ये दिल निसार करके जाना कि राहे जफा होते है लोग, सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी बावफा होते है लोग ! सोचते थे कि नेमत है खुदा की ये जज्बा , इल्म न था कि वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग ! दिल और आँख का ऐसा आपसी देखा जो समन्वय 'परचेत', नजर देखे, दिल शकूं पाए, मनीषी ऐसे ही नफ़ा होते है लोग !
नेकी और पूछ-पूछ!
ReplyDeleteआपने याद दिलाया , तो हमें याद आया ---
ReplyDeleteयाद दिलाने के लिए शुक्रिया भाई जी ! सायं ८:३० से ९:३० तक बिजली बंद करके इस अछे कार्य में कुछ योगदान करते हैं ! बहुत अच्छा प्रयत्न है !
ReplyDeleteहा हा हा तीखा व्यंग
ReplyDeleteअर्थ हावर ..
ReplyDeleteये क्या है?
एक बीच रास्ते खड़ी गाड़ी को धक्का मारकर आया हूँ, कहीं उन्होंने आपका ब्लॉग तो नहीं पढ़ लिया था।
ReplyDeleteएक घंटे गाड़ी न चलायेंगे तो कुछ बिगड़ेगा नहीं. :)
ReplyDeleteअजी एक घंटा?... अजी इंजन बन्द कर के किसी अच्छे से होटल मै खाना खाये
ReplyDeleteमैं तो हेडलाईट बन्द कर देता हूं अक्सर और बिजली बचा लेता हूं.
ReplyDeleteबिजली बचाने के लिये अच्छा प्रयास , किंतु कुछ सवाल -
ReplyDelete१-तमाम समारोहों में सजावट के नाम पर
२-आई पी एल के रात्रिकालीन मैच में
३-बड़े बड़े होट्लों और आलीशान दफ़्तरों में
बिजली का कितना दुरुपयोग होता है , इसे रोकें तो अर्थ आवर की आवश्यकता नही होगी ।
अजय जी ने काफी कुछ कह दिया है.........
ReplyDeleteकुंवर जी,