यह कौन सा मिराक* है


तार-तार करके रख  दिया लोकतंत्र की साख को,
माया बटोरने का अजब यह कौन सा मिराक* है ।
संविधान मुंह चिढाता है ,निर्माता-निर्देशकों का,
जंगलों की आड़ मे दमित बैठा किसी  फिराक है ।।

यही वो भेद-भाव रहित समाज का सपना था,
क्या यही वो वसुदेव कुटुमबकम का नारा था ।
यही वो दबे-पिछडों के उत्थान की बुनियाद थी,
क्या यही स्वतन्त्रता का बस ध्येय हमारा था ॥

नैतिक्ता, मानवीय मुल्य जिन पर हमे नाज था,
कर दिया उन्हे हमने मिलकर सुपुर्द-ए-खाक है ।

जनबल, धनबल, और बाहुबल के पुरजोर पर,
मुंहजोर ने रख छोडा आज कानून को ताक है ।


तार-तार करके रख  दिया लोकतंत्र की साख को,
माया बटोरने का अजब यह कौन सा मिराक* है ॥


• मिराक= मानसिक रोग

Comments

  1. आपने लोकतंत्र, संविधान और समाज के टूटते मूल्यों को बहुत साफ और सधे शब्दों में रखा है। पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम सब कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार हैं। सवालों के रूप में कही गई बातें सीधा दिल में उतरती हैं। इसमें गुस्सा भी है, पीड़ा भी और एक सच्ची चिंता भी कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

यूं भी बावफा होते है लोग !

धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !

'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !