सुखांतकी !


यह दुनिया  एक रंगशाला है 
और हमसब इसके  मज़ूर,
कुशल, अकुशल सब   
जुटते  हैं  काम  पर 
कोई तन-मन से,
कोई अनमन से ,  
निभाते फिर भी किन्तु 
सब अपना-अपना किरदार !
रंगमच की राह में 
कुछ समर्पण करते है 
और कुछ परित्याग ....
लेकिन  दस्तूर वही चलता  है  
पर्दा उठते ही अभिनय शुरू  
और गिरने पर  ख़त्म !!

Comments

  1. अजीब रंगमंच है ये भी जिसके निर्देशक के बारे में कोई नहीं जानता..

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  2. मगर कभी-कभी कम्वक्त
    मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
    मन उद्द्वेलित कर जाता है; ... कभी कभी नहीं , कई बार

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  3. सुख की चाह, रही सब मन में..

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  4. कोई कुशल और कोई अकुशल... कर्म जारी रहना चाहिए बस। बढिय़ा रचना।

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  5. वाह ...बहुत ही अनुपम भाव संयोजन ।

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  6. शेख पीर [अरे वही- अपने शेक्सपीयर] से प्रेरणा लेकर लिखी गई सुंदर कविता के लिए बधाई :)

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  7. किरदार निभाते-निभाते;
    समर्पण अथवा परित्याग ?
    gahan sunder abhivyakti ...

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  8. बहुत सुन्दर गंभीर और सार्थक रचना...
    सादर

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  9. मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
    मन उद्द्वेलित कर जाता है;
    कि क्या उचित है तब, जब
    रंगकर्मी ही तंग आ जाए
    किरदार निभाते-निभाते;
    समर्पण अथवा परित्याग ?


    इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  10. कि क्या उचित है तब, जब
    रंगकर्मी ही तंग आ जाए
    किरदार निभाते-निभाते;
    समर्पण अथवा परित्याग ?

    यक्ष प्रश्न है... कई बार उठता है.

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