पर्व लोहड़ी का था
और हम आग देखते रहे,
उद्यान राष्ट्रीय था और
हम बाघ देखते रहे।
ताक में बैठे शिकारी
हिरन-बाज देखते रहे,
हुई बात फसल कटाई की,
हम अनाज देखते रहे।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे, मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में। बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले, हमने ...
सुन्दर
ReplyDeleteवाह
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