सुखांतकी !
यह दुनिया एक रंगशाला है
और हमसब इसके मज़ूर,
कुशल, अकुशल सब
जुटते हैं काम पर
कोई तन-मन से,
कोई अनमन से ,
निभाते फिर भी किन्तु
सब अपना-अपना किरदार !
रंगमच की राह में
कुछ समर्पण करते है
और कुछ परित्याग ....
लेकिन दस्तूर वही चलता है
पर्दा उठते ही अभिनय शुरू
और गिरने पर ख़त्म !!
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11 Comments:
अजीब रंगमंच है ये भी जिसके निर्देशक के बारे में कोई नहीं जानता..
मगर कभी-कभी कम्वक्त
मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
मन उद्द्वेलित कर जाता है; ... कभी कभी नहीं , कई बार
सुख की चाह, रही सब मन में..
गहन अभिव्यक्ति ...
कोई कुशल और कोई अकुशल... कर्म जारी रहना चाहिए बस। बढिय़ा रचना।
वाह ...बहुत ही अनुपम भाव संयोजन ।
शेख पीर [अरे वही- अपने शेक्सपीयर] से प्रेरणा लेकर लिखी गई सुंदर कविता के लिए बधाई :)
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ?
gahan sunder abhivyakti ...
बहुत सुन्दर गंभीर और सार्थक रचना...
सादर
मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
मन उद्द्वेलित कर जाता है;
कि क्या उचित है तब, जब
रंगकर्मी ही तंग आ जाए
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ?
इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें
नीरज
कि क्या उचित है तब, जब
रंगकर्मी ही तंग आ जाए
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ?
यक्ष प्रश्न है... कई बार उठता है.
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