, मगर उनकी पार्टी यह नहीं चाहती !

Tuesday, April 27, 2010

राजनीति का गड़बड़ झाला !


विपक्ष के कटौती प्रस्तावों के मामले में मायावती ने केंद्र सरकार को अपना समर्थन देकर कह लो या फिर यों कह लो कि केंद्र द्वारा मायावती का समर्थन लेकर, मौजूदा सरकार ने यह जतला दिया है कि वह कितनी वेवश और लाचार है! राजनीतिवाजों द्वारा हमारे इस लोकतंत्र का मजाक बना के रख दिया गया है ! फर्ज कीजिये कि देश के विभिन्न भागों के दस्यु गैंग , तस्कर, माफिया अपने छोटे-छोटे राजनैतिक दल बनाकर, अपने-अपने इलाकों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर प्रत्येक गैंग अपने दस-दस सदस्यों को जिताकर लोकसभा में भेजते है, और वहाँ पहुंचकर सभी गैंग मिलकर एक मिली-जुली सरकार बना डालते है, तो बन गई न दस्यु, डाकुओ की सरकार, होगया न लोकतंत्र का बंटाधार ! इसके बाद कोई भला कुछ कर सकता है ? कुछ नहीं, बड़े शान से, रौब और अधिकार के साथ ये गैंग देश के खजाने की चाबी लेकर माल पर आराम से हाथ साफ़ कर सकते है, बिना किसी रोकटोक के! यही है आज के इस दौर में लोकतंत्र की सच्चाई! जिनका अपना खुद का कोई ईमान न हो, वो भला देशवासियों को ईमान पर चलने की सलाह किस मुह दे सकते है? २० से २२ जुलाई २००८ को दिल्ली में यूपीए सरकार के पिछले दौर में अमेरिका से परमाणु करार के बहाने सरकार बचाने के लिए जो कुछ हुआ, वह किसी से छुपा नहीं था, और वही आज फिर संसद में विपक्ष के कटौती प्रस्तावों को लेकर हो रहा है ! कटौती प्रस्ताव लोक सभा के सदस्यों के हाथ में एक वीटो पावर है, जिसका इस्तेमाल कर वे वित्त विधेयक अथवा बिल पर चर्चा में हस्तक्षेप कर सकते है और इस कटौती प्रस्ताव को सदन में सरकार के शक्ति परीक्षण के औजार के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते है ! अगर सरकार इस पर बहुमत नहीं जुटा पाती है तो उसे इस्तीफ़ा देने के लिए बाध्य किया जा सकता है! और इस बात से यह साफ़ जाहिर होता है कि यह सरकार कितनी दिशा और सिद्धांतविहीन है, और उसे डर है कि कहीं वे बहुमत का समर्थन न जुटा पाए तो ? इसीलिए जो मिल जाए उसे गले लगा लो, कभी मुलायम सिंह दोस्त बन जाते है, वही मुलायम सिंह जिनके शासन काल में इनके युवराज उत्तर प्रदेश में घूम-घूमकर उनकी खामियां बता रहे थे ! और आज फिर वही सब मायावती के साथ भी दोहराया जा रहा है! क्या यही इनकी उच्चकोटि की राजनीति के मापदंड रह गए है?

Monday, April 26, 2010

क्रिकेट प्रेमियों से एक सवाल !

मुझे नहीं मालूम कि अभी यह सवाल उठाना कितना तर्कसंगत अथवा जल्दबाजी वाली बात है ! मगर जैसे कि ख़बरें है और आरोप लगाए गए है, कल अगर यह पूर्ण सत्यापित हो जाता है कि आई पी एल के कुछ अथवा सभी मैच आईपीएल प्रवंधन के सदस्यों के निर्देश पर फिक्स थे ! आई पी एल के प्रवंधन को तो एक तरफ रख दीजिये, लेकिन दूसरी तरफ इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि उसमें खेलने वाले खिलाड़ियों की भी इसमें कोई न कोई भूमिका रही थी क्योंकि उन्होंने पैसे लेकर, ऊँची कीमतों में बिककर जनता और देश को धोखे में रखा ! एक ईमानदार सवाल यह है कि तो क्या तब यह सब जानने के बाद भी आप लोग इन खिलाड़ियों को वही मान-सम्मान, महान और पता नहीं क्या-क्या दर्जा देंगे, जो आजतक देते आये है? अथवा आपको तो सिर्फ अपने मनोरंजन से मतलब है, मैच में वो लोग क्या करते है, उससे आपको कोई सरोकार नहीं, कोई मतलब नहीं ?

Saturday, April 24, 2010

आई पी एल ही क्या यहाँ तो सभी कुछ फिक्स है !

आजादी के बाद से ही हमारा यह देश विवादों और जांच में ही संतृप्त रहा ! अपनी सहूलियत और फायदे के हिसाब से हमने सब कुछ पहले से फिक्स करके रख छोड़ा ! अपना उल्लू सीधा करने के लिए कब किस विवाद को उठाना है, कब किस तरह जनता की आँखों में धूल झोंकनी है और मूर्खों को मूर्ख बनाना है, कब किस तल्वाचाट खबरिया माध्यम के मार्फ़त क्या खबर/ सन्देश लोगो तक पहुंचाना है, सब फिक्स है! यह भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए, यदि कल को हमको/ आपको यह सुनने को मिले कि २८ दिसंबर १८८५ को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बोम्बे में ही यह भी फिक्स हो गया था कि इस देश को आजादी कब दी जायेगी !

आज देश की अनेको ज्वलंत समस्याओं को दरकिनार कर हरजगह आई पी एल ही छाया हुआ है! आपको याद होगा कि अभी कुछ महीनो पहले, वक्त की महता और कुछ लोगो की सहूलियत के हिसाब से कोड़ा प्रकरण भी इसी तरह छा गया था, उसके बाद उसका क्या हुआ कोई नहीं जानता, और न कोई पूछने की जुर्रत करना चाहता है! आज भी हरतरफ से प्रधानमंत्री, सुपर प्रधानमंत्री और वे सभी लोग, चाहे वे इसमें हिस्सेदार है अथवा नहीं, इस विवाद में सम्मिलित हो रहे है, जिन्हें अपनी रोटियाँ सेकनी है ! तसल्ली के लिए अब लोगो को बताया जा रहा है कि कैसे मूर्खों को मूर्ख बनाने और अंधी कमाई के लिए आई पी एल के खेल पहले से फिक्स किये गए थे , मानो इस बात का कलतक इन्हें बिलकुल भी पता न रहा हो कि यहाँ क्या खिचडी पक रही है?

बोलीवुड और क्रिकेट, पैसे के मामले में खासकर ये दो ऐसे क्षेत्र है जहां ये तो क्या एक आम हिन्दुस्तानी भी जानता है कि मैच फिक्सिंग, काला धन, प्रॉक्सी मालिक, समाज विरोधी तत्व ,यहाँ तक कि राष्ट्र विरोधी तत्व भी इस क्षेत्र में हमेशा से शामिल रहे है ! सभी कुछ फिक्स रहता है यहाँ, यह भी कि कौन क्या खिचडी पकाएगा और यह भी कि बर्तन में उबाल कब तक लाना है ! एक तीर- दो शिकार ; एक शिकार वह जो कुछ समय पहले से अपनी उल-जुलूल हरकतों से पार्टी के लिए मुसीबतें खडी कर रहा था, अत: उसे चुप कराने का इससे बेहतर और क्या नुख्सा हो सकता था! और दूसरा शिकार वह जो अपने दल को इनकी पार्टी के साथ पूर्ण समर्पित न करके इनके विरोधियों से हाथ मिलाकर कुछ समय से इनके लिए एक राज्य में चुनौती खडी कर रहा था! अब जांच में फँस जाएगा, इसलिए अपनी भंवे नहीं तान पायेगा, कुछ वक्त के लिए ! ऐसा नहीं कि इन्हें मालूम न हो कि कौन कितना दूध का धुला है और कौन कितने पानी मैं है ?

हमारे भ्रष्ट नेता लोग विवादों की इस सोने की खान में हमेशा ही डुबकी लगाने के लिए तत्पर रहते है, ताकि वो असली जांच, जो वास्तव में की जानी चाहिए, को रोका जा सके !

Friday, April 23, 2010

एक जरूरी पोस्ट, खासकर महिलाओं के लिए !

यों तो इस विषय पर अंगरेजी में नेट पर काफी जानकारी उपलब्ध है, साथ ही हमारे देश के अंगरेजी समाचार पत्रों में भी इसके बारे में छप चुका है ! मगर हिन्दी में इसके बारे में ढूँढने पर मुझे कुछ भी हासिल नहीं हुआ ! ( हो सकता है क़ि इस बारे में मैं गलत हूँ, मगर सच में मुझे ऐसी कोई जानकारी नेट पर नहीं दिखी ) फिर भी सोचा क़ि इसके बारे में हिंदी में भी जानकारी अपने ब्लॉग पर उपलब्ध कराऊं ! यह मुंबई पुलिस बल के एक सदस्य द्वारा मूलतः अंगरेजी में मेल से भेजा गया है ! आप लोगो से अनुरोध है क़ि इस जानकारी को सब लोग अपने जानने वालों, खासकर अपनी पत्नी, बहनों, बेटियों, भतीजियों, माँ, महिला मित्रों और सहकर्मियों के साथ साझा करें !

एक पेट्रोल पंप पर, एक आदमी आया और उसने कार में पेट्रोल भरवाती एक महिला को अपना परिचय एक चित्रकार के रूप में देकर अपनी सेवाओं की पेशकश की , और उस महिला को अपना बिजनेस / विजिटिंग कार्ड थमाया ! उस महिला ने कुछ नहीं कहा. लेकिन सरासर आग्रह और आदरपूर्ण ढंग से पकडाए गए उस कार्ड को उसने स्वीकार किया और अपनी कार के डैशबोर्ड पर रख दिया! इसके बाद वह आदमी एक अन्य व्यक्ति के द्वारा संचालित कार में जा बैठा !

जब वह औरत ड्राइव करते हुए पेट्रोल पम्प से बाहर निकली तो उसने देखा क़ि वे दोनों पुरुष भी पीछे से उसकी गाडी को अपनी गाडी से फ़ॉलो करते हुए उसके पीछे-पीछे आ रहे है ! उसे चक्कर आना शुरू हो गया और उसकी सांस गले में अटकने लगी ! उसने कार की खिड़की खोलने की कोशिश की तो महसूस किया कि उसके हाथ पर गंध था, यह वही हाथ था जिससे उसने उस व्यक्ति से सर्विस स्टेशन पर कार्ड लिया था !


उसने देखा क़ि वे दोनों पुरुष एकदम उसके पीछे आ गए तो उसे खतरे का पूर्ण अहसास हो गया, दिमाग में एक अंतिम प्रयास की बात सूझी और उसने गाडी सर्विस लेंन में घुसा कर सहायता के लिए लगातार होर्न बजाना शुरू कर दिया! यह देख दोनों व्यक्ति भाग खड़े हुए! लेकिन महिला को पूर्ण होश में आने में काफी वक्त लगा ! और जाहिरसी बात है क़ि उस कार्ड पर लगा पदार्थ उसे गंभीर रूप से घायल भी कर सकता था !

इस दवा का नाम है '' BURUNDANGA ",(ज्यादा लोगो को इसकी जानकारी नहीं है ) और यह उन असामाजिक तत्वों द्वारा प्रयोग किया जा रहा है जो अपने शिकार को अशक्त बनाकर चोरी, अपहरण और अन्य किसी लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं ! यह दवा बेहोशी की दवा से चार गुना अधिक खतरनाक है और एक साधारण कार्ड या कागज पर आसानी से हस्तांतरित की जा सकती है ! इसलिए कृपया ध्यान रखे और सुनिश्चित करें कि जब आप सड़कों पर अकेले हों तो किसी भी अनजान से कार्ड अथवा कोई कागज़ स्वीकार न करें ! यहाँ तक क़ि जब आप घरों में भी हों तो यह सुनिश्चित करें क़ि कोई भी आकर किसी प्रकार की सेवा की पेशकश करते हुए आपको कोई कार्ड अथवा कागज न पकडाए !

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burundanga क्या है?

बुरुन्दंगा, scopolamine दवा का सड़कछाप संस्करण है! यह नाईट शेड परिवार के पौधों जैसे हेनबैन और जिम्शंबीन जैसे पौधों उत्खनन से बना है !

यह एक deliriant है, जिसका अर्थ है भटकाव जैसे प्रलाप के लक्षण उत्पन्न करना, स्मृति खो देना, मतिभ्रम और व्यामोह! अत: आप देख सकते हैं क़ि क्यों यह अपराधियों के लिए लोकप्रिय है ! पाउडर के रूप में आसानी से scopolamine खाद्य या पेय पदार्थों में मिलाकर , या 'पीड़ितों के चेहरे पर सीधे उड़ाकर उनकी साँस के साथ मिलाया जा सकता है! दवा तुरंत मस्तिष्क और मांसपेशियों में बाधा तंत्रिका आवेगों के संचरण के द्वारा "zombifying प्रभाव" उत्पन्न करती है !
अत: आप सभी से अनुरोध है क़ि खुद भी जागरूक बने और इसके बारे में लोगो को भी बताकर जागरूक करे !
धन्यवाद !

Thursday, April 22, 2010

किसी सज्जन ने अपने इस भाई की सुद ली ?



जैसा कि आप सभी जानते है कि हाल ही में आइसलैंड के ज्वालामुखी विस्फोट ने पूरे यूरोप में ही नही बल्कि दुनियाभर में तहलका मचा दिया ! समय बलवान होता है, अत: सभी कुछ शनै:-शनै: सामान्य स्थिति में आ जाएगा ! लेकिन जिस रोज यह घटना घटी , मेरे जहन में सर्वप्रथम उपरोक्त क्लस्टर मानचित्र ही कौंधा ! और कौंध गया यह सवाल कि अपना वह हिन्दुस्तानी भाई किन परिस्थितियों में होगा, जो रोजी-रोटी के खातिर अपनी माटी से दूर उस निर्जन बर्फीले प्रदेश में रहता है ? इस दौरान वह सज्जन किस मानसिक तनाव से गुजर रहे होंगे , हम महसूस कर सकते है !

आइये, हम सब मिलकर यह कामना करें कि वे जो कोई भी हों, अगर इस हादसे के वक्त वहाँ पर ही रहे हों, तो सुरक्षित और सकुशल होंगे, और भगवान् उन्हें सुखमय लम्बी उम्र दे !

लघु व्यंग्य- इंडियन पापी लीग !


खुशखबरी है साहब ! आजकल कुछ समय से मैंने भी सोचना शुरू कर दिया है, और इसी सोचने का परिणाम है यह धांसू आइडिया । मैंने सोचा, सोचा क्या ये समझो पक्का इरादा कर लिया है कि बड़े-बड़े तर गए, अपने मौन सिंह जी के शब्दों में कहे तो 'बिग फिश', बोले तो बड़ी मछलियां, कमा-धमा के इस देश से, वो बात और है कि उस कमाई पर ब्याज स्वीटजरलैंड वाले खा रहे है। अब हम भले ही बड़ी मछली न हों , मगर मेंडक के काले-काले बच्चों की तरह जमुना जी के गंदले पानी में अपनी काली पूँछ हिलाकर और हाथ-पैर मारकर , हम भी अपनी दो-चार पुश्तों का भला कर ले, तो बुराई क्या है?

अत: अत्यंत हर्ष के साथ हम आपको सूचित करते है कि हमने भी एक नई कंपनी फ्लोट करने का आवेदन कंसर्न डिपार्टमेंट को भेजने का पक्का मन बना लिया है। सोच रहा हूँ कि कंपनी का मुख्य बिजनेस (खेल) होगा "गिल्ली-डंडा", कम्पनी का नाम रखूंगा, 'इंडियन पापी लीग'! देश के जितने भी पापी इस कंपनी के शेयर होल्डर बनना चाहे, बन सकते है । 'मोटो' होगा " मैं तर लूं , तू तब कूदना "। अब आप कहोगे कि कंपनी का ऐसा नाम रखने की ख़ास वजह क्या है? अरे जनाव, नाम में ही तो सब कुछ धरा है, और खासकर इस देश में। और जब पूरा का पूरा देश, नाम के साथ मेल खाने वाले ग्राहकों, कस्टमरों और क्लाईंटों से पटा पडा हों तो बात ही कुछ और होती है । बस, नाम धासू होना चाहिए। पतिदेव की दिनभर की घूस और बेईमानी की कमाई को श्रीमती जी उस ब्रांडेड आइटम पर खर्च करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचायेंगी। आखिर अपने मोहल्ले में अपनी प्रेस्टीज भी तो बनाए रखनी है। बस, अपने प्रोडक्ट का थोड़ा प्रचार अच्छा हो जाए, वो कहते है न कि 'फस्ट इम्प्रेशन इज लास्ट इम्प्रेशन।' उदघाटन के लिए मोनिया माता जी अपने चरण कमलों की धूल, नारियल के नीचे रखे तांबे के कलश पर डाले दे, फिर देखो, अमेरिका से बुलाई गई गोरी-गोरी चमड़ी और रेशमी बालों वाली आइटम गर्ल अपनी झल्लिका घेरावत के साथ मिलकर कैसे ठुमक-ठुमक कर दर्शक दीर्घा में बैठे, मुह से लार टपका रहे मोटे- खूसट पापियों का मन लुभाती है। और यह बड़े ही सौभाग्य की बात है हमारे लिए कि नाम के हिसाब से मेल खाने वाले मोटी तोंद के शेयर होल्डर भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है, अपने देश में। जो सीधे दस का सौ करने में इंटेरेस्ट रखते है। मैच देखने के लिए ऐसे दर्शकों की भी कोई कमी नहीं है, जिनके मम्मी-पापा किसी मलाईदार सरकारी डिपार्टमेंट में कार्यरत न हों, अथवा, पापाजी दूकान को कभी-कभार बेटे के भरोसे छोड़कर लंच करने न जाते हो।बस इस बीच में एक ग्राहक टपक जाना चाहिए ढंग का, बेटे जी उसी से पूरी मैच की टिकिट की वसूली कर लेते है।

एक बार चल पडी तो मैं कम्पनी का चेयरमैन बन जाउंगा। मगर हाँ, ट्वीटर को तो बिलकुल भी हाथ नहीं लगाउंगा, चाहे मेरा जिगरी दोस्त सुरुर पूरे शुरूर के साथ ही क्यों न उकसाए ऐसा करने के लिए मुझे। शेयर चाहे प्रेमिका के मार्फ़त खरीदो अथवा बीबी के मायकेवालों के मार्फ़त, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। बस शेयर ऊँची बोली में उठने चाहिए, बाद बाकी तो मुझे किसी से कुछ लेना-देना नहीं! फ्रेंचाइजी के लिए नेता-मंत्रियों और मोटी अफसरशाही के सारे रिश्तेदारों का हमेशा ही गोपनीय ढंग से स्वागत किया जाएगा। टैक्स बचाना है तो सरकार की नाराजगी तो बिलकुल भी नहीं लूंगा, क्योंकि इनकी कमवक्त एजेंसियों की कुम्भकर्णी नींद भी तभी टूटती है जब सरकार नाराज होती है, वरना तो मछली क्या , यहाँ से बड़े-बड़े घड़ियाल और मगरमच्छ तैर के निकल जाते है, और ये कभी खुंदक में दबोचते भी है तो मेंडक के बच्चों को।
नोट: छवि गुगुल से साभार

Wednesday, April 21, 2010

ये है विश्व बंधुत्व की एक और मिसाल !



हमारा धर्म सर्वश्रेष्ठ है, वह हमको शान्ति और विश्व बंधुत्व (धर्म विशेष का ) का मार्ग दिखलाता / सिखलाता है, यही एक सच्चा धर्म है, बाकी सब धर्म झूठे है, तुच्छ है, जो भी इस धर्म को अपनाता है, ऊपरवाला उसे सीधे ऊपर अपने पास ही नैसर्गिक सुखों को भोगने के लिए बुला भेजता है....इत्यादि, इत्यादि, ये दावे तो अक्सर आप लोग भी रोज ही किस्से-कहानियों और महापुरुषों के उपदेशों में भी पढ़ते-सुनते होंगे। कल ही ईरान में तो ऐसे एक महापुरुष जोकि आगे चलकर धर्मान्धो के पथ-प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है, ने यहाँ तक दावा कर डाला कि औरतों के ठीक से कपडे न पहनने से भूकंप आते है। अब आपको इस ख़ास विश्व बंधुत्व की एक और घिनोनी मिसाल दिखाते है कि किस तरह जहां ये बहुसंख्यक होते है, और जब इन्हें किसी और धर्म का बकरा हलाल करने हेतु नहीं मिलता, तो ये जाति और रंगभेद का सहारा लेकर अपने ही धर्म के बकरे को हलाल कर डालते है।

अमेरिका, रूस और चीन के लिए सामरिक दृष्ठि से महत्वपूर्ण किर्गिज़स्तान, जोकि पहले सोबियत संघ का एक हिस्सा था, आज मध्य एशिया में स्थित एक लोकतांत्रिक देश है। चारों तरफ जमीन और पहाड़ियों से घिरे इस देश की सीमा उत्तर में कज़ाख़िस्तान, पश्चिम में उज़्बेकिस्तान, दक्षिण पश्चिम में ताजिकिस्तान और पूर्व में चीन से मिलती है। किर्गिज़स्तान का शाब्दिक अर्थ है, चालीस जनजातियों का समूह। यों तो अपने देश में भी आजादी के बाद से ही लोकतंत्र के अनुभव बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं रहे है, लेकिन जैसा की अमूमन देखा गया है कि मुस्लिम बहुल देशों में तो अक्सर लोकतंत्र बिलकुल भी सफल नहीं रहा है। जिसके कि बहुत से कारण है, लेकिन जो प्रमुख कारण है, वह है, रूढ़िवादिता और आजादी का सही इस्तेमाल न कर पाना।


अभी हाल में सत्तारूढ़ दल की बेरोजगारी, महंगाई के प्रति उदासीनता, भ्रष्टाचार और कुशासन से त्रस्त जनता की भावनाओं का फायदा उठाकर वहाँ के विपक्ष ने राष्ट्रपति कुर्मानबेक बाकियेव की सत्ता पलटकर उसपर अपना कब्जा जमा लिया था,जिसमे कि अनेक लोग मारे गए थे। विगत सोमवार को किर्गिज़स्तान के कर्गिज में जातीय हिंसा, लूटमार और आगजनी की घटना में कई लोग मारे गए । बहुसंख्यक कर्गिज मूल के लोगो ने चुनचुनकर अल्पसंख्यक तुर्क लोगो का एक पूरा गाँव ही जला डाला। इस आक्रमण के बाद मयेव्का गाँव के बाकी लोग तो भाग गए, मगर एक बुजुर्ग तुर्क अल्प्संखयक अपने दोमंजिला घर को लुटेरों से बचाने का प्रयास करता रहा। लेकिन बहशीपन की हद देखिये, आक्रमणकारियों ने न सिर्फ उसे चाकुओं से गोंद डाला, वरन उसे मारने के बाद उनके नकली दांत भी निकालकर ले गए, क्योंकि उनपर सोने की परत चढी हुई थी । तो यह है इस विश्व बंधुत्व का एक और जीता-जागता उदाहरण। साथ ही एक बात और कहना चाहूँगा कि खैर, जब तक इस देश में हिन्दू बहुसंख्यक है, शायद किर्गिज़स्तान वाली नौबत तो यहाँ नहीं आयेगी, मगर जिसतरह इस लोकतंत्र में भी सरकारे महंगाई, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की अनदेखी कर मनमानी कर रही है, तो उन्हें भी यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता के सब्र की भी एक सीमा होती है।

लड़ रहा किसके लिए ?
कभी सोचा कि वो है क्या, जो तुझे मिल पायेगी,
क्या स्वर्ग, क्या जन्नत,
अरे मूर्ख सारी तमन्ना धरी की धरी रह जायेगी !
सच तो ये है कि मैं चंद लकड़ियों
और तू दो गज जमीन को तरसेगा,
जब ये जिन्दगी ख़त्म होने के कगार पर आयेगी !!

छवि Reuters से साभार ! अंगरेजी में विस्तृत खबर आप यहाँ पढ़ सकते है

Monday, April 19, 2010

महानगरीय चिड़ियाओं का दर्द !

प्रात: भ्रमण के उपरान्त बरामदे में बैठ बस यूँ ही शून्य को निहार रहा था कि सहसा नजर चिड़ियाओं का कोलाहल सुनकर सामने पार्क के एक छोर पर लड़ रही कुछ चिड़ियाओं पर जा टिकी। उनके व्यवहार से लग रहा था कि वे एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू है। बहुत देर तक उन्हें ही निहारता रहा। और स्थित तब जाके कुछ स्पष्ट हुई, जब पार्के के कोने पर स्थित एकमात्र छोटे से नीम के पेड़ पर वे सभी उड़कर आई। यह लड़ाई एक घोसले के लिए चल रही थी। दिलो - दिमाग को कुछ पल यह सोच कर बड़ा कष्ट हुआ क़ि हम स्वार्थी इंसानों ने कितनों के घर उजाड़ दिए अपना घर बसाने के चक्कर में।

यह सोचकर थोड़ा गुस्सा भी आया कि हम, हमारी सरकार और हमारे कुछ तथाकथित पर्यावरणविद, जानवरों और परिंदों के नित लुप्त होते संसार का रोना तो बहुत रो लेते है , मगर इनका घर बसाने की कभी किसी ने कोई सार्थक पहल करनी तो दूर , इस बारे में सोचने तक की जुर्रत नहीं की कि हमारे थोड़े से प्रयास से कैसे हम इन्हें अपनी भावी पीढ़ियों के लिए बचा कर सकते है। धिक्कार है ऐंसी स्वार्थी इंसान प्रजाति के लिए, जो एक अदद दीमाग होने के बावजूद भी सिर्फ अपने लिए ही सोचती है। अभी सालभर पहले मैं देखता था कि किस तरह दिल्ली की सडको के आस-पास से हजारों पेड़ों की बलि सिर्फ इसलिए दे दी गई क्योंकि हमें "कॉमन वेल्थ" कमानी थी।मगर हम भूल गए कि उन पेड़ों के साथ हमने कितने परिंदों के घर बसाने का सपना चकनाचूर कर दिया। और तो और हने उन बेघर होकर सड़क पर आये पशु-पक्षियों को "आवारा" की संज्ञा दी।हरामखोर, खुद आवारा गर्दी कर दूसरों का घर उजाड़ते है, और फिर उन्हें ही आवारा भी कहते है।

खैर, इस सरकार से, जो इंसानों की नहीं सोच पा रही, उससे यह उम्मीद रखना सरासर ज्यादती होगी कि वह पशु-पक्षियों के बारे में सोचकर उनके लिए कुछ शहरी चारागाह और पक्षियों के लिए घोसलों का इंतजाम करेगी, जोकि अगर इनके पास इच्छा शक्ति होती तो बड़े आराम से यह व्यवस्था की जा सकती थी। मसलन शहर में उगने वाली हर बहुमंजली सरकारी बिल्डिंग में एक फ्लोर पक्षियों के घोंसलों के लिए आरक्षित किया जा सकता था , क़ानून बनाकर शहर में घर बनाने वाले के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए था, कि वह मकान में एक निश्चित मात्रा में कुछ छिद्र (होल) इस तरह के बनाएगा कि जिसमे घर-मोहल्ले के आसपास विचरण करने वाले परिंदे जैसे गौरिया इत्यादि आसानी से अपना घोसला बना सके।

खैर, अगर मेरी बात आप लोगो को पसंद आई हो तो मैं आप लोगो से जरूर यह निवेदन करूंगा कि भले ही इससे आपके घर की सजावट में कुछ खलल पड़ता हो, मगर तनिक इन निरीह परिंदों के बारे में भी सोचकर अपने घर के आस-पास कुछ ऐसी व्यवस्था अवश्य करें कि चंद परिंदे भी आपके सतरंगी सपनो के साथ-साथ खुद के भी सतरंगी सपने संजो सके। "हमी हम हैं तो क्या हम हैं....... ?"

छुपे बैठ , छत पर रखे
कुछ गमलों की ओंट में !
चिड़ी पूछती थी चिडू से,
पगले, घर बसाने के ख्वाब
तो देख रहा है मगर ,
ये सोचा कभी कि
इन इंसानों की बस्ती में
तुझे घोसला बनाने की जगह देगा कौन ?
सुनकर चिडी की बात,
चिडू ने शून्य में कुछ निहारा,
बोलने को गले से खरास निकाली,
मगर शब्द थे कि
निकलने को तैयार ही न थे, अत :
कुछ कहना चाहकर भी वह रह गया मौन !!!

Sunday, April 18, 2010

कुदरत और इंसान !

शुरू करने से पहले आप सभी मित्रों से अनुरोध करूंगा कि इस गोगूल अनुवाद की सुविधा के बारे में आप गोगुल को सूचित करें कि यह एक निहायत घटिया किस्म की सेवा गूगुल द्वारा प्रदत है , क्योंकि यह अक्सर एक पूरे लिखे लेख की भी ऐंसी-तैंसी कर देता है ;
there is a probleM
send or don't send option दिखाकर !

मेरा आज एक लंबा-चौड़ा आलेख इस ट्रांसलिटरेशन ने मिट्टी में मिला दिया, अगर ये गूगुल वाले ठीक से कोई सर्विस प्रोवाइड नहीं कर सकते तो दूकान क्यों खोले बैठे है ?

अब मुख्य बात पर आता हूँ ; आज जब सुबह-सबेरे "अपनत्व ब्लॉग" पर एक ख़ूबसूरत सी कविता पढी ज्वालामुखी विस्फोट के बारे में , तो दिल किया कि अपने कटु अनुभवों को भी आप के साथ शेयर करूँ ! यूँ तो आज इंसान बहुत बड़ी-बड़ी बाते करता है, अमेरिका अपने को सुपर पावर कहता है, मगर हकीकत है, आइस लैंड का ज्वालामुखी ! सब बेबस !!!! मेरे एक करीबी जानने वाले जो कि कनाडा के नागरिक है(एन आर आई ), ओंटोरियो प्रांत के मिस्सिस्सुगा में रहते है और भारत में अपना बिजनेस करते है , उनकी बेटी , जो कि लन्दन में नौकरी करती है और अकेली रहती है , की शादी २३ अप्रेल को तय थी ! माता-पिता अपना जरूरी काम पिछली विजिट में निपटा आये थे , अत:: इस बार १८ अप्रेल की टिकिट वर्जिन अटलांटिक से बुक की थी ! मगर अपने एक असभ्य मेल के मार्फत वर्जिन अटलांटिक ने अपने यात्रियों को सूचित किया कि १९ अप्रैल तक की उनकी सारी फलाईट आइसलैंड ज्वालामुखी के धुंए की वजह से अवरुद्ध हो चुकी हैं ! इस खबर के बाद उन बेचारे माँ-बाप का दुःख देखते ही बनता था ! इस बाबत जो अनुभव अपना रहा, वह यह है कि विदेश से पर्यटन के लिए आये नागरिकों के पास से पैसा ख़त्म हो गया, वे होटल छोड़ एयर पोर्ट पर रात गुजारने को मजबूर है ! यह बात किसी से छुपी नहीं कि पिछले पांच दिनों से लाचार यात्री परेशान है , मगर अपना एक विमान उन दिनों की फ्लाईट के भी फर्स्ट क्लास के कीमत यात्रितों से वसूलने में लगा है , जिन दिनों की सारी फ्लाइटें केंसल हो चुकी ? एक दूसरी खबर की ओर रुख करें, तो पाते है कि यूरोप में फलाईटों की दिक्कत के बाद लोग अधिकांशतः इरो ट्रेन से यूरोप में सफ़र कर रहे है , साथ ही ठण्ड में मुफ्त में यात्रियों को कॉफ़ी मुहैया करा रहे है , यही है फर्क !!!!!!!

Friday, April 16, 2010

आई पी एल- क्या सच क्या झूठ !



जनता बेवकूफ है, तभी तो उच्चपदस्थ मुट्ठी भर लोग इन्हें मूर्ख बनाने में सक्षम है। कुछ लोग कह रहे है कि अब आई पी एल का सच सामने आने वाला है, मैं कहता हूँ जो चीज झूठ की ही बुनियाद पर खडी थी, उसका अब क्या सच सामने आयेगा? कुछ भ्रष्ट लोगो के लिए यह देश आज भी सोने की चिड़िया ही है, क्योंकि यह चिड़िया इन मूर्ख देशवासियों की जेबों से उड़कर उनके पास जाती है। एक सैनिक जिसने देश की चौकसी में उम्र गुजार दी, उसकी मृत्यु पर हम इसलिए मुआवजा नहीं देना चाह रहे कि उसकी मौत शायद हार्ट अटैक से हुई थी और दूसरी तरफ इस देश के लोगो की जेबों से इतना धन बर्षा कि सचिन और धोनी रातों-रात अरबपति बन बैठे। हम उन्हें भगवान मान बैठे। सता पे काबिज इन लोगो को जब अपनी कुर्सी पर आंच आती नजर आई तो अब यह सब ड्रामा लोगो की आँखों में धुल झोंकने के लिए शुरू हुआ , क्या इन्हें या इनकम टैक्स को कल तक यह बात मालूम नहीं थी ? जब तक लूट सको लूटो बस यही सिद्धांत बनकर रह गया, उसके बाद जांच बिठा दो जनता की तस्सली के लिए। कोड़ा का क्या हुआ ? १९८४ के दंगो का क्या हुआ? उसके बाद जो भी घटनाएं, घोटाले घटे, उनकी जांच का क्या हुआ? हम कहते है कि राजनीति में युवा शक्ति को लाओ, आज की युवा शक्ति भी तो शशि थूरूर ही है, और माननीय विदेश राज्य मंत्री यह न भूले कि अगर धुंवा उठा है तो कहीं आग तो जरूर लगी होगी !!!!!

Thursday, April 8, 2010

बस एक ख़याल यूँ ही...


मजहब और खुदा का वास्ता देकर लगातार झूठ पर झूठ, और फिर सब कुछ कबूल ! हम तो यह भी नहीं पूछते कि पहले क्यों ना-नुकुर कर रहे थे जनाब ?और बन्दे की हिम्मत देखिये, अपने दुश्मन देश की पहले एक लडकी को बीबी बनाया, ऐश किये और फिर तलाक देकर, चौड़ा होकर दूसरी लडकी को बीबी बनाने ले जा रहा है! और लोग तथा मीडिया ७६ जवानो की निर्मम ह्त्या की खबर को अनदेखा कर उसकी खातिरदारी और प्रचार (टी आर पी ) में जुटे है! फर्ज कीजिये कि अगर शोएब भारतीय होता और आयशा-सानिया पाकिस्तानी , और यही कुछ उस वक्त भी होता तो क्या उसके वहाँ से सही-सलामत लौट आने की उम्मीद की जा सकती थी ? बस इतना ही कहूंगा कि धन्य है...............!!!

Wednesday, April 7, 2010

क्या इससे देश को ख़तरा नहीं ?

सत्ता पर काविज नेतावों की तो खैर जुबां की कोई कीमत नहीं रही , मगर अभी कुछ समय पहले देश के थल-सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने कहा था कि "The Naxalite problem is a law and order problem, which is a state subject not army problem " आज वायु सेनाध्यक्ष पीवी नाईक ने कहा " "Therefore, I am not in favour of use of Air Force in situations like the Naxal problem,"

देश के अर्धसैनिक बलों को न तो पूर्ण प्रशिक्षित इस नक्सल- माओ कायरता से निपटने के लिए किया गया है और न उन्हें आधुनिक हथियार मुहैया कराये गए है, कल की घटना इसका जीता जागता उदाहरण है, जिसमे देश ने अपने बेशकीमती ( नेताओं और माओआंकाओ के लिए तो कीड़े मकोड़े है ये लोग ) ८० के आसपास जवानो को बेवजह मौत के मुह में धकेल दिया !

तो अब मैं कुछ सवाल इस देश के अपने बुद्धिजीवी वर्ग से पूछना चाहूँगा;

१. एक समय में एक अकेले डाकू मान सिंह को मारने के लिए सेना ( गोरखा रेजिमेंट के जवान बाबर सिंह थापा के नेतृत्व में ) पी.ए. सी के रूप में झोंक दिए गए !
२. पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरवाला के लिए पूरी सेना की बटालियन ही झोंक दी गई !
३. अगर हमारे निहायत बेशर्म पड़ोसी मुल्क चीन और पाकिस्तान सीधे युद्ध के बजाये, हमारे साथ छद्म युद्ध लड़ते है! देश में मौजूद गद्दारों को हथियार और प्रशिक्षण मुहैया कराते है, क्या बाहरी ख़तरा और आंतरिक खतरे में ज्यादा अंतर रह जाता है ?
४. अन्तराष्ट्रीय मुद्दे ; चीन ने थाईमेंन स्क्वायर में सेना का प्रयोग कर सेकड़ो छात्र मौत के घाट उतार दिए ! पाकिस्तान ने लाल मस्जिद में सेना का इस्तेमाल कर सेकड़ो को मौत के घाट उतार दिया !
५. श्रीलंका ने एल टी.टी. का सफाया कैंसे किया आप सब जानते है !
तो क्या हमारी सेनाओं का यह दर्शन ठीक है या ये भी इन नेताओं की गिरफ्त में है ? क्या देश इन नक्सलियों से खतरे में नहीं ?यदि है तो हम इंतज़ार किस बात का कर रहे है ?

मेरे एक मित्र संतोष जी के शब्दों में ;"Who in their right mind will believe that these are merely internal threats and not larger designs
of our unfriendly countries. Just by disguising, an external threat doesn't become an internal threat.
Only an Indian politician and a fool can be hood winked into believing that.

( It was Roosvelt or somebody else, who asked his audience that if you count a dog's tail as a leg then how many legs a dog have ? Many in audience said the dog would have five legs. Roosvelt said , you are wrong , the dog still have four legs , just because of your saying tail is a leg , the tail doesn't become a leg.)

While we be waiting for the enemy on the order to open fire, as it turns out the enemy is already inside
killing people".

सुनहरे तिलिस्म टूटे है !



गली वीरां-वीरां सी क्यों है, उखड़े-उखड़े क्यों खूंटे है,
आसमां को तकते नजर पूछे, ये सितारे क्यों रूठे है। 

डरी-डरी सी सूरत बता रही, महीन कांच के टुकडो की,
कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे है। 

फर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,
देखकर इनको कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे है। 

पटक देतीं है हर चीज, जो पड़ जाए कर-कमल उनके,  
वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे है। 

तनिक हम प्यार में 'परचेत'मनुहार मिलाना भूल गए,
फकत इतने भर से ख़्वाबों के, सुनहरे तिलिस्म टूटे है। 


Tuesday, April 6, 2010

भगवान् उनके परिजनों को इस दर्द को सहने की शक्ति दे !

आज यह बड़े दुःख की बात है कि हमारे देश के भीतर ही मौजूद गद्दारों ने छत्तीसगढ़ में सी आर पी एफ के ७० से ज्यादा हमारे जवानो को मौत के घाट उतार दिया ! पता नहीं कब तक ये रोजी-रोटी के भूखे हमारे पढ़े-लिखे नौजवान इसतरह सत्ता पर काविज और परदे के पीछे छिपे बैठे चोर-चोर मौसेरे भाइयों द्वारा खेले जा रहे गंदे खेल में बेमौत मरते रहेंगे! जितने जवानो को इन कायर बुद्धिविहीन लोगो ने सियासत के गंदे खेल में अपने पिछड़ेपन और सरकार द्वारा उपेक्षा की आड़ में पिछले चंद सालों में मार डाला, उतने जवान तो कारगिल युद्ध में भी नहीं मरे थे! पता नहीं कुछ नपुन्शकों को कब शर्म आयेगी ! भगवन उन बेसहाय गरीब जवानो के परिवारों को इस कष्ट को झेलने की शक्ति दे !

ब्लोगर मित्रों से एक अनुभव शेयर करना चाहूंगा !


आज सुबह करीब ११.१५ बजे से मैंने नोट किया कि मेरे ब्लॉग पर जो भी कोमेंट थे, उनमे से कुछ गायब थे! उदाहरण के लिए मेरा ब्लॉग मेरे कल के लेख पर १४ टिप्पणिया होने की सूचना देता है, जबकि यदि ब्लॉग खोलू तो सिर्फ दस ही है ! मैंने एंटी वायरस भी चला के देख लिया, हो सकता है कि यह ब्लॉग की ही कोई कमी हो! मैंने बहुत याद करने की कोशिश की कि क्या हुआ होगा, क्योंकि सुबह तो पूरी टिप्पणिया मौजूद थी ! मैंने किसी वायरस वाली चीज को तो नहीं छेड़ा, तो मुझे याद आया कि कल मेरे एक लेख पर सिंगापुर से किसी सज्जन की टिपण्णी अंगरेजी में आई थी , जिसमे उन्होंने एक हीरो होंडा से सम्बंधित एक विज्ञापन का वीडियो लिंक दिया था, और लिखा था कि चूँकि यह विज्ञापन आपतिजनक है और आप हिंदी के एक अच्छे ब्लोगर है, इस लिए इसके खिलाफ आप अपने ब्लॉग पर लेख लिख लोगो को जागरूक करे !मैंने सुबह तकरीबन ११ बजे वह वीडियो देखने के लिए खोला , लेकिन व्यस्तता की वजह से जल्दी बंद कर दिया ! मैं दावे के साथ तो यह नहीं कह सकता कि उसी वीडियो के खोलने के बाद मुझे यह समस्या महसूस हुई, मगर आप लोगो को भी इस बारे में जानकारी देना अपना फर्ज समझता हूँ, ताकि अगेर ऐसा कुछ आपलोगों के साथ भी हो तो आप लोग सावधानी बरत सके !
धन्यवाद !


लघु व्यंग्य - ताकि अब और कोई भैंस पानी में न जाए !... TirchiNazar
14 comments
4/5/10
by पी.सी.गोदियाल

उस सज्जन की टिपण्णी इस लेख पर आई थी और वह भी गायब है उस वीडियो को चलाने के बाद से !

मुस्लिम बुद्धिजीवियों से सिर्फ एक सवाल ! TirchiNazar
53 comments
3/18/10
by पी.सी.गोदियाल

Monday, April 5, 2010

लघु व्यंग्य - ताकि अब और कोई भैंस पानी में न जाए !

बहुत दिनों से ग्वालो और चरवाहों को बस यही बात खाए जा रही थी कि आखिर भैंस के पानी में जाने की वजह क्या थी? भैंस अपने चौबारे से बिदकी क्यों? घर में सब कुछ था, न सिर्फ महाजन बल्कि पूरा गाँव ही उसे रोज हरी-हरी घास खाने को देता था। महाजन ने घर में ही उसके लिए स्वीमिंग पुल की भी व्यवस्था की हुई थी। गाँव का एक शरीफ भैंसा भी कुछ दिनों तक उसके इर्द-गिर्द घूमा फिरा था, फिर आखिर क्या वजह थी कि भैंस ने पानी में उतरने का इतना मजबूत फैसला लिया? जबसे इस बात का खुलासा हुआ है कि इसकी असली वजह उस पार के गाँव का दिल फ़ेंक आवारा भैंसा है, तभी से नदी के आर-पार के दोनों गाँवों के बीच में उसी बात की गरमागरम चर्चा हो रही है। कुंए पर पानी लेने इकट्ठा हुई गाँव की कुछ औरतों को तो यहाँ तक कहते सुना गया कि कलमु.... का गंगापार के भैसे से पहले से ही चक्कर चल रहा था, इसलिए उसने गाम के शरीफ भैसे को छोड़ दिया। कुछ कहती थी कि हमें इन बातों में नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि वह निहायत ही उसका पर्सनल मामला है। उसकी मर्जी वह जिससे चक्कर चलाये। कुछ जो समझदार किस्म की थी उनका मत था कि गाम के लोग कितने मूरख है, बेफालतू एक अदनी सी भैस को फूक में चढ़ा रहे है। कुछ कह रही थी कि बेशर्मी की हद तो देखो, उस आवारा, लोफर को अपने खूंटे तक बुला लिया, और अपने इन कुछ तेज-तर्रार सेकुलर खबरिया चैनलों की शर्म की हद देखो, इनकी ओबी वैन भी पता नहीं कहाँ से उसी वक्त वहाँ पहुँच गई, और लगे टीआरपी बटोरने कि इसकी एक्सलूसिव तस्वीरे सिर्फ वही दिखा रहे है। जैसे कि मानो हम लोगो ने आज तक किसी भैंस-और भैंसे दोनों को इकट्ठे न देखा हो, हद होती है, नौटंकी की भी।

उधर गाँव के बड़े-बुजुर्गों की भी इस बारे में अलग ही खिचडी पक रही थी। कुछ कट्टर किस्म के धर्मांध तो यहाँ तक कहने लगे थे कि जब गाय की पूछ पकड़ वैतरणी पार की जा सकती है तो कम से कम इस भैंस की पूँछ पकड़कर उस पार के गाम तो जा ही सकते है। कुछ मन ही मन खुश भी हो रहे थे कि इसकी देखा-देखी कर हमारी भैसे भी बिगड़ रही थी, चलो पिंड छूटा, उपरवाला जो करता है सब भले के लिए ही करता है। गाँव के कुछ निहायत बीच के लोग जो बीच के ही बने रहने में अपनी शान समझते है, कह रहे थे कि इससे दोनों गामो के बीच में सौहार्द बढेगा, उनकी यह बात सुनकर पास ही खडा पल्टू गधा भी कुछ देर तक जोर से ढेंचू-ढेंचू करता रहा था, मानो कह रहा हो कि तुम नहीं सुधरोगे। कुछ अपने को गाँव का हितैसी समझने वाले महारथी काफी गंभीरता से एक प्रस्ताव पर विचार कर रहे थे कि भैसे के दागी चरित्र को इतना उछालो कि आगे से कोई भी भैंस किसी परदेशी भैसे के साथ जाने की हिमाकत न करे! साथ ही उन्होंने सर्वसम्मति से यह भी निर्णय लिया कि आइन्दा वे अपनी किसी भी भैस को इसतरह खुली नहीं छोड़ेगे। उधर महाजन जब अपने वीरान पड़े खूंटे की तरफ नजर डालता तो दुखी होकर बस यही गुनगुनाता कि ;
ग्वालों की दुवाए लेती जा, जा तुझको टिन के पक्के छप्पर का वास मिले,
मायके के खेत-खलियान की कभी याद न आये, वहा ऐसी हरी-हरी घास मिले।

Sunday, April 4, 2010

जनगणना मे यह जानकारी भी ली जानी चाहिये थी…

जैसा कि सभी जानते है कि देश में जनगणना का काम एक अप्रैल से शुरु हो चुका है। इस बार इस जनगणना मे भरे जाने वाले फ़ार्म मे एक आम नागरिक के जीवन से समबन्धित बहुत सी बातों की जानकारी लेने का प्रयासकिया जा रहा है। साथ ही मगर मेरा यह भी मानना था कि क्या ही अच्छा होता कि सरकार यह भी इस जन गणना के माध्यम से जानने का प्रयास करती कि दूसरों को बडे-बडे उपदेश देने वाले हमारे इन भ्रष्ठ प्रजाति के प्राणि की मलीन बस्तियों से देश रक्षा का जज्बा लेकर राजनीतिक नेतावों के कितने बच्चे पिछले दस सालों मे सेना मे गए?



मातृ-रुंधन
चाहे गुहार समझो मेरी,
या समझ लो इसे दृढ ऐलान,
न दूंगी अब एक भी सपूत अपना
तुम्हें करने को देश पर बलिदान ।

एक तरफ़ तो सेना मे
अफ़सरों की कमी का रोना रो रहे,
दूसरी तरफ़ उन्हे घटिया हथियार और
निरन्तर मिग दुर्घटनाओं मे खो रहे।

देश मे व्याप्त लूट-भ्रष्ठाचारी का
कर न दोगे जब तक निदान ,
न दूंगी तब तक एक भी सपूत अपना
तुम्हें करने को देश पर बलिदान ।

अपना तो तुम्हारा कुटिल,कपटी, कपूत
नित हर रहा द्रोपदी के चीर को,
और पेंशन को भी मोह्ताज कर दिया,
देश रक्षा करने वाले वीर को ।

सीख न लो जब तक करना
सह्रदय से वीरों का सम्मान,
मैं न दूंगी एक भी सपूत अपना
करने को तुम्हें देश पर बलिदान ।

Saturday, April 3, 2010

सेक्युलर खबरे और भेद-भाव पूर्ण मुस्लिम मानसिकता !

जैसा कि आप जानते ही है कि हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात यानि यूएई की शरिया कोर्ट ने 28 मार्च २०१० को 17 भारतीयों को फांसी की सजा सुनाई है। 17 भारतीयों को एक पाकिस्तानी नागरिक की हत्या के जुर्म में मौत की सज़ा सुनाई गई है। कोर्ट ने ये फ़ैसला 2009 के एक मुक़दमे में सुनाया है। 17 भारतीयों पर आरोप था कि उन्होंने शराब के ग़ैर क़ानूनी कारोबार पर अपना क़ब्ज़ा जमाने के लिए एक झगड़े में एक पाकिस्तानी नागरिक की लोहे की छड से मारकर हत्या कर दी थी।यूएई में पहली बार अदालत की ओर से किसी एक मामले में इतने लोगों को मौत की सज़ा दी गई है। वर्ष 2009 के जनवरी में शारजाह के अल-सजाह नामक स्थान पर भारतीयों और पाकिस्तानी नागरिकों के बीच ग़ैर क़ानूनी शराब के धंधे को लेकर वर्चस्व की लड़ाई हुई थी। इस लड़ाई में पाकिस्तानी नागरिक पर लोहे की छड़ से हमला किया गया था, ये लोग वहां मज़दूरी करने गए थे।फैसला आने के बाद सरकार जागी जरूर, मगर देर से। इससे पहले वहाँ स्थित सरकारी दूतावास क्या कर रहा था, क्या कभी उन्होंने इन लोगो की सुद लेने की कोशिश की? मुजरिम भले ही किसी भी धर्म-सम्प्रदाय का हो उसे देश के कानूनों के मुताविक सजा मिलनी ही चाहिए, मगर साथ ही सजा सुनाने वाले को भी मापदंडो का बिना भेद-भाव अनुसरण करना चाहिए।

ये तो थी खबर संक्षेप में, और इसे आप संक्षेप खबर न कहकर यूँ भी कह सकते है कि मीडिया ने ( प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक ) बस यही खबर फैसला आने के कई दिनों तक अपने-अपने माध्यमो पर चलाई थी, मगर किसी ने यह जुर्रत न समझी कि खबर के साथ-साथ यह भी बता दें कि सजा पाने वाले लोग कौन से धर्म के, और किस प्रान्त के रहने वाले थे ? सेक्युलर मीडिया अगर ऐसा बता देता तो इनकी सफ़ेद कमीज और हरी पैंट पर साम्प्रदायिकता का दाग नहीं लग जाता , इनके मातहतों पर वोट-बैंक नाराज नहीं हो जाता। अभी दो दिन पहले इन्होने अपने अखबारों के मुखपृष्ठ पर एक खबर प्रमुखता से छापी थी कि अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक कश्मीरी छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में, जहां कि क़ानून में अध्ययनरत छात्रों का एक दल घूमने गया था, वहाँ उसने अपनी धार्मिक टोपी सिर से उतारने से न सिर्फ मना किया, बल्कि इसपर सवाल उठाते हुए हंगामा भी खडा कर दिया। जबकि यह कोर्ट की परम्परा रही है कि अदालत के अन्दर टोपी उतार कर जाते है, और उसी परम्परा के आधार पर वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी ने उसे टोपी उतारने को कहा था।उस खबर को प्रमुखता देने का उद्देश आप खुद समझ सकते है , सवाल यह नहीं है कि टोपी उतारना सही है अथवा नहीं, सवाल यह है कि आपको समाज में मौजूद शिष्टाचार का पालन करना चाहिये, लेकिन नहीं वहाँ भी इन्हें अपना धर्म ही नजर आया। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि जहां आपको इज्जत दी जा रही है, वहां आप इस तरह का नाजायज फ़ायदा उठाते है।

जैसा कि अब तक आपलोग भी जान चुके होंगे कि इस १७ सदस्यीय फांसीयाफ्ता दल में लगभग सभी युवक हिन्दू और सिख है और ज्यादातर पंजाब प्रांत के है। एक नासमझ बच्चा भी क़त्ल की पृष्ठभूमि को देखकर अदालत के निर्णय पर उंगली उठा सकता है। क्योंकि निर्णय में बहुत से खोट है। इस देश में ये लोग गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी से इन्साफ मांग रहे है, लेकिन अपनी गिरेवान में झांकना भूल जाते है कि इनके शरिया कानूनों का ये खुद ही किस तरह मखौल उड़ाते है। जुबान पर अल्लाह का नाम रखेंगे और दिनभर में ह़जार झूठ बोलते रहेंगे। कसाब के मामले में पाकिस्तान की अदालतों का कपट पूर्ण व्यवाहार जग-जाहिर है, कि किस तरह उन्होंने मुंबई दंगो के मास्टर माइंड को बचाया । बाकी सब कुछ अगर भूल भी जाइए तो ये लोग अपनी कुरआन की और शरिया कानूनों की बार-बार दुहाईया देते हुए कहते है कि उसके मुताविक जो व्यक्ति मुसलमान है, उसके लिए शराब और उससे सम्बंधित कारोबार ही इस्लाम के मुताबिक
हरामहै; ( यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैंने अपने इस लेख में कहीं भी इस्लाम की बुराई नहीं की है क्योंकि मुझे धर्म से कोई शिकायत नहीं है, मैं बुराई कर रहा हूँ उसे मानने वालो की, उनके पक्षपातपूर्ण व्यवहार की )
quran:
ऐ ईमान लानेवालो! ये शराब और जुआ और देवस्थान और पाँसे तो गन्दे शैतानी काम है। अतः तुम इनसे अलग रहो, ताकि तुम सफल हो॥5. अल-माइदा 90॥

शैतान तो बस यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच शत्रुता और द्वेष पैदा कर दे और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे, तो क्या तुम बाज़ न आओगे?॥91॥

अब मजेदार बात यह है कि जिस पाकिस्तानी को इन ५०-६० हिन्दू और सिख मजदूरों ने पीटा था ( जानकारी के मुताविक उन्होंने उसे मारने के उद्देश्य से नहीं पीटा था, ५०-६० लोगो के हंगामे के बीच कैसे और कौन उस पाकिस्तानी के सिर पर लोहे की छड मार गया, उन १७ युवकों को भी नहीं मालूम, उन्हें तो सिर्फ वहां की पुलिस ने घटना के बाद घटनास्थल से गिरफ्तार किया था, और वह पाकिस्तानी बाद में अस्पताल में मरा था) वह पाकिस्तानी शराब के गैरकानूनी धंधे में लिप्त था, यानी इस्लाम के मुताविक
हराम का काम कर रहा था, तो अगर फैसला सुनाने वाला भी सच्चा मुसलमान था तो उसे तो इन १७ भारतीयों को फांसी की सजा सुनाने के बजाये इनाम देना चाहिए था कि उन्होंने एक इस्लाम के हराम को ही हलाल कर दिया, क्योंकि वह पाकिस्तानी तो इस्लाम का सबसे बड़ा गुनाहगार था! लेकिन नहीं वहाँ तो इनके लिए उन शरिया कानूनों का उद्देश्य किसी बहाने दूसरे धर्म के लोगो को हलाल करना मात्र है। काश कि उस जज को अपने दुर्भावना और पूर्वाग्रहों से गर्षित कृत्यों पर तनिक शर्म भी आती।

Friday, April 2, 2010

गिद्ध दृष्ठि अब सफ़ेद हाथी के अस्थि-पंजरों पर !

'कॉमन वेल्थ' यानि जतो नाम ततो गुण! सचमुच कुछ लोगो के लिए तो यह मानो हड़पने हेतु कॉमन वेल्थ जैसी ही है। यह किसी की व्यक्तिगत वेल्थ नहीं, बस कॉमन वेल्थ है। देश ने कॉमन वेल्थ के नाम से जिस सफ़ेद हाथी को पाला था। जब यह पैदा हुआ था तो लोगो को इसके माध्यम से बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए गए थे। उन्हें इसकी पीठ पर बिठाकर दिल्ली में सरपट दौड़ाने के ख्वाब दिखाए गए थे, दिल्ली वाले भी खूब उत्साहित थे, मगर इन फस्ट अप्रैल के मारों को ये नहीं मालूम था कि हाथी खरीदना आसान है, पालना मुश्किल। यहाँ की सडको पर हाथी तो क्या चूहा भी सरपट नहीं भाग पा रहा । हाँ , जनता के पैसों और जान की कीमत पर इन्होने जिस सफ़ेद हाथी को पाला पोसा और बड़ा किया, उसे ये खुद ही नोचने लगे है। स्थिति यह है कि अब वह भी मरियल सा हो गया है। इन्हें मालूम है कि मरा हुआ हाथी भी लाख का होता है, मांस में जब ख़ास कुछ नहीं बचेगा तो गिद्ध दृष्ठि अभी से अस्थि-पंजरों पर चली गई है। और कॉमन वेल्थ खेल गाँव में जो दो कमरों का फ्लैट आम जनता के लिए एक करोड़ के आस पास का रखा गया था, सुना है कि वहां पर उससे भी उच्च स्तर का फ्लैट निकट भविष्य में इन्हें मुफ्त में मिलने वाला है।

गुड फ्राई डे !

आज इस सुअवसर पर दो आड़ी तिरछी कविता की लाइने लोर्ड जीसस के नाम ;

I'm a Hindu,
but still I think
I'm not much different
from the people of your community.

Yes Jesus, I respect you
and love to read
your autobiography because it is
full of life and sacrifice for humanity.


I know, on this day
people commemorate your suffering,
and death on the cross,
I wish you a Blessed Good Friday!

Thursday, April 1, 2010

(कु)शिक्षा का मौलिक अधिकार !


नित नए नियम और क़ानून बनाने में माहिर हमारी सरकार ने आज इस दिशा में एक और सीढी पार कर ली है। जब हमारे भ्रष्ट नेतावो और नौकरशाहों की किसी एक क़ानून से कमाई बंद हो जाती है, तो वे झठ से दूसरा क़ानून बना डालते है। आजादी के इन ६०-६५ सालों में इस देश के अरबों, खरबों रुपये सिर्फ शिक्षा के नाम पर गरीब बच्चो के स्कूल में हाजिरी लगाने के एवज में उन्हें नकद प्रोत्साहन देने, मिड डे मील, आँगनबाडी और उसके बाद कुछ साल पहले सर्वशिक्षा अभियान, जिसका लक्ष्य 5 से 14 साल के बच्चों को 2010 तक उपयोगी और प्रासंगिक प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करना था, साथ ही स्कूलों को प्रबंध में समुदाय की सक्रिय सहभागिता सहित सामाजिक, क्षेत्रीय और लैंगिक विषमताओं को पाटने का एक दूसरा लक्ष्य भी था, खर्च कर दिए गए। स्कूलों के प्रबंध में समुदाय की सक्रिय सहभागिता की पोल तब खुल गई जब कल गाजियाबाद के एक निजी स्कूल ने २५० छात्रों को बढी हुई फीस न देने पर स्कूल से निकालने का फरमान जारी कर दिया, और जिसके एवज में भड़के अभिभावकों ने जोरदार हंगामा मचाया। किसी सरकारी अफसर और राजनेता ने स्कूल प्रशासन से तब यह पूछा कि क्या हुआ उस सर्व शिक्षा अभियान का जिसमे समुदाय की भागेदारी की बात कही गई थी? अब भले ही सरकार कहे कि स्कूल से किसी भी बच्चे को निकाला नहीं जाएगा, मगर क्या सरकार यह गारंटी देगी कि अपनी खुन-पसीने की कमाई से बच्चो को इन स्कूलों में पढ़ा रहे अविभावक आश्वस्त हो सके कि उनके बच्चो को इन शैक्षणिक दुकानों में उचित शिक्षा मिलेगी?

सर्वशिक्षा के नाम पर अरबो / खरबों रुपये डकारने के बाद अपनी असफलता छुपाने के लिए सरकार ने करीब आठ साल पहले शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए संविधान में संशोधन किया था, और उसे अब जाकर लागू किया गया। कोई इनसे पूछे कि आठ साल क्यों लगे ? क्योंकि सर्वशिक्षा के नाम पर जो बचा-खुचा फंड सरकार के खाते में पडा था, वह भी डकारना था । एक खबर के मुताविक सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्कूल चलो का नारा दिया, लेकिन जब बच्चों को मुफ्त किताबें बांटने की बात आई तो अधिकारियों ने अपनी जेब गरम कर ली। कई क्विंटल किताबें कबाड़ीवाले को रद्दी में बेच दी गईं और जो नहीं बिकीं उसे खुले मैदान में जला डाला। ये है इनकी सर्वशिक्षा अभियान का सच।

शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने वाले 86वें संविधान संशोधन को संसद ने वर्ष 2002 में पारित किया था। इस मौलिक अधिकार को लागू कराने वाले कानून ‘बच्चों का मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार अधिनियम’ को संसद ने पिछले साल पारित किया , संविधान संशोधन विधेयक तथा नया कानून दोनों आज से लागू हो गए हैं। नए कानून के तहत राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों के लिए अब यह सुनिश्चित करना बाध्यकारी होगा कि हर बच्चा समीप के स्कूल में शिक्षा हासिल करे। यह कानून सीधे-सीधे करीब उन एक करोड़ बच्चों के लिए फायदेमंद होगा जो इस समय स्कूल नहीं जा रहे हैं। ये बच्चे, जो बीच में स्कूल छोड़ चुके हैं या कभी किसी शिक्षण संस्थान में नहीं रहे, उन्हें स्कूलों में दाखिला दिया जाएगा।

आप मौलिक अधिकारों की बात करते है, और उन मौलिक अधिकारों में एक समानता का अधिकार भी है। एक चपरासी की नौकरी पाने के लिए तो आपने दसवीं पास होना अनिवार्य कर रखा है, और एक राजनेता, जिसे देश के अहम् फैसले लेने होते है, उसके लिए कोई शैक्षिक योग्यता ही नहीं । देश की जो गत आज हो रही है, उसका एक मुख्य कारण यह भी है। तो फिर आप कौन से समानता के अधिकार की बात कर रहे है? हम दूसरे देशो की नकल तो बहुत जल्दी कर लेते है, लेकिन सिर्फ वहीं तक, जहां तक भ्रष्ट तरीके से हमारे खाने-पीने का जुगाड़ बनता हो। अमेरिका और यूरोपीय देशो की देखा-देखी कर हमने शिक्षा का निजीकरण तो कर दिया, लेकिन उनकी यह नक़ल करना भूल गए कि उन्होंने अपने सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर आज भी सर्वोपरी रखा है, और वहाँ का एक संपन्न व्यक्ति आज भी अपने बच्चो को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को प्राथमिकता देता है। अपने देश के सरकारी स्कूलों का हाल तो ब्यान करने की जरुरत ही नहीं। दूर-दराज के गांवो में आज भी सरकारी स्कूलों में सर पर छत नहीं है, बैठने के लिए दरी नहीं है, और बराबरी हम पाश्चात्य देशो की कर रहे है ।

यहाँ के निजी स्कूलों ने तो शिक्षा को नोट कमाने का एक बढ़िया धंधा बना डाला है। इस महंगाई के ज़माने में किस तरह एक माँ-बाप अपने बच्चे को पढ़ा रहे है, उसकी फिक्र किये वगैर, फीस तो एक तरफ, ये हर महीने किसी न किसी बहाने पर अभिभावकों से अन्य बेफालतू चीजो के लिए पैंसे ऐंठते रहते है। दूसरों को नैतिकता की दुहाई देने वाले हमारे कुछ राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र स्कूल प्रवंधन से साठ-गाँठ कर, यह जानते हुए भी कि आज शहरों में तो हर घर में अखबार आता है, बच्चो को जबरन अखबार बांटने के नाम पर साल के शुरू में एनुअल फीस के साथ ही ४००-५०० रूपये अखबार के भी ऐंठ लेते है, और बच्चे को अखबार सालभर में मुश्किल से २ महीने भी नहीं मिलता। मैं इनकी कमाई का एक छोटा सा उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा ;

एक गए गुजरे १२वी तक के निजी स्कूल में १ से १२ तक प्रति क्लास में १०० बच्चे (ABC तीनो सेक्शन मिलाकर) होते है, यानी कुल १२०० बच्चे ;
और औसतन प्रति बच्चा साल में २५००० रूपये ( न्यूनतम ) फीस ली जाती है, यानी कुल आय = ३ करोड़
अब खर्चा देखिये; मान लीजिये स्कूल में कुल ५० शिक्षक और 30 अन्य कर्मचारी है , यानी कुल ८० कर्मचारी
औसतन १००००/- प्रतिमाह इन्हें वेतन का मतलब साल के ९६ लाख रूपये। बाकी के मेंटीनेंस पर ३० लाख रुपये लगा लो तो कुल खर्चा हुआ सवा करोड़ ,
यानि सीधे-सीधे एक करोड़ ७५ लाख का मुनाफ़ा साल में! जमीन इन्हें स्कूल के नाम पर सस्ती दरों पर मिलती है, विधुत दरों में छूट, टैक्स में छूट, और क्या चाहिए?

खैर, मुझे इनकी कमाई से कोई इर्ष्या नहीं, मगर सवाल यह उठता है कि क्या आम जनता इनके भारी भरकम फीस के खर्चे के बोझ को झेलकर अपने बच्चों को उचित शिक्षा दिला पायेगी, या फिर सरकार का शिक्षा के निजीकरण का मकसद ही यह है कि बच्चो को कुशिक्षा मिले, ताकि भविष्य में देश में नालायकों की एक लम्बी फ़ौज इक्कठी हो जाए, और ये अपनी राजनैतिक रोटियाँ मजे से सेकते रहे। उम्मीद करते है कि इस मौलिक अधिकार की भी गत कुछ सरकारी विज्ञापनों, स्टेशनरी की छपाई ( कमाई के लिए ) तक सीमित नहीं रहेगी और सही मकसद की प्राप्ति के लिए इस ओर सरकार की तरफ से इमानदारी से कदम उठाये जायेंगे । जय हिंद !