...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
Saturday, May 30, 2015
Saturday, January 24, 2015
Wednesday, December 31, 2014
Saturday, December 6, 2014
नृशंसता का यथार्थ !
नापाक हरकते कभी पाक नहीं होती ,
चालबाजी कभी इत्तेफाक नहीं होती ,
वास्ता दे-दे के जो अनुसरण करवाये ,
ऐसे मजहबों की कोई धाक नहीं होती।
बलात् भगत जितना भी बद्ध दिखाए,
जहन किंतु श्याम वर्ण त्याग न पाए ,
क्रिया, मुख से जितना भी दम्भ भरे,
त्रासित छाती कभी चाक नहीं होती।
नियम,नियमावली ऐसे कामगार के,
तामील होती है ज्यूँ ,बेड़ियां डार के ,
एक आजाद शख़्सियत वहाँ होती है,
जहां बंदिशों की कोई ताक नहीं होती।
अपने लिए तो बटोरा उस पार तक,
और दूसरों का छीना जीने का हक़ ,
नृशंसता की हर हद लांघी है फिर भी,
शर्म से नीची कोई नाक नहीं होती।
साये में जिंदगी कोई करामात ही है ,
मुकाम मिले तो वो भी खैरात ही है ,
अस्तित्व का सच तो ये है 'परचेत ',
अवसानोपरांत कोई ख़ाक नहीं होती।
Tuesday, December 2, 2014
हुनर ने जहां साथ छोड़ा, सलीका वहाँ काम आया।
इक ऐसा मुकाम आया,तोहमत छली का आम आया,
वंश-नस्ल का नाम उछला, गाँव,गली का नाम आया।
हमी से सुरूरे-इश्क में , कही हो गई कोई भूल शायद,
मुहब्बत तो खरी थी हमारी,नकली का इल्जाम आया।
नजर से आके जब लगे वो, आशिकी का तीर बनकर,
खुशी की सौगात लेकर, पर्व दीपावली का धाम आया। सत्कार काँटों ने किया पर, थे हमारे ख्वाब कोमल,
सीने लगूंगी फूल बनके, इक कली का पैगाम आया।
राग-बद्ध करने चला जब, प्रीति के दो लब्ज 'परचेत' ,
हुनर ने जहां साथ छोड़ा, फिर वहाँ सलीका काम आया।
Friday, November 21, 2014
जोरू-दासत्व
हुई जबसे शादी, जीरो वाट के बल्ब की तरह जलता हूँ,
यूं तो पैरों पे अपने ही खड़ा हूँ मगर, रिमोट से चलता हूँ।
माँ-बाप तो पच्चीस साल तक भी नाकाम रहे ढालने में,
अब मोम की तरह बीवी के बनाये, हर साँचे में ढलता हूँ।
न ही काला हूँ, कलूटा हूँ, न ही गंजा हूँ और न लंगड़ा हूँ ,
फिर भी उससे दहशतज़दा हूँ, उसकी नजरों में खलता हूँ।
डोर से बँधी इक पतंग सी बन कर रह गई है जिंदगी ,
सब ठीक हो जाएगा यही समझाकर दिल को छलता हूँ।
सब ठीक हो जाएगा यही समझाकर दिल को छलता हूँ।
हकीकत तो ये है कि खुद कमाकर पालता हूँ पेट अपना ,
किंतु एहसास ये मिलता है,किसी के टुकड़ों पर पलता हूँ।
जोड़ी थी जिसने जन्मपत्री, बेड़ा-गरक हो उस पंडत का,
उजला भी काला दिखे अब तो 'परचेत', आँखें मलता हूँ।
Saturday, November 15, 2014
'मनु' का इतिहास और दीमक की 'बाम्बी' !
'कुतरा', टुकड़ा-टुकड़ा बीजकों का, कुछ भी न बचा,
दीमक 'अभिषेक ' खा गए, इतिहास 'मनु 'का रचा।
दंग रह गए देशभर के, तमाम लगान महकमे वाले,
बलाघात देने वालो को ही, धूर्त देना चाहते हैं गच्चा।
तारीफे-काबिल लगती है इनकी, ये हाथ की सफाई,
निन्यानबे के फेर में कमवख्तों ने,करोडो लिए पचा।
दफ्तर था चार्टर्ड अकाउंटेंट का, या दीमक की बांबी,
देख दुर्गत वाउचरों की, न्यायतंत्र का भी माथा तचा।
निगला देश सारा,सालों कोलगेट, टूजी-ब्रश करते रहे,
सूबे का जब सुलतान बदला, कोहराम तब जाके मचा।
भविष्य उज्जवल नजर आता है इनका तो 'परचेत',
शठ-अपवंचक अगर दीमकों को, यूं ही देते रहे नचा।
Friday, November 7, 2014
लघु-व्यंग्य:- गई भैंस एयरपोर्ट में !
बड़े-बड़े दावे करने वाली मोदी सरकार की सुरक्षाखामियों की पोल आखिरकार खोली भी तो किसने, भैंस ने। यह सरकार खुद दिल्ली में बैठकर बड़े-बड़े वादे कर रही है, और यहां से करीब हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर भैंसे अतिसंवेदनशील इलाकों में अतिक्रमण पर आमादा हैं। भैस के दुस्साहस से खिंसियाई सरकार जहां अपनी सफाई में यह तर्क दे रही है कि चूँकि भैंस का रंग काला होता है, इसलिए एयरपोर्ट पर तैनात सुरक्षाकर्मी रात के अँधेरे में घुसपैठ रोकने में नाकामयाब रहे होंगे। वहीं विपक्ष को भी बैठे-बिठाए एक गंभीर मुद्दा मिल गया है है और वह सरकार पर यह तंज कसने से बाज नहीं आ रही है कि जो सरकार एक काली भैस को न ट्रेस कर सके वह भला काले बुर्केधारी इसीस अथवा अलकायदा को क्या ख़ाक ट्रेस कर पाएगी।
उधर नाम न बताने की शर्त पर गुजरात सरकार के एक आलानेता ने आरोप लगाया है कि यह सारी घटना साजिशन हुई है। भैस आजमखान साहिब की रही होगी और चूँकि आदित्यनाथ जी के आजमखान साहिब पर हालिया बयान से वह खासा नाराज थी, अत: लखनऊ से चुपके से प्रधानमन्त्री जी के गृहराज्य पहुंचकर उसने इस साजिश को अमलीजामा पहनाया। स्थानीय मीडिया सर्कल में यह अपवाह भी गरम है कि भैंस लालूप्रसाद जी के मुंबई में हुए हालिया ऑपरेशन के बाद से उनके स्वास्थ्य के प्रति काफी चिंतित थी और उनसे मिलने पटना जाने के लिए एयर पोर्ट पहुंची होगी।
उधर एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ में भी इस बात को लेकर एकराय नहीं है कि आखिर कौन सा पशु प्लेन से टकराया, और यदि वह भैस ही थी तो विमान से टकराने के बाद गई कहाँ ? लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह आवारा भैंस ही थी, जो कि भारी-भरकम थी। बोइंग एयरक्राफ्ट को इससे अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा है और अभी पार्किंग एरिया में है। एयरपोर्ट के डायरेक्ट डॉक्टर .ने बताया कि यात्री चमत्कारी ढंग से बच गए। इंजन ब्रेकडाउन या किसी तरह की और गड़बड़ी से ऊपर वाले की कृपा से बच गया। कुछ हवाई विद्वानो का यह भी कहना है कि यह घटना इस बात की तरफ इशारा करती है कि हमारी विमान कंपनिया कितना घटिया प्रोडक्ट हमें मुहैया करा रही है जो इतना भारी भरकम विमान तो क्षतिग्रस्त हो गया, किन्तु भैंस, बिना किसी नुकशान के अँधेरे का फायदा उठाकर सुरक्षित भाग निकलने में कामयाब रही।
जो भी हो किन्तु आतंकियों की धमकियों को देखते हुए स्थिति गंभीर है और सरकार को इसपर शीघ्र ही एक श्वेत-पत्र जारी करना चाहिए।
Wednesday, October 22, 2014
Thursday, September 25, 2014
Tuesday, September 23, 2014
Saturday, September 20, 2014
तेरे इसरार पे मैं, हर हद पार करता हूँ।
बयां यह बात दिल की मैं, सरेबाजार करता हूँ,
ख़ब्त ऐसी ये कभी-कभी,ऐ मेरे यार करता हूँ।
(खब्त =पागलपन )
जबसे हुआ हूँ दीवाना,तुम्हारी मय का,ऐ साकी,
उषा होते ही निशा का, मैं इन्तजार करता हूँ।
अच्छा नहीं अधिक पीना,कहती हो सदा मुझसे,
तेरा इसरार कुछ ऐसा, मैं हर हद पार करता हूँ।
(इसरार=आग्रह )
जो परोसें जाम कर तेरे, ठुकराना नहीं मुमकिन, है अधम हाला बताओ तुम, मैं इन्कार करता हूँ।
खुद पीने में कहाँ वो रस, जो है तेरे पिलाने में,
सरूरे-शब तेरी निगाहों में,ये इकरार करता हूँ।
करे स्तवन तेरा 'परचेत', लगे कमतर,ऐ साकी,
ये मद तेरी सुधा लागे, मधु से प्यार करता हूँ।
(खब्त =पागलपन )
जबसे हुआ हूँ दीवाना,तुम्हारी मय का,ऐ साकी,
उषा होते ही निशा का, मैं इन्तजार करता हूँ।
अच्छा नहीं अधिक पीना,कहती हो सदा मुझसे,
तेरा इसरार कुछ ऐसा, मैं हर हद पार करता हूँ।
(इसरार=आग्रह )
जो परोसें जाम कर तेरे, ठुकराना नहीं मुमकिन, है अधम हाला बताओ तुम, मैं इन्कार करता हूँ।
खुद पीने में कहाँ वो रस, जो है तेरे पिलाने में,
सरूरे-शब तेरी निगाहों में,ये इकरार करता हूँ।
करे स्तवन तेरा 'परचेत', लगे कमतर,ऐ साकी,
ये मद तेरी सुधा लागे, मधु से प्यार करता हूँ।
Thursday, September 18, 2014
बेवफ़ा
तरुण-युग, वो कालखण्ड,
जज्बातों के समंदर ने
सुहाने सपने प्रचुर दिए थे,
मन के आजाद परिंदे ने
दस्तूरों के खुरदुरेपन में कैद
जिंदगी को कुछ सुर दिए थे।
और फिर शुरू हुई थी
अपने लिए इक अदद् सा
आशियाना ढूढ़ने की जद्दोजहद,
जमीं पर ज्यूँ कदम बढे
कहीं कोई तिक्त मिला,
और कभी कोई शहद।
सफर-ऐ-सहरा आखिरकार,
मुझे अपने लिए एक
सपनो की मंजिल भाई थी,
पूरे किये कर्ज से फर्ज
और गृह-प्रवेश पर
संग-संग मेरे "ईएम आई" थी।
अब नामुराद बैंक की
'कुछ देय नहीं ' की पावती ही,
हाथ अपने रह गई,
हिसाब क्या चुकता हुआ
कि वो नाशुक्र गत माह
मुझे अलविदा कह गई।
दरमियाँ उसके और मेरे
रिश्ता अनुबंधित था,
वक्त का भी यही शोर रहा है,
शिथिल,शाम की इस ऊहापोह में
मन को किन्तु अब
येही ख़्याल झकझोर रहा है।
हुआ मेरा वो 'आशियाना ',
उसके रहते जिसपर
हम कभी काबिज न थे,
मगर, वह यूं चली गई,
वही बेवफा रही होगी,
हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे।
Thursday, September 4, 2014
आस्था और श्रद्धा
भावुक था विदाई पर
वहाँ पीहर पक्ष का हर बंदा,
किया प्रस्थान ससुराल,
तज मायका निकली नंदा।
हुआ पराया पीहर,
छूटे रिश्तों के सब ताने-बाने,
रूपकुण्ड से आगे पथ पर
साथ चले सिर्फ
"चौसींगा" वही जाने-माने।
| Heavy Snowfall at Manali in the month of September |
रूठकर गई थी
ससुराल वालों से,
और पीहर में थी
वह चौदह सालों से,
बिन उसके शिव उदास,
लगता था घर उनको
सूना-सूना,खाली-खाली। अब जब वह
वापस कैलाश लौटी,
इन्द्रदेव भी खुश हुए,
कुछ यूं मदद की शिव की,
सितम्बर में बनाया
दिसम्बर का सा मौसम
और खूब बर्फबारी हुई, कल 'मना'ली।।
कैलास के लिए विदा हुई नंदा, छह खाडू गए साथ
Tuesday, August 26, 2014
जोग लिखी
मंजुल समर,शीतल बयार, सर्द जाड़े,
वन,हिमनद,गाँव-गलियन,खेत,बाड़े।
ख़ुद बालपन हुआ संबल जिनसे कभी,
चीड़, देवदार, बुराँस वो सब वृक्ष छाड़े।
प्रकट उसमे भी था अग्रज प्रेम होता,
जब लिया करते वो हमको हाथ आड़े।
तरेरकर नयन,रूबरू होते थे जो कभी,
वो वैर-विद्वेष,गिले-शिकवे सब पछाड़े।
उदर वास्ते सुरम्य हिमशिखर बिसरे,
पड़े निन्यानवे के फेर में, गिन पहाड़े।
कोहलू के से बैल बनकर रह गए अब ,
हर रात बीते दारूण यहां, दिन दहाड़े।
बन गए ज्यूँ कि श्वान धोबी का 'परचेत',
हुए कुटुम्ब से महरूम,मुलाज़मत लताडे।
Friday, August 8, 2014
नादाँ !
थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,
रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।
तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,
हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए।
उलटबासी
शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम,
क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी,
किस-किस से नहीं पूछा पता उसका,
क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी,
सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,
लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,
लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,
उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
Saturday, August 2, 2014
Friday, August 1, 2014
मानव निर्मित बढ़ती त्रासदियां !
पिछले दो दिनों में लगातार दो प्राकृतिक आपदाओं, एक उत्तराखंड और दूसरे पुणे ने लगभग १६० जिन्दगियों को पलभर में लील लिया। इसे प्राकृतिक आपदा कहने में बड़ा आसान लगता है कि जी बाढ़ आने , बादल फटने अथवा लैंडस्लाइड की वजह से ऐसा हो गया । जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि ये मानव निर्मित आपदाए है। बादल पहले भी फटते थे, बाढ़ पहले भी आती थी और लैंडस्लाइड पहले भी होती थी, लेकिन सिर्फ कुछ ख़ास मौकों और प्रकृति के अत्यधिक बिकराल होने पर ही जन-धन की हानि होती थी। आज की तरह हर कोस पर ज़रा सा बारिश होने या बाढ़ आने से ऐसा नुकशान नहीं हुआ करता था। हम अगर इतिहास में थोड़ा सा पीछे जाएँ तो सन १९७० में बिरही नदी पर सन १८९३ में बनी विशाल झील के टूटने ने जो बिकराल रूप उत्तराखंड के चमोली से हरिद्वार तक धरा था, और भारी जन-धन की जो हानि उस जमाने में हुई थी, कल्पना करके रूह काँप जाती है कि भगवन न करे, अगर वह घटना तब न होकर आज के इस युग में घटित हुई होती तो क्या हो जाता?
यहां इसे एक उदाहरण से समझाना चाहूँगा ; पहाड़ी मार्गों पर कभी अमूमन इक्का-दुक्का वाहन घंटे भर के अंतराल से ही चलते दिखाई देते थे, अत : कहीं पर कोई लैंडस्लाइड हो भी जाती थी तो किसी राहगीर के हताहत होने की सम्भाव्यता ना के बराबर होती थी। कल्पना करो कि अगर इन सड़कों पर भी दिल्ली की सड़कों जैसा जाम लगा हो और ऊपर पहाड़ी से एक पत्थर भी खिसककर नीचे आ जाए तो होगा ?
इसमें कोई संदेह नहीं कि अनियोजित विकास और जंगलों का बड़े पैमाने पर विनाश प्रकृति के रोष के पीछे मुख्य कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण है किन्तु हमारे कुछ बुद्धिजीवी और ज्ञानी भले ही सिर्फ इसे ही एक मूल कारण माने , किन्तु अनेक सत्यों में से एक बड़ा सत्य इसके पीछे का जो है वह है ,जनसंख्या विस्फोट। The truth is that the population explosion, colossal greed of people, politicians and bureaucrats are mainly responsible for such frequent disasters .
मुझे ताज्जुब होता है कि इस कमरतोड़ महंगाई और तथाकथित सभ्य जमाने में भी बहुत से हिन्दुस्तानी परिवारों में आठ से दस बच्चों की फ़ौज एक सामान्य सी बात मानी जा रही है. जब आज जरुरत थी कि हम समझदारी और सख्ती के साथ तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करते तब हम सिर्फ अपने तुच्छ राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों में ही उलझे हुए नजर आते है। अभी ताइवान एक ताजा उदाहरण है। गैस, ईंधन पूर्ति के लिए आज हमारी लाइफ लाइन बन चुकी है, मगर यदि ताइवान के पास बहुत सी जमीन बाकी होती तो उसे शहर के बीचों बीच सड़क के नीचे से न तो गैस लाइन बिछानी पड़ती और न ही आज इतना बड़ा हादसा होता।
पता नहीं, हम इंसान कब चेतेंगे !
Monday, July 28, 2014
भारतीय परम्पराएँ और मार्क्स, मैकॉले तथा इब्न रुश्द के छद्म भक्त !
देख रहा हूँ कि मार्क्स, मैकॉले और इब्न रुश्द के मुखौटों में छिपे कुछ पश्चमी दलाल श्री दीना नाथ बत्रा जी की किताब पर काफी हायतौबा मचाये हुए हैं। वेंडी डोनिजर की तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से गलत किताब का बचाव करने के लिए तो ये स्वार्थांध दौड़ पड़े थे, वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला एक पश्चमी लेखिका से सम्बद्ध था। और जो उन अनेक भारतीयों की यह मानसिकता भी दर्शाता है कि स्वदेशी को फेंक देना चाहिए और अगर कोई चीज पश्चिम से आ रही है तो उसे तुरंत आत्मसात कर लेना चाहिए। वाह !
जिस प्रखरता से आज ये कुछ मौकापरस्त दीनानाथ जी की किताब के खिलाफ बोल रहे है, मैं समझता हूँ कि इन मानसिक तौर पर दिवालिये लोगों को अगर ज़रा भी अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लगाव और सम्मान होता तो यही प्रखर विरोधी स्वर तब सुनाई देने चाहिए थे, यह प्रचंड विरोध उनका तब सामने आनी चाहिए था जब वेंडी डोनिजर ने अपनी उस बकवास किताब में लक्ष्मण और माता सीता के सम्बन्धो पर ऊँगली उठाई थी। और अगर उसके तथ्य इतने ही सुदृढ़ थे तो तब पेंगुइन और वेंडी को उस किताब का बचाव अदालत में करने की सलाह दी गई थी, वे क्यों नहीं आये ? क्योंकि उन्हें भी असलियत मालूम थी। अगर इन तथाकथित क्षद्म-सेक्युलर मौकापरस्तों में ज़रा भी स्वाभिमान होता तो ये उस समय पश्चमी मीडिया, जोकि तब यह प्रचारित कर रहा था कि हिन्दुत्ववादियों की हिंसा और बदमाशी की वजह से किताब प्रतिबंधित करनी पडी , उसे जाकर यह सच्चाई बताते कि किताब तथ्यात्मक रूप से गलत थी।
अगर दीना नाथ जी अपनी किताब में यह कह रहे है कि हिन्दू होने के नाते जन्मदिन पर कैंडिल जलाने की बजाये, घर में हवन करो, तो क्या गलत कह दिया भाई? हवन का वैज्ञानिक महत्व भी सभी जानते हैं। अगर हमारे बच्चों को हमारी समृद्ध पौराणिक परम्पराओं से सही तरीके से अवगत कराया जाए तो उसमे बुराई क्या है? ठीक है, और मैं भी स्वीकारता हूँ कि बहुत सी पौराणिक कहानिया कपोल-काल्पनिक होंगी एवं विकास के लिए आज एक अग्रणी सोच बच्चों में अवश्य होनी चाहिए, मगर उसका मतलब सिर्फ यह नही कि हम वह अग्रणी सोच सिर्फ पश्चिम से आत्मसात करें। यदि पश्चमी सोच इतनी ही अग्रणी है तो अमेरिका और यूरोप के बच्चे आज एशियाई बच्चों से पिछड़ क्यों रहे है ? जब रामायण अथवा महाभारत की बात आती है तो आप लोग उस आधार पर हिन्दू धर्म की बहुत सी खामिया गिनाने की कोशिश करते हो, किन्तु अगर उसे सत्य मानते हो तो इस तथ्य को सत्य मानने में क्यों दिक्कत होती है आपको कि रावण के पास उस वक्त भी विमान थे ?
और भैया, अगर आपको बहुत ही ज्यादा दर्द हो रहा है तो बजाय इधर उधर हो-हल्ला मचाने के दीनानाथ जी की किताब को अदालत में चुनौती दो, अगर हिम्मत है तो।
Thursday, July 10, 2014
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कुपत
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नोट: फिलहाल टिप्पणी सुविधा मौजूद है! मुझे किसी धर्म विशेष पर उंगली उठाने का शौक तो नहीं था, मगर क्या करे, इन्होने उकसा दिया और मजबूर कर द...
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