साफगोई की भी तहज़ीब होती है,
डूबने वालों की भी यह सदा आई,
आखिरी उम्मीद थी मेरी तुम मगर,
बुलाने पर भी मेरे शहर नहीं आई।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
रातों के हर पहर-दोपहर, जब भी मैं करवट बदलूं, बदली हुई हर करवट पर, कसम से आहें भरता हूं , उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना, कह देता कि मैं...
ये चार पंक्तियाँ सीधे दिल में उतर जाती हैं। आप शिकायत नहीं करते, आप एक ठहरी हुई पीड़ा रख देते हैं। साफगोई और तहज़ीब को साथ रखकर आपने रिश्तों की सीमा दिखा दी। “डूबने वालों की सदा” वाली पंक्ति मुझे खास लगी, क्योंकि वह बेबसी को बिना शोर बताए रखती है।
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