तिलिस्म !
चढ़े प्यार की खुमारी,
जब मति जाए मारी ,
तशख़ीस न हो वक्त पर
तो लाईलाज है ये
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।
तो लाईलाज है ये
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।
तशख़ीस=निदान (diagnose)
संक्रामक है यह रोग,
तेजी से पसारता है पांव ,
और मिले इसे जो पलकों की छाँव
तो जाती नहीं फिर तारी ,
बढ़ा देती है दिल की बेकरारी,
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।
है व्याधि लाइलाज ,
अनसुलझा है इसका राज,
परहेज़ उत्तम और बचो उससे
जो सूरत कोई नजर आये प्यारी,
वरना उलझा देगी तकदीर बेचारी ,
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।
तेजी से पसारता है पांव ,
और मिले इसे जो पलकों की छाँव
तो जाती नहीं फिर तारी ,
बढ़ा देती है दिल की बेकरारी,
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।
है व्याधि लाइलाज ,
अनसुलझा है इसका राज,
परहेज़ उत्तम और बचो उससे
जो सूरत कोई नजर आये प्यारी,
वरना उलझा देगी तकदीर बेचारी ,
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।
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5 Comments:
चलो अच्छा हुआ, बिछड़ गई हमसे वक्त से पहले,
तुम्हारे लिए हमारे दिल में जो बसती बेकरारी थी..
वाह गौदियाल साहब ... ये बेकरारी कम न करें ... उम्र के साथ इसकी जरूरत तो बढती जाती है ...
प्रभावी लेखन,
जारी रहें,
बधाई !!!
आर्यावर्त परिवार
शायर परचेत को सलाम।
बहुत बढ़िया कलाम।
जब चढ़ आये भाव,
छोड़ चले डर दाँव।
बेहद खूबसूरत गज़ल ....
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