Wednesday, December 24, 2025

मलाल

साफगोई की भी तहज़ीब होती है,

डूबने वालों की भी यह सदा आई,

आखिरी उम्मीद थी मेरी तुम मगर,

बुलाने पर भी मेरे शहर नहीं आई।

1 comment:

  1. ये चार पंक्तियाँ सीधे दिल में उतर जाती हैं। आप शिकायत नहीं करते, आप एक ठहरी हुई पीड़ा रख देते हैं। साफगोई और तहज़ीब को साथ रखकर आपने रिश्तों की सीमा दिखा दी। “डूबने वालों की सदा” वाली पंक्ति मुझे खास लगी, क्योंकि वह बेबसी को बिना शोर बताए रखती है।

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