Sunday, January 10, 2021

खलिश..

मंजिल के करीब पहुंचने ही वाली थी

जब यह सफ़र-ए-जिन्दगी, ऐ दोस्त!

तुमने नींद मे खलल डालकर, 

स्वप्न विच्छेदन कर दिया

1 Comments:

Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सुन्दर भाव।

Monday, 11 January, 2021  

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home