बयां करना चाहता था ऐ जिंदगी,
तुझे, अपने इक बंजर से खेत सी,
मुठ्ठी में समेटना चाहा था बहुत
मगर, हथेली से फिसल गई तू रेत सी।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
बयां करना चाहता था ऐ जिंदगी, तुझे, अपने इक बंजर से खेत सी, मुठ्ठी में समेटना चाहा था बहुत मगर, हथेली से फिसल गई तू रेत सी।
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