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सच

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संशय

क्षद्म-दाम-वाम के नापतोल बहुत हो गए, क्या करें,    सब  रंग  फीके पड़ गए घोल बहुत हो गए, क्या करें।       कलतलक जिन्हें जानता न था, श्वान भी गली का, ऐसे दुर्बुद्धिवृन्दों के मोल बहुत हो गए , क्या करें।   जिसको भी देखो,यहां से वहाँ लुढ़कता ही जा रहा, ये थालियों के बैंगन गोल बहुत हो गए, क्या करें।  कथानक अंतर्निहित मद का  खो दिया संचार ने,  डुगडुगी बजाने  को ढोल बहुत हो गए , क्या करें।   हरतरफ से उद्विकास की छिजने लगी अब "आश", 'परचेत'  तृभूमि में "होल"बहुत हो गए, क्या करे।    

कुछ कर !

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बाजुओं में अपनी, तू बल जगा , किसान का वंशज है, हल लगा।  फटकने न दे तन्द्रा पास अपने, आलस्य निज तन से पल भगा।  किसान का वंशज है, हल लगा।।  चिराग उपज का न कभी बुझे,  पुकारती है खेत की माटी तुझे, अंकुरित आशा का वो बीज हो,  जिसे दे न पाये कभी जल दगा। किसान का वंशज है, हल लगा।।  समर्थ है शख्शियत,ये सिद्ध कर , परिश्रम से खुद को समृद्ध कर , तन नजर आये न मलीन झगा, सीस पे चमके सदा शीतल पगा ,  किसान का वंशज है, हल लगा।। जोत का ध्येय दिल में पाले रख,  अन्न-कण श्रेष्ट को संभाले रख,  कर बंजरों में भी वो प्रजननक्षम,  बने जो तेरा खुद वसुधा तल सगा।  किसान का वंशज है, हल लगा।।

ज्ञानार्जन

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फ़रियाद

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रहन ग़मों से अतिभारित,  काँटों से भरी आवागम दी,  मन तुषार,आँखों में नमी ज्यादा, सांसो में हवा कम दी,     तक़ाज़ों का टिफिन लेकर, सिर्फ़ इतनी सी ग़िला तुझसे ,     कि ऐ ज़िन्दगी, तूने हमें,  दर्द ज्यादा और दवा कम दी। कहीं गले ही न पड़ जाए, इस डर से कभी किसी ने भेंटा ही नहीं, अपने बाजूओं को फैलाकर तहेदिल से  किसी ने लपेटा ही नहीं,  यहां सिर्फ कांच के टुकड़ों सी बिखरकर रह गई है तू ऐ जिंदगी , बदकिस्मत, हाथ कटने के डर से तुझे किसी ने समेटा ही नहीं।         

ईद है जी !

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शुद्धात्मा !

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आज की भोर पर  मज़हबी नजर आया  तमाम जग सा,  एक तो श्री गणेश चतुर्थी,  उसपर विश्वकर्मा दिवस सा, कुलबुलाहट सी जगी दिल में  शुद्ध-निर्मल होने की, धो डाला सब गंगाजल से,       मोबाइल फोन को भी नहीं बख्शा।   Happy Ganesh Chaturthi & V.Karma Day !