Thursday, January 3, 2013

तिलिस्म !



चढ़े प्यार की खुमारी,
जब मति जाए मारी , 
तशख़ीस न हो वक्त पर
तो लाईलाज है  ये 
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।  
तशख़ीस=निदान (diagnose) 

संक्रामक है यह रोग,
तेजी से पसारता है पांव ,
और मिले इसे जो पलकों की छाँव 
तो  जाती नहीं फिर तारी ,
बढ़ा देती है दिल की बेकरारी,
कम्वख्त इश्क की बीमारी । 

है व्याधि लाइलाज ,
अनसुलझा है इसका राज,
परहेज़ उत्तम और बचो उससे 
जो सूरत कोई नजर आये प्यारी,
वरना उलझा देगी तकदीर बेचारी ,
कम्वख्त इश्क की बीमारी ।    


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5 Comments:

Blogger दिगम्बर नासवा said...

चलो अच्छा हुआ, बिछड़ गई हमसे वक्त से पहले,
तुम्हारे लिए हमारे दिल में जो बसती बेकरारी थी..

वाह गौदियाल साहब ... ये बेकरारी कम न करें ... उम्र के साथ इसकी जरूरत तो बढती जाती है ...

Thursday, 03 January, 2013  
Blogger आर्यावर्त डेस्क said...

प्रभावी लेखन,
जारी रहें,
बधाई !!!

आर्यावर्त परिवार

Thursday, 03 January, 2013  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

शायर परचेत को सलाम।
बहुत बढ़िया कलाम।

Thursday, 03 January, 2013  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

जब चढ़ आये भाव,
छोड़ चले डर दाँव।

Thursday, 03 January, 2013  
Blogger Dr (Miss) Sharad Singh said...

बेहद खूबसूरत गज़ल ....

Friday, 04 January, 2013  

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