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Showing posts from February, 2012

प्रणय गीत- तुम मिले !

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कातिब-ऐ-तकदीर को मंजूर पाया, तस्सवुर में तुम्हारा हसीं नूर पाया। (कातिब-ऐ-तकदीर=विधाता) (तस्सवुर में = ख्यालों में ) बिन पिए ही मदमस्त हो गए हम, तरन्नुम में तुम्हारे वो सुरूर पाया। (तरन्नुम= गीत ) कुछ बात है हममे, जो हमें तुम मिले, मन में पलता इक ऐंसा गुरुर पाया। सेहर हसीं और शामे रंगीं हो गई, तुमसा जब इक अपना हुजूर पाया। (सेहर = सुबह ) जब निहारने नयन तुम्हारे हम गए, उन्हें प्यार के खुमार में ही चूर पाया । बेकस यूँ लगा, खो गई महक फूल की, तुमको जब कभी अपने से दूर पाया। (बेकस = अकेला ) 

डगर नू भी कठिन क्या थी - चंद ख्यालात !

फुरसत के क्षणों में कल एक खबर पर गौर कर रहा था कि नार्वे संकट गहरा गया है। और एक  विशेष राजदूत भी उधर दौड़ा दिया गया  है। उन दो अप्रवासीय मासूमों के मसले को शीघ्र हल करने के लिए उनके नाना-नानी भी दिल्ली में नार्वे के दूतावास पर धरने पर बैठे है, जो चंद महीनो पहले वहाँ के सरकारी संरक्षण में इस आरोप के तहत जबरन ले लिए गए थे कि उनके अप्रवासी भारतीय माँ-बाप उस देश के जीवन-स्तर के हिसाब से उनका लालन पालन नहीं कर रहे, और खासकर इस बात पर कि वे अपने बच्चों को अपने साथ ही सुलाते है। वो यार, हम लोग भी न सच में ग्रेट है, असल बात का बतडंग बनाना तो हमें आता ही नहीं, और नहीं हम इन गोरी चमड़ी वालों के इतने लम्बे समय तक गुलाम रहकर ही ठीक से ही कुछ  इनसे सीख पाए। खैर, मुद्दे पर लौटता हूँ, ये अगर राजनैतिक फायदे अथवा हथियारों की दलाली से जुडा मसला होता तो मैं दावे के साथ कह सकता था कि अपना डिग्गी बाजा अभी तक बज चुका होता, इस सुर-ताल में कि बच्चों के अभिभावक जरूर चारएसएस के बहकावे में आकर नाहक ही चिल-पौं मचा रहे है, बच्चे वहां के सरकारी खाते म...

वक्त आयेगा एक दिन !

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छवि गूगल से साभार ! दिन आयेगा महफ़िल में जब, होंगे न हम एक दिन, ख़त्म होकर रह जायेंगे सब, रंज-ओ-गम एक दिन। नाम हमारा जुबाँ पे लाना, अखरता है अबतक जिन्हें , जिक्र आयेगा तो नयन उनके भी, होंगे नम एक दिन। हमने तो वजूद को अपने , हर हाल में रखा कायम, थक हार के खुद ही वो, बंद कर देंगे सितम एक दिन। जख्मों को अपने हमने सदा,खरोचकर जीवित रखा , दिल पिघलेगा कभी , वो लगायेंगे मरहम एक दिन। महंगी वसूली हमसे 'परचेत',कीमत हमारे शुकून की, वक्त आयेगा जब भाव उनके भी होंगे कम एक दिन।

बादशाह मछेरा !

बादशाह मछेरे,  तुमने  मत्स्य जाल, गुरुकाय व्हेल के ऊपर डाला क्यों था? जिन्न की रिहायश बोतल में होती है, यवसुरा* की शीशी से        (*बीयर)    निकाला क्यों था? बुजुर्ग फरमा गए कर्म के चार अभ्यास, ब्रह्मचर्य,गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ! वक्त-ऐ-मोक्ष, काम मॉडल का निराला क्यों था ? बादशाह मछेरे, तुमने अपना मत्स्य जाल, गुरुकाय व्हेल के ऊपर डाला क्यों था? किंगफिशर की विफलता पर एक चुटकी  !

लघु कथा- चिराग तले...

इशु, बेटा गुप्ता जी की दूकान से बड़े वाले चार ड्राइंग पेपर और ले आ..........प्लीज! अपनी दस बर्षीय बेटी इशा को आवाज लगाते हुए रमेश बोला। आज छुट्टी का दिन था और रमेश सुबह-सबेरे ही उठकर भोजन कक्ष में मौजूद खाने की बड़ी मेज पर चार-पांच सफ़ेद आर्ट पेपरों और इशा के स्कूल-बस्ते से चित्रकला का सामान निकालकर अपने सपनो के घर का नक्शा बनाने में मशगूल था। अपने ही कल्पना जगत में खोया वह यह सज्ञान लेना भी भूल गया कि सबिता ने उसे उसी टेबल पर नाश्ता भी परोसा था और उसे वह कब का चट कर गया था। उसकी यह तंद्रा तब टूटी जब करीब ग्यारह बजे सबिता उसके लिए दूसरी बार चाय बनाकर लाई और रमेश ने सबिता से सवाल किया कि आज नाश्ता खिलाने का मूड नहीं है क्या, तो तब सबिता बोली, पागल हो गए हो क्या, तुमने साढ़े आठ बजे के करीब जो खाया था वो क्या नाश्ता नहीं था? यूं तो जब से प्लॉट की रजिस्ट्री घर में आई थी, सबिता भी सोते-जागते अपने मानस पटल पर कई स्वप्न-महल खड़े कर चुकी थी। घर के कामों से फुर्सत मिलते ही आलमारी के लॉकर में रखी रजिस्ट्री को वह भी मेज पर फैलाकर उस रजिस्ट्री संग लगे प्लाट के मानचित्र को उल्टा-पुल्टाकर, भिन्...

सुखांतकी !

यह दुनिया  एक रंगशाला है  और हमसब इसके   मज़ूर, कुशल, अकुशल सब    जुटते  हैं  काम  पर  कोई तन-मन से, कोई अनमन से ,   निभाते फिर भी किन्तु  सब अपना-अपना किरदार ! रंगमच की राह में  कुछ समर्पण करते है  और कुछ परित्याग .... लेकिन  दस्तूर वही चलता  है   पर्दा उठते ही अभिनय शुरू   और गिरने पर  ख़त्म !!

शिव अराधना

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अनुतप्त न होगा कभी तेरा मन, कर भोर भये भोले का सुमिरन| रख शिव चरणों में मनोरथ अपना, निश्चित मनोकामना होगी पूरन|| सरल सहृदय मन कृपालु बड़े है, जय भोलेनाथ सन्निकट खड़े है| अनसुलझी रहे न कोई उलझन, कर भोर भये भोले का सुमिरन|| सिंहवाहिनी सौम्य छटा में रहती, तारणी प्रभु शीश जटा से बहती| ढोल, शंखनाद, घडियाली झनझन, कर भोर भये भोले का सुमिरन|| नील कंठेश्वर इस जग के रब है, धन-धान्य वही, वही सुख-वैभव है| प्रभु-पाद सम्मुख फैलाकर आसन, कर भोर भये भोले का सुमिरन|| तारणहार जयशंकर विश्व-विधाता, सर्व शक्तिमान शिव जग के दाता| न्योछावर करके अपना तन-मन, कर भोर भये भोले का सुमिरन|| . .  

नासमझ !

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कर ले तू भी थोड़ी सी वफ़ा जिन्दगी से, होता क्यों है इसकदर खफा जिन्दगी से।   बढ़ाए जा कदम तू ख्वाइशों के दर पर, मुहब्बत फरमाके इकदफा जिन्दगी से।   बिगड़ने न दे दस्तूर तू  जमाने का ऐसे, रखले थोड़ा कमाकर नफ़ा जिन्दगी से।   मत कर बयां राज बेतकल्लुफी के ऐंसे कि मिले जो बदले में जफा जिन्दगी से।    ऐतबार  बनने न पाये बे ऐतबारी का  सबब, जोड़ 'परचेत' इक फलसफा जिन्दगी से।     छवि  गूगल  से  साभार ! 

कार्टून कुछ बोलता है- जर्मन हाउसिंग लोन घोटाला !

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कसाब के लिए चिंतित देश !

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जैसा कि आप सभी को विदित होगा कि विगत माह के अंतिम पखवाड़े में सन 2008 के मुंबई हमलों के दोषी, पाकिस्तानी आतंकवादी २४ वर्षीय नवाब, "श्री" अजमल आमिर कसाब "जी" ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें उपलब्ध कराये गए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन के मार्फ़त दाखिल की गयी अपनी विशेष अनुमति याचिका में बम्बई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए दावा किया था कि उनके मामले की सुनवाई स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से नहीं हुई है। साथ ही उन्होंने कहा था कि खुदा के नाम पर जघन्य अपराध को अंजाम देने के लिए किसी रोबोट की तरह उन्हें बुद्धि-भ्रष्ट किया गया और अपनी कम उम्र को देखते हुए वे इतनी बड़ी सजा के हकदार नहीं है। सनद रहे कि शीर्ष अदालत ने पिछले साल दस अक्तूबर को श्री कसाब जी की मौत की सजा पर रोक लगा दी थी। हालांकि पिछले हफ्ते ८ फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि वे भारतीय जमीन पर पहुंचने से पहले ही सबकुछ जानते थे, और इस साजिश में शामिल थे। उस दाखिल की गयी विशेष अनुमति याचिका में लगाए गए आरोपों के जबाब में पिछले बुधवार को बहस को आगे बढाते हुए महाराष्ट्र सरक...

दुविद्या

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अति सम्मोहित ख्वाब कैफियत तलब करने आज भी गए थे  उस जगह,  जहां कल  रंगविरंगे  कुसुम लेकर  वसंत आया था ! ख़याल यह देख  विस्मित थे  कि उन्मत्त  दरख्त की ख्वाईशें, उम्मीद की टहनियों से झर-झर उद्वत  हुए जा रही थी, पतझड़ पुन:दस्तक दे गया था   या फिर वसंत के  पुलकित एहसास ही क्षण-भंगूर थे, नहीं मालूम !! 

जानेमन !

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जाने जाना, गुल-ए-गुलजार  ! तुम जानती हो, मैं खुले में नहीं करता  कभी अपने इश्क का इजहार।    समय की मर्यादा  रुकावट न बने इसलिए मैंने तुम्हारे लिए अपने एहसास ट्विटर पर, अनुभूति फेसबुक पर और भावनाएं ब्लॉग पर अभिव्यक्त कर दी हैं ! अब इतनी है तुमसे दरकार , जब जी करे, गूगल सर्च पर दिलवर और अपना नाम टंकित कर ढूंढ लेना, सबकुछ उपलब्द्ध हैं  शजर-ए-डार !!

कार्टून कुछ बोलता है- वैलेंनटाइनस डे !

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                                                           14-02-12   = "0"

एक सौभाग्यशाली देश का दुर्भाग्य !

विविधताओं भरे इस देश में जहां अनेक धर्मों, जातियों, भाषाओं और पंथों के लोग निवास करते हैं, वहाँ   धर्मनिरपेक्षता ,   सहिष्णुता ,   सह- अस्तित्व   और   उदारवाद   सिर्फ इकतरफा यातायात का हिस्सा बनकर   नहीं  रह  सकते  हैं ।     और   उसके अनुसरण का  बोझ  अकेले वहाँ के  बहुसंख्यक समुदाय   के कंधों   पर  डालना  सीधे-सीधे  न सिर्फ लोकतंत्र की मूल भावना का उल्लंघन  है, बल्कि उसके उद्देश्यों को भी कमजोर करता है ।     किसी भी लोकतांत्रिक समाज में बिना भेदभाव के सभी के लिए समान अवसर उस  देश-समाज और व्यवस्था की सफलता का एक मुख्य पैमाना माना जाता  है ।   यह एक दुःख  की बात है कि जिन मौजूदा देश, काल और परिस्थितियों में  हम जी रहे है  वह  एक  धर्मनिरपेक्ष समाज का हिस्सा कम और प्रतिस्पर्धी  साम्प्रदायिक   और   जातीय  तुष्टीकरण   और   वोट-बैंक   की राजनीति  का हिस्सा अधिक बनकर ...

जंगल का अमंगल भविष्य ! ( लघु-व्यंग्य)

दश्त-ओ-सहरा में बहार आये, न आये। कानन में मधुमास छाये, न छाये... किन्तु, कुछ दुर्लभ जाति एवं ख़ास किस्म के वन्य-प्राणियों के लिए संरक्षित वन्य-जीव अभ्यारण के अनेकों मांसाहारी पशु-पक्षियों के कुटिल चेहरों पर अचानक ही मैं एक अनोखे किस्म की चमक देख रहा हूँ। ऐसा प्रतीत होता है कि इनके लिए सचमुच का वसंत आ गया है। सभी चेहरे खुशी से झूम उठे है, और क्यों न झूमे, उनका झूमना भी लाजमी है क्योंकि घने जंगल के अंधकार में गुम होती उनकी नैया को अचानक एक प्रकाश-पुंज जो नजर आ गया है। दूर क्षितिज की गोद से उन्हें एक नया सूरज उदयमान होता दिखाई दे रहा है, और यही वजह है कि उच्च अभियाचनाग्रस्त इनकी जोरुओं ने भी जो मायाजाल रूपी प्रचंड ख़याल अपने त्रिषित लोचनों में सजा रखे थे, और उम्मीद की धुमिल पड़ती किरणों के चलते उन्होंने वे सारे स्वप्न एक-एककर अपनी पलकों से उतार-उतारकर अपने गुप्त खोहो और कंदराओं में रख छोड़े थे, उन्हें वे पुन: समेटकर अपनी पलकों पर चिपकाने और प्रतिस्थापित करने की कोशिश में जुट गई है। जंगल के प्राणी आजाद होने को लाख छटपटायें, मगर कटु-सत्य यही है कि जंगल कभी आजाद नहीं हो सकता, उसे हमेशा ही ए...

वनाचार !

इंद्रप्रस्थ  में फिर जब वसंत आया वरण का, तो सहरा में शुरू हुआ खेल, पहले चरण का।   प्रतिद्वंदी को झूठा बताके ,शठों ने अपने परचम लहराए ,   कुर्सी पाने हेतु चर सृष्टि से ,गिद्ध,वृक सब करबद्ध आए।   अल्हड़ से कुम्भ में शरीकी का आह्वान किया,  हुजूम उमड़े,  भेड़ों के झुंडों ने बागदान  किया।   यथार्थ से मूँदकर आँखे, मुद्दे वही धर्म और जातपात , और अंतत: परिणाम क्या ? वही, 'ढाक के तीन पात' !!

बिकने और नीलाम होने का सुख !

आप कल्पना कीजिये कि वह वक्त कैंसा रहा होगा जब कोई अंग्रेज किसी गरीब और मजबूर भारतीय के घर के किसी सदस्य को नीलामी में खरीदकर, गुलाम बनाकर अपने किसी उपनिवेश पर जानवरों की तरह काम करवाने के लिए उसे अपने साथ लेकर चलने को तैयार होता होगा, दूसरी तरफ अपने परिवार से सदा के लिए विदा होता वह अभागा गुलाम और उसका परिवार एक दूसरे से बिछुड़ते हुए किस तरह बिलख-बिलखकर रोते होंगे, उनकी शारीरिक स्थिति और मनोदशा उसवक्त कैसी भयावह रहती होगी, इन्सान होने के नाते हम उस बात का सहज अंदाजा तो लगा ही सकते है। और शायद इसी की परिणीति थी ज़माने का वह दौर जब समाज में किसी को 'बिका हुआ', अथवा 'नीलाम' की संज्ञा देना अपने आप में एक गाली समझी जाती थी। किसी को मजाक में भी बिका हुआ कह दो तो वह काटने को दौड़ता था। हाँ, कोई अगर इस क्रिया में रंगे हाथों पकड़ा जाए तो उसके लिए मरने जैसी स्थित हो जाती थी, मुह छुपाने के लिए वह दर-दर भागा करता था। और फिर आया आधुनिक सभ्यता का दौर, वैश्विक बाजार व्यवस्था का दौर। और इस दौर ने बिकने और नीलाम होने की सारी परिभाषाएं ही पलट कर रख दी। बिके हुए अथवा नीलाम हुए इंसान के म...

दल बदल गए यार सारे !

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चित- ध्येय  में बाहुल्य के,चढ़ गए   खुमार सारे, जिस्म दुर्बल नोचने को,गिद्ध,वृक  तैयार सारे। बर्दाश्त कर पाते न थे,जुदाई जिस दोस्त की, वक्त ने चाल बदली, दलबदल गए यार सारे। छीनके निरपराध  से, हक़ भी फरियाद का, रहनुमा बन घुमते हैं , देश-गुनहगार सारे। मजहबी उन्माद में, रंग दिया आवाम को , नाकाम बन गए है,अमन के हथियार सारे। शिष्टता को घर से उठा कर ले गई है बेहयाई, पड़ गए 'परचेत'बौने,कौम के तिरस्कार सारे। छवि  गूगल   से  साभार !  विरादर, तमाम गुंडे-मवाली, मिलके चमन लूटा और कोष खाली। हरतरफ खुद ही फैलाई बदहाली, उसपर  आंसू बहाता है वो भी घडियाली। अब तो बस यही  बद्दुआ निकलती है तेरे लिए दिल से, धत्त तेरे की निकम्मे, बेशर्म  बगिया के माली !!

नन्हे ख्वाब !

इंसान को संतृप्ति कैसे भी नहीं हो पाती ! जब छोटा था, तबकी दुनिया को देख अक्सर सोचा करता था कि मैं शायद देर से पैदा हुआ ! अब आज जब उम्र के इस पड़ाव पर आ गया, तब लगता है कि शायद मैं जल्दी पैदा हो गया ! अगर आज के इस दौर में पैदा हुआ होता तो जो कुछ ख़ास किस्म के नन्हे ख्वाब आज मेरे बालमन में पल रहे होते, वे किस तरह के होते, चलिए उनमे से एक-आधा ख्वाब से आज थोड़ा सा आपको भी अवगत करा दूं ; ख्वाब न० एक : अपने आस-पास और इस देश के भ्रष्ट-तंत्र के बारे में जब टीवी पर देखता, अखबारों में पढता, अपने इर्द-गिर्द के समाज में देखता तो मैं सोचता कि मैं कुछ समय के लिए इस देश का लोकपाल (अन्ना) बनूगा, एक ऐसा लोकपाल  जिस पर गोली, तोप, तलवार का कोई असर न पड़ता हो, जिससे दुनिया कांपती हो, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जिस तरह आज हम किसी स्टूडियो में अथवा कंप्यूटर- लैपटॉप पर अपने घर में कहीं भी आमने-सामने बात करते है, मेरे पास वो तकनीक होती कि मैं न सिर्फ लैपटॉप, टीवी,आइपैड पर मन चाहे व्यक्ति से बात कर पाता, बहस कर पाता बल्कि जरुरत पड़ने पर वहीं उस टीवी, लैपटॉप स्क्रीन से बाहर निकल कर बहसकर...

क्षणिकाएँ !

देह माटी की, दिल कांच का, दिमाग आक्षीर रबड़ का गुब्बारा, बनाने वाले , कोई एक चीज  तो फौलाद की बनाई होती ! xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx नयनों में मस्ती, नजरों में हया, पलकों में प्यार, ये तीन ही विलक्षणताएँ प्रदर्शित की थी महबूबा ने मुह दिखाई के वक्त ! वो हमसे रखी छुपाये, तेवर जो बाद में दिखाये, नादाँ ये नहीं जानती थी कि सरकारी मुलाजिम से महत्वपूर्ण जानकारी छुपाना, भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध है !! xxxxxxxxxxxxxxxxxx दहशतें बढ़ती गई, जख्म फिर ताजा हुआ, हँस के  जो  बजा था कभी वो बैंड अब बाजा हुआ, तेरी बेरुखी, तेरे नखरे, कर देंगे इक दिन मेरा जीना मुहाल, छोड़कर बच्चे जिम्मे मेरे जब तुम मायके चली गई तब जाके ये अंदाजा हुआ ! xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx ये मैंने कब कहा था कि तुम मेरी हो जाओ, सरनेम (उपनाम ) बदलने को तुम्ही बेताव थी !! xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx जानता  हूँ , हमारे घर बसाने के बाद  तुम्हारी माँ,  यानि  मेरी सास ने ३ फुट गुणा ६ फुट का पर्दा क्यों भेजा , क्योंकि वो ...

जीवन प्रतिफल !

दो भिन्न रास्तों से  सफर को निकले   दो हसीन लम्हें, अरमानों के चौराहे पर  संविलीन हो जाते है।  और फिर होता है कोमल अहसासों का सृजन, आशा और उम्मीद फिर से मुसाफ़िर बन जाते है   मगर एक ही मंजिल के।    सीधी-सपाट, टेडी-मेडी और उबड़-खाबड़ राहों का सफ़र तय करते हुए जब मंजिल पास आ जाती है  तब  गुनगुनी धुप में बैठ आशा, उम्मीद से कहती है; आज प्रतिफल के भोजन में  परोसने को बस, दो ही मद है,  संतृप्ति और  मलाल।  

रुग्ण समाज की वेदी पर भेंट चढ़ती फलकें !

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कुछ ख़ास आश्चर्य नहीं हुआ जब समाचार माध्यमों से यह मालूम पड़ा कि दो साल की एक मासूम फलक, जो हैवानियत के निर्मम हाथो कुचली और विक्षिप्त अवस्था में परित्यक्त दिल्ली के एक निर्माण स्थल से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के आईसीयु में मौत से जूझने के लिए छोड़ दी गई, और अब वेंटिलेटर पर जिन्दगी और मौत के बीच की लड़ाई अकेले लड़ रही है। और इसकी ख़ास वजह यह है कि क्योंकि यह घटना तो तब सुर्ख़ियों में आ गई जब मासूम फलक एम्स पहुची और मीडिया की नजरों में आई, वरना तो इस देश में रोज ही पता नहीं, इंसानों की दरिंदगी की शिकार कितनी ही अभागी फलकें भुखमरी, दरिद्रता, अज्ञानता और बेरोजगारी के अंधेरों में घुट-घुटकर दम तोड़ देती हैं, कोई गिनती ही नहीं। आप सहज अंदाजा लगा सकते है कि यह हाल तो तथाकथित आर्थिक हस्ती बनने को छटपटाते इस देश की राजधानी दिल्ली का है, इतने विशाल देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में क्या-क्या हो गुजरता होगा, भगवान् मालिक है। आज ही एक खबर पर नजर गई कि पश्चिम बंगाल में एक सात माह की बच्ची को उसके माँ-बाप रेल के डिब्बे में ही भगवान् भरोसे छोड़ चलते बने। साथ में छोड़ गए एक ज्वलंत स...