Friday, June 5, 2020

अचरज।

नजर आता नहीं,
कहीं दूर तक कोई,
तिनका इक आश का,
जहां वाले, है कैसा
ये सम्मिश्रण तेरा, 
उल्लास मे हताश का।

'कोरोना' संरचना
कोई कारण तो नहीं,
मानवता के विनाश का,
'आश' की आस मे
ये कब खत्म होगा,
इंतजार इक निराश का।।

क़त्ल की ये कैसी
खौफना़क साजिश,
है जुनून कैसा 
ये सत्यानाश का,
गुफा अंधेरी,अंतहीन,
सर्वथा टेडी-मेडी,
परिणाम शिफ़र तलाश का।

ये कौन है,
आया कहाँ से भेष धरकर,
मदमास मे बदमाश का,
नजर आता नहीं,
कहीं दूर तक कोई,
तिनका इक आश का।



7 Comments:

Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सुन्दर और समसामयिक रचना।

Saturday, 06 June, 2020  
Blogger Onkar said...

सुन्दर और सामयिक प्रस्तुति

Sunday, 07 June, 2020  
Blogger शुभा said...

वाह!बहुत खूब !पता नहीं कौन ,कहाँ से आया ,जो सभी को इतना हैरान कर रहा है ।

Sunday, 07 June, 2020  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार आप सब का।

Sunday, 07 June, 2020  
Blogger विमल कुमार शुक्ल 'विमल' said...

सामयिक प्रस्तुति

Sunday, 07 June, 2020  
Blogger प्रतिभा सक्सेना said...

इन्सानी फ़ितरत ने किसी को बख़्शा कहाँ?अति का यही परिणाम होता है.
नियति हँसती है इन्सान रोता है.

Tuesday, 09 June, 2020  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

सटीक बात, प्रतिभा जी🙏

Tuesday, 09 June, 2020  

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