दरिया-ऐ-इश्क
दरिया-ऐ-इश्क, प्रीत दर्शाने की, फरमाइश अच्छी नही,
दिल की बात लव पे लाने की, सिफारिश अच्छी नहीं।
मंजूर वो जो बे-गरज कहें निगाहें,गेसुओं की ओंट में,
अंजुमन में आने की अर्ज, ये गुजारिश अच्छी नही ।
मजमा-ए-महफ़िल करें क्यों, प्रेम की पहचां उजागर ,
मुहब्बत की नजर,जज्बातों की नुमाइश अच्छी नहीं।
दरमियां मुहब्बत के ये देखिये,भरोसा न टूटे कभी ,
यकीं दिलाने को ये रिश्तों की पैमाइश अच्छी नहीं।
पैमानो में भरकर दर्द को, क्यों भला छलकायें हम,
मद भरी आँखों से बेमौसमी, हर बारिश अच्छी नहीं।
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10 Comments:
जबरदस्त है भाई साहब |
धमकाने वाला अंदाज दिख रहा है-
सादर ||
अंतर्मन में ऐक्य है, तनातनी तन माय |
प्यारी सी यह गजल दे, फिर से आग लगाय |
फिर से आग लगाय, बुलाना नहीं गवारा |
रहा खुद-ब-खुद धाय, छोड़ के धंधा सारा |
आँखों में इनकार, मगर सुरसुरी बदन में |
रविकर कर बर्दाश्त, आज जो अंतर्मन में ||
खूबसूरत अंदाज़
तेरी सुर्ख आँखों से बेमौसम की बारिश मुझे अच्छी नहीं लगती....क्या खूबसूरत बात कही है आपने
जिन्दगी की आपाधापी में व्यस्तता के कारण आपके ब्लॉग पर काफी दिनों बाद आया।
माफी चाहूंगा।
हिन्दी-उर्दू मिश्रित इस उत्कृष्ट रचना के लिये आभार!!
पैमाने में भरकर अलसाये दर्द को, इस तरह न छलकाया करो, तेरी सुर्ख आँखों से बेमौसम की बारिश मुझे अच्छी नहीं लगती।
वाहवाह,लाजबाब गजल,,बधाई पी.सी.गोदियाल जी
recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...
वाह, गजब अन्दाज..
भरी महफ़िल में छलकते नयन, तेरी पहचान उजागर न कर दे,
प्रेम की मंडी में जज्बातों की नुमाइश मुझे अच्छी नहीं लगती।
बहुत खूबसूरत गज़ल
रावत जी, ये आपका बड़प्पन है भैजी! आपके इस स्नेह के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ !
बहुत सुन्दर प्रस्तुति. हार्दिक बधाई.
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