मलाल

इस मुकाम पे लाकर मुझे, तू बता ऐ जिन्दगी!

दरमियां तेरे-मेरे, अचानक ऐंसी क्या ठन गई,

जिन्हें समझा था अपनी अच्छाइयां अब तक,

वो सबकी सब पलभर मे बुराइयां क्यों बन गई।

दगा किस्मत ने दिया, दोष तेरा नहीं, जानता हू,

जीने का तेरा तर्क़ मुझसे भी बेहतर है, मानता हूं,

मगर, इसे कुदरत का आशिर्वाद समझूं कि बद्दुआ 

मुखबिर मेरे खिलाफ़, मेरी ही परछाईं जन गई।

Comments

  1. यह ग़ज़ल सीधे दिल से बात करती है। मुझे इसमें जीवन से किया गया सवाल बहुत अपना सा लगता है। इंसान जब अपने ही गुणों को हालात के हाथों बुराई बनते देखता है, तब यही टूटन पैदा होती है। किस्मत और ज़िंदगी के बीच का यह संवाद बेहद सच्चा लगता है।

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