Tuesday, March 17, 2026

हक़ीक़ते ए जिंदगी।

बयां करना चाहता था ऐ जिंदगी, 

तुझे, अपने इक बंजर से खेत सी,

मुठ्ठी में समेटना चाहा था बहुत 

मगर, हथेली से फिसल गई तू रेत सी।

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हक़ीक़ते ए जिंदगी।

बयां करना चाहता था ऐ जिंदगी,  तुझे, अपने इक बंजर से खेत सी, मुठ्ठी में समेटना चाहा था बहुत  मगर, हथेली  से फिसल गई तू रेत सी।