Tuesday, February 21, 2012

सुखांतकी !


यह दुनिया  एक रंगशाला है 
और हमसब इसके  मज़ूर,
कुशल, अकुशल सब   
जुटते  हैं  काम  पर 
कोई तन-मन से,
कोई अनमन से ,  
निभाते फिर भी किन्तु 
सब अपना-अपना किरदार !
रंगमच की राह में 
कुछ समर्पण करते है 
और कुछ परित्याग ....
लेकिन  दस्तूर वही चलता  है  
पर्दा उठते ही अभिनय शुरू  
और गिरने पर  ख़त्म !!

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11 Comments:

Blogger भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अजीब रंगमंच है ये भी जिसके निर्देशक के बारे में कोई नहीं जानता..

Tuesday, 21 February, 2012  
Blogger रश्मि प्रभा... said...

मगर कभी-कभी कम्वक्त
मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
मन उद्द्वेलित कर जाता है; ... कभी कभी नहीं , कई बार

Tuesday, 21 February, 2012  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

सुख की चाह, रही सब मन में..

Tuesday, 21 February, 2012  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन अभिव्यक्ति ...

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger लोकेन्द्र सिंह said...

कोई कुशल और कोई अकुशल... कर्म जारी रहना चाहिए बस। बढिय़ा रचना।

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger सदा said...

वाह ...बहुत ही अनुपम भाव संयोजन ।

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

शेख पीर [अरे वही- अपने शेक्सपीयर] से प्रेरणा लेकर लिखी गई सुंदर कविता के लिए बधाई :)

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger Anupama Tripathi said...

किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ?
gahan sunder abhivyakti ...

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत सुन्दर गंभीर और सार्थक रचना...
सादर

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
मन उद्द्वेलित कर जाता है;
कि क्या उचित है तब, जब
रंगकर्मी ही तंग आ जाए
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ?


इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

नीरज

Wednesday, 22 February, 2012  
Blogger संध्या शर्मा said...

कि क्या उचित है तब, जब
रंगकर्मी ही तंग आ जाए
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ?

यक्ष प्रश्न है... कई बार उठता है.

Wednesday, 22 February, 2012  

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