ना ही कोई बंदिश, ना ही कोई परहेज़,
मैं अपने ही उदर पर कहर ढाता रहा।
लजीज़ हरइक पकवान वो परोस्ते गये
और स्वाद का शौकीन, मैं खाता रहा।।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे हम, तुम्हारे बाप के पास, घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।
बहुत बाद में समझ आती है, चटोरी जीव पेट का सत्यानाश कर देती है।
ReplyDeleteक्या बात है :)
ReplyDelete