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Showing posts from 2010

जिन बच्चों को झूठ सिखाया जाता है उनकी नस्ल हिंसक होती है - भगवान बुद्ध !

वैसे फिलहाल इस तरह का लेख लिखने के कदाचित मूड मे न था, किन्तु इन्सान के आस-पास जब कुछ घट्नाये ऐंसी जन्म ले लेती है, जो कहीं उसके मानस पटल पर कुछ उद्वेलित भाव छोड जायें, तो निश्चिततौर पर इन्सान अपने आन्तरिक भावों को नियंत्रण मे रख पाने मे दिक्कत महसूस करता है. और ऐसा ही कुछ मै भी महसूस कर रहा था. इस पावन-भूमि पर समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया, और आज हम उन्हे भगवान के शीर्ष रखने की कोशिश इसीलिये करते हैं क्योंकि हजारों साल पहले उनके द्वारा सिखाया गया बौद्धिक, आद्ध्यात्मिक और व्याव्हारिक आचरण आज भी सौ प्रतिशत प्रसांगिक हैं, और समय की कसौटी पर एकदम खरा उतरता हैं. वो आज भी हमारे लिये प्रेरणास्रोत का काम करता है. भगवान बुद्ध भी अपने समय की एक ऐसी ही दिव्य, आलौकिक ह्स्ती थे, जिन्होने कहा था कि जिन बच्चों को झूठ सिखाया जाता है उनकी नस्ल हिंसक होती है . अभी कुछ दिनों पहले यानि १६ दिसम्बर, जिस दिवस को आज से ४० साल पहले भारत ने पाकिस्तान पर एक निर्णायक विजय प्राप्त की थी, और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश), पश्चिमी पाकिस्तान से अलग हुआ था, उसके बारे मे भारतीय मीडिया की वेब साइटों पर खास कु...

आगाज इक्कीसवीं सदी का !

नफ़रती जूनून मे सुलगता शिष्ट ये समाज देखा , अमेरिकी द्वी-बुर्ज देखे और मुंबई का ताज देखा।   आतंक का विध्वंस देखा कश्मीर से  कंधार तक , हमने ऐ सदी इक्कीसवीं, ऐसा तेरा आगाज देखा। सब लड़खड़ाते दिखे, यक़ीन, ईमान  धर्म-निष्ठा, छलता रहा दोस्त बनके ,हर वो धोखेबाज देखा। बनते हुए महलों को देखा, झूठ की बुनियाद पर, छल-कपट,आडम्बरों का, इक नया अंदाज देखा। नमक, रोटी और प्याज, आहार था जो दीन का , उसे खून के आंसू रुलाता, मंडियों में प्याज देखा। माँ दिखी अपने शिशु को, घास की रोटी खिलाती. बरसाती गोदामों में सड़ता, सरकारी अनाज देखा।   फक्र था चमन को जिस,अपने तख़्त-ए-ताज पर, चौखटे एक दबंग चंड की,दम तोड़ता वो नाज देखा। बयाँ  इन शब्दों  में करते  हो रहा अफ़सोस है , किंतु 'परचेत' अबतक तो हमने,सिर्फ जंगल-राज देखा। 

इस आतंकवाद को भी समझना होगा !

न सिर्फ़ देशभर मे अपितु पडोसी मुल्कों जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश मे भी विकीलीक्स के इस खुलासे के बाद कि आजादी के बाद से ही इस देश को नरक मे धकेलने वाले एक शाही परिवार को , देश के लिये हिन्दु आतंकवाद से कितनी चिन्ता हो रही है , तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गरम है। और खुद को दुनिया का स्वयंभु पुलिसवाला बताने वाला एक देश जहां इराक और अफ़गानिस्तान मे मुसलमानों को समूची मानवता का दुश्मन बताकर लाखों की तादाद मे बेगुनाहों की जान ले चुका, वह इस देश के मुसलमानों को शरीफ़ इन्सानों का खिताव देने से भी नही चूकता क्योंकि इस देश मे पिछले एक दशक के बम विस्फ़ोटों और आतंकवादी हमलों मे जिन हजारों बेगुनाहों और सुरक्षाबलों के जवानो की जानें गई, इनकी सोच के हिसाब से अमेरिकियों के मुकाबले उनकी जान की तो कोई कीमत ही नही थी। और वह सब हमले मुस्लिमों ने नही, "मुस्लिम आतंकवादियों" (मानो ए कही अलग दुनिया से टपके हो ) ने किये, इस देश के मुस्लिमों में से सिर्फ़ कुछ ही ने इन्हे लौजिस्टिक सपोर्ट प्रदान की थी, बस। सिमी और इन्डियन मुजाहिदीन के कैडरों मे जितने लोग भर्ती है, वे सब तो पाकिस्तान से आये हुए है, यहां क...

नवगीत- हम भारत वाले! (रिमिक्स)

साल २०११ चंद हफ्तों बाद हमारी देहरी पर होगा अत: आप सभी से यह अनुरोध करूंगा कि देश के वर्तमान हालात के अनुरूप इस रिमिक्स को खूब गुनगुनाये नए साल पर; करलो जितनी जांचे, आयोग जितने बिठाले, नए साल में फिर से करेंगे, मिलकर नए घोटाले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! आज पुराने हथकंडों को छोड़ चुके है, क्या देखे उस लॉकर को जो तोड़ चुके है, हर कोई है जब लूट रहा देश-खजाना, बड़े ठगों से हम भी नाता जोड़ चुके हैं, सुथरे घर, उजली पोशाके, कारनामे काले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! अभी लूटने है हमको तो कई और खजाने, भ्रष्टाचार के दरिया है अभी और बहाने, अभी तो हमको है समूचा देश लुटाना, देश की दौलत से रोज नए खेल रचाने, आओ मेहनतकश पर मोटा टैक्स लगाए, नेक दिलों को भी खुद जैसा बेईमान बनाए, पड़ जाए जो फिर सच,ईमानदारी के लाले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! करलो जितनी जांचे, आयोग जितने बिठाले, नए साल में फिर से करेंगे, मिलकर नए घोटाले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! जय हिंद !

अहसास !

ये बताओ, तुम्हारे उस बहुप्रितिक्षित कुम्भ आयोजन का क्या हुआ, जो तुम्हारे हुश्न, मुहब्बत और वफ़ा की त्रिवेणी पर अर्से से प्रस्तावित था ? मैं तो कबसे अपने मन को इस बात के लिए प्रेरित किये था कि इस बार मैं भी संगम पर डुबकी लगा , जिगर के कुछ दाग धो ही डालूँगा ! अब तो यही सोचकर संयम पैरों तले से फिसलता नहीं कि प्रतीक्षा करवाना तुम्हारी पुरानी आदत है !!

दुनिया जाए भाड़ में !

ऑफिस के काम से मुंबई जाना हुआ। सुबह ११  बजे ही काम निपट गया। छोटा सा काम था, अत: आधे घंटे में ही निपट लिया। वापसी सवा तीन बजे की थी, अत: समय गुजारने के लिए सोचा कि मैरीन ड्राइव पास में है, क्यों न कुछ देर मैरिन ड्राइव पर चहल कदमी की जाए। सामने सड़क पार की और पहुँच गए। वैसे तो बीसियों बार उस सड़क से गुजर चुका  हूँ, मगर पैदल का आनंद पहली बार ले रहा था। वहां पत्थरों की आड़ में बहुत सी दिव्य-आत्माए बैठी थी, कोई घर से दफ्तर के बहाने निकला होगा तो कोई कालेज के बहाने, जिस तरह कतारबद्ध वे लोग बैठे थे, उससे यह भी अहसास हुआ कि मुंबई के लोग कितने अनुशासित है। अत: उन्हें देख मेरे  दिमाग में  थोड़ा सा पका आपके समक्ष पेश है ; लड़कपन  बिगड़ा  माँ-बाप के लाड में , यौवन, संग अंतरंग झाड की आड़ में, छूं  गए जब  कुछ बुलंदियां प्यार की,  जोरू आई और लग गए 'जर 'जुगाड़ में।   खैर, इसी का तो नाम जिंदगी है।  

'कर' खा गए !

भूखे-नंगे,लालची,हरामखोर  परजीवी, 'पेट-भर' खा गए, जो  मेहनत की आय का   भरा था मैने, वो 'कर' खा गए।   टूजी, सीडब्ल्युजी, बैंक,एलआइसी, आदर्श 'हर' खा गए, जो  मेहनत की आय का   भरा था मैने, वो 'कर' खा गए।   कोड़ा, कोयला,क्वात्रोची, आइपीएल,चारा और हवाला, तेलगी, हर्षद, केतन, सत्यम,  दामाद जमीन घोटाला, और तो और ये  कारगिल शहीदों के भी 'घर' खा गए, जो  मेहनत की आय का   भरा था मैने, वो 'कर' खा गए।   कुल २० हजार खरब खा चुके,  वुभुक्षित कितना खाते है, कर्म से तो हैं ही,  शक्ल से भी चोर नजर आते है, घोटाले-कर करके  जुगाली में ही देश  चबा गए, जो  मेहनत की आय का   भरा था मैने, वो 'कर' खा गए।  

स्वतंत्र होना शेष है!

THURSDAY, MARCH 26, 2015 अग्नि-पथ ! लुंठक-बटमारों के हाथ में, आज सारा देश है, गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है ! सरगना साधू बना है, प्रकट धवल देह-भेष है, गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!! भ्रष्ट-कुटिल कृत्य से, न्यायपालिका मैली हुई, हर गाँव-देश  दरिद्रता व भुखमरी फैली हुई ! अविद्या व अस्मिता, अभिनिवेश, राग, द्वेष है, गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!! राज और समाज-व्यवस्था दासता से ग्रस्त है, जन-सेवक जागीरदार बना,आम-जन त्रस्त है ! प्रत्यक्ष न सही परोक्ष ही,फिरंगी औपनिवेश है, गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!! शिक्षित समझता श्रेष्ठतर है,विलायती बोलकर, बहु-राष्ट्रीय कम्पनियां नीर भी, बेचती तोलकर, देश-संस्कृति दूषित कर रहा,पश्चमी परिवेश है, गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!!

कार्टून- बिहार चुनाव परिणाम !

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शायद !

फैसले तमाम अपने कल पर टाले न होते, मुमकिन था, देश में इतने घोटाले न होते। सांप-छुछंदर आस्तीनों में जो पाले न होते,  मुमकिन था,  देश में इतने घोटाले न होते ॥ परदों, मुखौटों में छुपकर के शठ-मक्कार, कर न पाते इसतरह हमारी ही पीठ पर वार, सिंहासन, गांधारी-धृतराष्ट्र संभाले न होते, मुमकिन था,  देश में इतने घोटाले न होते।  जन उभय-निष्ठ, उलझा हुआ है अपने में, मुल्ले,पण्डे, पादरी लगे है स्वार्थ जपने में, अगर आवाम के मुँह पर पड़े ताले न होते, मुमकिन था,  देश में इतने घोटाले न होते।  समाज, जाति-धर्म में इतना बँटा न होता, हिंदोस्तां अपना जयचंदों से पटा न होता, गर नेता-नौकरशाहों के दिल काले न होते, मुमकिन था,  देश में इतने घोटाले न होते।  सियासत के पंकमय हमाम में सब नंगे है, कोयले की दलाली में सबके सब बदरंगे है,    ओंछे पंक में धसे नीचे से ऊपर वाले न होते,  मुमकिन था,  देश में इतने घोटाले न होते।  अमुल्य वोट अपने अविवेक...

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये !

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आप सभी ब्लोगर मित्रों, पाठकों और शुभचिंतको से क्षमा चाहता हूँ कि पिछले १५ दिनों से चिकनगुनिया से गर्सित होने की वजह से इस तरफ जिन्दगी की जद्दोजहद जारी है, खैर,शायद इसी का नाम जिन्दगी है ! सहनशीलता का गुण चराग से सीखने की कोशिश में लगा हूँ ! दीपावली के इस पावन अवसर पर आप सभी को और आपके समस्त पारिवारिकजनों को अपने और अपने परिवार की तरफ से दीपावली की ढेरों शुभकामनाये प्रेषित करता हूँ !

गांधी जयन्तीपर एक प्रयास !

सर्वप्रथम गांधी जयन्ती  और शास्त्री  जयन्ती  पर सभी ब्लोगर मित्रों, पाठ्कों और सभी देशवासियों को हार्दिक शुभ-कामनायें और देश के इन सपूतों को श्रद्धांजली ! आज सुबह एक काव्यात्मक पोस्ट लगाई थी, लेकिन बाद मे रियलाईज हुआ कि मैं इस ब्लोगिंग के चक्कर मे पडकर न सिर्फ़ लेखन के क्षेत्र अपितु व्यावहारिक जीवन मे भी जरुरत से ज्यादा नकारात्मकता की ओर झुकता जा रहा हूं! आज इन महान सपूतों का जन्मदिन भी श्राद्ध मास मे आया है तो और कुछ नही तो हम सच्चे मन से कम से कम इन्हे श्रद्धा सुमन तो अर्पित कर ही सकते है ! अत: मैने अपनी वह पोस्ट डीलीट कर दी ! साथ ही इस पुण्य-पावन अवसर पर यह निश्चय करता हूं कि आइन्दा जहां तक हो पायेगा, सकारात्मक लिखने की कोशिश करुंगा अन्यथा कुछ लिखुंगा ही नही ! अब इस पावन-पवित्र अवसर पर सभी से दो बातें कहुंगा या फिर अपील करना चहुंगा; पहला यह कि मंदिर-मस्जिद को अपने तुच्छ अहम से जोडकर हम हिंदुस्तानियों ने आपस मे ही एक दूसरे का बहुत कत्लेआम कर लिया ! मंदिर और मस्जिद दोनो ही उपरवाले के स्मरण के लिये हम लोग इस्तेमाल करते है, अगर बाबर मूर्ख था, तो इसका यह मतलब कदा...

यूँ तो मसला कुछ भी न था, किन्तु माथुर साहब थे कि.... (व्यंग्य) !

आजादी के बाद देश की करीब ५६५ रियासतों को भारत गणराज्य में मिलाने हेतु हमारे देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, लोह पुरुष सरदार पटेल ने जी-जान से अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी ! हैदराबाद के निजाम और जूनागढ़ के नवाब को छोड़, जम्मू कश्मीर ही एक ऐसी रियासत रह गई थी , जहां माथुर साहब की अपनी निजी उच्च आकांक्षाओं के चलते पटेल साहब के सारे प्रयास विफल गए ! २० अक्तूबर १९४७ को जब उत्तरी कश्मीर की तरफ से अनेक पठानी आताताइयों (कबालियों ) की मदद से पाकिस्तानी सेनायें कश्मीर में घुसी और माथुर साहब के पिछवाड़े पर जब जोर की पडी, तब जाकर माथुर साहब मदद को चिल्लाए ; परिणामत: करीब ३००० से अधिक भारतीय सैनिकों को अपने प्राणों की तत्काल आहुती देनी पडी, और तब से आज तक हर साल सेकड़ों की तादात में देते आ रहे है ! अब आ गया १९४९, बताते हैं कि मेरे ही जैसे कुछ सिरफिरे हिन्दुओं ने अपने हक़ के लिए लड़ते हुए उस खंडहर में भगवन राम और सीता की मूर्तियाँ रख दी थी, जो सदियों से वीरान पड़ा था, जहां कोई नमाज अता नहीं की जाती थी, और जिसे बाबर ने भगवान् राम के मंदिर को तोड़कर उसके ऊपर बनाया था! यूँ तो मसला कुछ भी न था, क्...

अद्भुत खेल !

इधर जोर-शोर से तैयारियां चल रही थी  फाइनल टचिंग की, सरकारी स्तर पर और उधर,  खेल गाँव में सांप जी लेटे हुए थे, एक अफ्रीकी ऐथेलीट के बिस्तर पर। अफ्रीकी ऐथेलीट उसे देखकर बोला, ये तो भैया मेरे साथ सरासर रंग-भेद है, मुझे भी लगता है कि अबके इस कॉमन वेल्थ के खेल में कोई बड़ा छेद है। तभी रूम अटेंडेंट  दौड़ा-दौड़ा  उसके पास जाकर बोला, नहीं भैया जी,  अबके अद्भुत ये खेल निराले है, पांच साल में  सत्तर हजार करोड़ खर्च कर , हमने सांप और संपेरे ही तो पाले है। 

नकारात्मक सोच !

नकारात्मक ख़बरों के लिए कुछ बिके हुए भारतीय मीडिया की तो मैं नहीं जानता, मगर मुझे भी मेरे कुछ दोस्त यह सलाह देते है कि मैं बहुत ज्यादा नकारात्मक लिखता हूँ। मैं उनकी बात को सिरे से नकारता भी नहीं, क्योंकि मैं कोई सतयुगी साधू-महात्मा नहीं ( कलयुगी तो ज्यादातर चंद्रास्वामी के भक्त है ) । मगर मेरा एक मासूम सा सवाल हमेशा रहता है कि वैसे तो मेरा भी मन सकारात्मक लिखने का करता है मगर जब आपके आसपास सभी कुछ नकारात्मक हो तो आप सकारात्मक सोचने की उम्मीद कैसे कर सकते है, जब तक कि अगला अपनी क्रियाशैली न बदल ले ?( यानि खुद भी नकारात्मक करके सकारात्मक बनने का ढोंग रचें ) समयाभाव के कारण बहुत लंबा नहीं लिखूंगा, मगर एक वाकये से अपनी इस नाकारात्मकपन का जस्टिफिकेशन देना चाहूँगा। मैं मूलत: उत्तराखंड से हूँ , स्वाभाविक है कि मेरे बहुत से करीबी उत्तराखंड में है, जिनसे मेरी रोज बात होती रहती है। दुनिया जानती है कि इसबार मानसून ने उत्तराखंड में क्या कहर बरपाया है। मगर हम दिल्लीवासी नहीं जानते, क्योंकि हम तो कॉमनवेल्थ गेम की तैयारियों में लगे है, उन गेम की जिसने पहले ही देश के माथे पर एक बड़ा कलंक लगा रख छोड़ा है...

अपेक्षा !

मुझे न जाने कभी-कभी  ऐसा  क्यों  लगता है कि  अब तो बस इस भरतखंड का तभी असल विकास होगा,  जब  बड़ी-बड़ी मछलियों और मगरमच्छों की बस्ती, नई दिल्ली-१ से उफनते हुए      कभी जमुना जी का निकास होगा। : : : : : : : : : : : : : : : : : : कोसी की कसम ! यमुना जी, आप सुन रही हैं न ?

शर्म के मायने !

भगवान् का शुक्रिया अदा कीजिये कि "कॉमन वेल्थ" के नाम पर आज सुबह से अभी तक भ्रष्टों द्वारा बिछाई गई देश के करदाता के खून पसीने की रकम का कोई हिस्सा सरसरी तौर पर टूटकर या ढहकर बेकार नहीं गया। वो कह रहे है कि गेम्स विलेज (खेल गाँव ) खिलाडियों के रहने लायक जगह नही है। सडकों पर इंद्रदेव के कोपभाजन की वजह से बड़े-बड़े गड्डे पड़े है।नाक के नीचे का एक नया बना फूटओवर ब्रिज टूट्कर गिर गया है। नेहरु स्टेडियम मे जहां आज से 09 दिन बाद खेलो का उद्धघाटन होना है, फाल्स सीलिंग गिर गई है। खिलाड़ियों के लिए बिछाये बिस्तरों पर कुत्ते आराम फरमा रहे है। सड़कों पर पिछले पांच सालों से खेलों के नाम पर किये जा रहे निर्माण की वजह से पहले से पके बैठे एक आम दिल्लीवासी का चलना दुभर हो गया है। सुरक्षा के नाम पर आतंकवादी खुले सांड की तरह घूम रहे है। विदेशी चैनल वाले विस्फोटक लेकर या यहाँ खरीदकर स्टिंग ओपरेशन कर रहे है और तब जाकर कोई एक-दो नहीं पूरे १० बैरिकेड खेलगांव के गेट के आसपास लगा दिए गए है। जिनपर सुबह से शाम तथा शाम से रातभर तक खड़े-खड़े पहरा दे रहे पुलिस वाले दिन भर बारिश में भीगकर बीमार पड़ रहे है, क्य...

उलझन !

लगातार बरसती ही जा रही सावन की घटाएं हैं , बिखरी पड़ी  प्राकृतिक सौम्य छटाएं हैं । नतीजन  जीवन की हार्ड-डिस्क मे कहीं नमी आ गई है, ख़्वाबों की प्रोग्रामिंग सारी भृकुटियाँ तन रहीं हैं, हसरतों की टेम्पररी फाइलें भी बहुत बन रही है। समझ नही आ रहा कि रखू, या फिर डिलीट कर दू, 'फ़ोर्मैटिंग' भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !

ख्वाइश !

मैंने  कब ये चाहा  कि मैं भी बहुत बड़ा 'रिच' होता, मेरी तो  बस,   इतनी सी ख्वाइश थी ऐ जिन्दगी, कि तुझमे  भी एक ऑन-ऑफ का स्विच होता, जिसे मैं  मन माफिक जब 'जी' में आता, जलाता और बुझाता।  

शिकायत ऊपरवाले से

हे ऊपरवाले  ! इस दुनिया में, स्वार्थीजन आपको खूब अलंकारते है, भगवान्,ईश्वर, अल्लाह, रब, खुदा गॉड और न जाने  किन-किन नामों से पुकारते है।   निःसंदेह आप खेवनहार हो, इस दुनिया के पालनहार हो, खूब लुटाते हो अपने भक्तों पर, आपकी कृपा हो तो घोड़े-गधे भी  बैठ जाते है ताजो-तख्तों पर।   मगर एक बात जो मुझे अखरती है , माय बाप ! सिर्फ मेरी ही बारी क्यों कंजूस बन जाते हैं आप ? मुझे बताओ, ऐ ऊपर वाले ! मुझमे ही सारे गुण तुमने पाइरेटेड क्यों डाले? अरे, कम से कम  लेबल तो निकाल देते, कुछ नहीं था, तो यार,  एंटी-वायरस तो ओरिजिनल डाल देते। 

इमेज !

यह आज मेल से मिला था, हिन्दी रूपांतरण मनोरंजनार्थ पेश है ; यूपी से बिहार के राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगे तगड़े जाम में एक ड्राइवर फंसा हुआ था । आधा घंटा गुजरा, एक घंटा गुजर गया, लेकिन ट्रैफिक था कि हिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। फिर अचानक कुछ लोग आये और उसकी गाडी की खिड़की पर ठक-ठक किया । उस ड्राइवर ने अपनी गाडी की खिड़की का शीशा उतारा और पूछा- क्या चल रहा है भाई, ये ऐसा जाम क्यों लग गया ? वे बोले कि देश के कुछ विख्यात नेतागण सड़क मार्ग से पटना जा रहे थे, तो कुछ नक्सलियों ने उनका अपहरण कर दिया है। और अब वे नक्सली इनको छोड़ने का प्रति नेता १० लाख रूपये मांग रहे है, और साथ ही धमकी भी दे रहे है कि अगर तुरंत पैसों का इंतजाम नहीं किया तो वे उनके ऊपर पेट्रोल डालकर आग लगा देंगे। इसलिए हम यहाँ एक-एक गाडी वाले के पास जा रहे है ताकि कुछ कलेक्शन कर सके। अच्छा ये बतावो कि औसतन कितना दे रहे है लोग ? ड्राइवर ने उत्सुकता से पूछा। ज्यादातर लोग तकरीबन पांच लीटर तो दे ही रहे है !!!!!!!

कुत्ते से करिये मालिक की पहचान !

दिये गये शीर्षक पर कुछ लिखने से पहले एक छोटी सी भंडास निकालना चाहुंगा. आप घबराइये नही, यह भंडास अथवा बद्दुआ मैं उन निर्लज बेशर्मो पर निकाल रहा हूं जिन्होने आम दिल्ली वालों का जीना पिछले एक दशक से दुभर कर रखा है, विकास के नाम पर। कभी फ़्लाईओवर के नाम पर, कभी सडक चौडीकरण के नाम पर, कभी जल निकासी के नाम पर और कभी कौमनवेल्थ के नाम पर। आजकल तो हालात ये हैं कि सुबह से शाम तक की बारह घंटे की दिनचर्या मे चार घंटे तो सिर्फ़ सड्कों पर ही गुजारने पड रहे है, कौमनवेल्थ की रिहर्सल के नाम पर पर लगने वाले जाम की वजह से । देश की तीस हजार करोड की कौमन वेल्थ को तो इस देश के ये कुछ भस्मासुर चट कर गये और ऊपर से धमकी आम जन को कि अगर फ़लां-फ़लां लेन मे घुसे तो.........समझ मे नही आता है कि ये लोकतंत्र है या फिर नादिरशाही ? इन चंद भस्मासुरों ने बिके हुए मीडिया संग मिलकर क्या-क्या सब्जबाग नही दिखाये थे इन दिल्ली वालों को, मसलन पांच गेयर तो छोड दीजिये ये तो कह रहे थे कि अगर गाडी मे छ्टा गेयर भी लगा दिया गया तो उस पर भी गाडिया दौडेगी। यमुना के नीचे से ठां से रेल निकलेगी और सीधे स्टेडियम मे ही जाकर रुकेगी......औटो की ...

कोई तन्हा न रहे !

घिर आये है बदरा घने, हो रही तेज बारिश भी, दिल में इक कसक भी है, लब पे सिफारिश भी।   शाम ये उल्फत भरी है, कहीं कोई तन्हा न रहे, मायूस न हो किसी की , छोटी सी गुजारिश भी।   गुजरें न किसी की शामे उदास, 'मयखाने' में, दिल में जीने की तमन्ना हो, और ख्वाइश भी।  सिर्फ खफा रहने से जिन्दगी बसर नहीं होती, अर्जी में इंतिखाब भी रहे और फरमाइश भी।   मिलता है हर किसी को हिस्से का ही मुकद्दर, करें क्यों 'परचेत', तकदीर से आजमाइश भी।  

कार्टून- डोपिंग का असर !

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छवि गूगल से साभार !

सरकारी आंकडे भी भरोसेमंद नही रहे !

सरकार ने माना है कि उसके द्वारा पिछले मंगलवार को जारी इस वित्तीय वर्ष के अप्रैल से जून तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की ८.८ प्रतिशत की आर्थिक विकास दर से सम्बंधित आंकडो के आंकलन मे गलतियां थी और वह नये सिरे से इनका आंकलन करेगी। यह बात वित्त मन्त्री ने तब मानी जब कुछ वित्तीय समीक्षकों ने इन आंकडो पर यह कह्ते हुए संदेह व्यक्त किया और आलोचना की कि सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मुल्यांकन बाजार मुल्य पर किया। बाजार मुल्य पर किये गये इस मुल्यांकन मे वस्तुओ के उत्पादन और सेवाओं की लागत सिर्फ़ ३.६५ प्रतिशत आंकी गई है, जबकि वास्तविक तौर पर यह दस प्रतिशत से भी अधिक है। साथ ही यह भी दर्शाने की कोशिश की गई कि इस दौरान देश मे उत्पादों का उत्पादन और उसकी आपूर्ति तो छक के है, मगर कोई इन उत्पादों को खरीदने वाला ही नही है। यह बात भी यहां उल्लेखनीय है कि अनेक वित्तीय समीक्षक यह मानते है कि हमारे देश मे सकल घरेलू उत्पाद को मापने का पैमाना अन्तर्राष्ट्रीय मानको से भिन्न है और अगर हम ईमानदारी से अन्तर्राष्ट्रीय मानकों का पालन इसकी गणना मे करें तो हमारी यह विकास दर ४ प्रतिशत से भी नीचे है। अगर आपने इ...

एक लघुतम कथा- मरियल सर्वेसर्वा !

एक देश था, दृढ़, प्रबल, उपायकुशल, साधन संपन्न, सक्षम, साहसी, पराक्रमी, वैश्विक स्तर पर आर्थिक, सैन्य, कूटनीतिक,सांस्कृतिक एवं बौद्धिक , सर्वशक्तिमान के ये जितने पर्याय है, उन सब से परिपूर्ण था वह देश !मगर उस देश का एक दुर्भाग्य यह भी था कि उसने अपने अन्दर गद्दार और कायर निकम्मे भी प्रचुर मात्रा में पाल रखे थे ! वहाँ के कुशल इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने उन्नत किस्म के दिव्यास्त्र, आग्नेयास्त्र दुश्मन के दांत खट्टे करने के लिए बना रखे थे ! देश ने उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का बटन देश के सर्वेसर्वा के हाथों में दिया हुआ था, और चूँकि सर्वेसर्वा मरियल सा था इसलिए उसे इतनी भर जिम्मेदारी दी गई थी कि वह मौक़ा पड़ने पर सिर्फ बटन दबा दे ! इतना सबकुछ होते हुए भी विडम्बना देखिये कि जरुरत पड़ने पर वह देश अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पाया, क्योंकि उसके लोगो ने अपने आयुद्ध भंडारों का जो रिमोट बटन उस मरियल से सर्वेसर्वा को पकड़ा रखा था, ऐन-वक्त पर वह उसे इस्तेमाल नहीं कर सका ! वजह यह थी कि वह सर्वेसर्वा खुद भी रिमोट से ही चलता था, एवं जिसके पास उसे चलाने का रिमोट बटन था, वह कहीं छिपकर यह सब देख आनंदित ह...

बेचारे पाकिस्तानी गधे !

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आपने यह खबर तो अब तक सुन/ पढ़ ही ली होगी कि पाकिस्तानी खिलाडियों पर लगे स्पाट फिक्सिंग के आरोपों से नाराज पाकिस्तानियों ने सोमवार को लाहौर में गधों का जुलूस निकाला और जूते , चप्पल और सडे हुए टमाटरों से उनकी धुनाई कर अपने गुस्से का इजहार किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोपियों के नाम पर गधों के गले में जूतों की माला भी पहनाई।प्रदर्शनकारियों ने हर गधे के सिर पर कागज चिपकाकर अपने उन सभी महान क्रिकेट खिलाडियों और अधिकारियों का नाम लिखा था, जो हाल में फिक्सिंग के दोषी है । एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि इन खिलाडियों ने देश का सिर नीचा किया है। हम बाढ और आतंकवाद के कारण पहले ही इतनी मुसीबतें झेल रहे हैं और इन खिलाडियों ने हमारी खुशी का मौका भी छीन लिया। कुछ लोगों ने एक गधे के गले में बल्ला तक फँसाकर यह दर्शाने की कोशिश की कि हमारे क्रिकेटर आज किस हाल में पहुँच गए हैं। आपको बता दूं कि विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान में इन गधों को सेक्युलर श्रेणी में रखा गया है, जबकि पाकिस्तान अपने आप को एक पाक-साफ धार्मिक देश मानता है। विभाजन के समय वहाँ इनके जीवित बचने की एक प्रमुख वजह यह मानी गई थी कि जब भी किसी उपद्रवी...

भ्रष्टों और निक्कमों का प्रिय खेल बनकर रह गया है क्रिकेट !

कविता बनाने बैठा था, मगर वक्त और आत्मउत्साह की कमी के कारण सिर्फ चार ही लाईने बन पाई ; किसने कब यह सोचा था, वक्त का ऐसा एक तकाजा होगा, अन्धेर लिये सारी नगरी होगी, अन्धों मे काना राजा होगा । महंगाई से त्रस्त होंगी प्रजा सारी, चांदी काटेंगे मंत्री, दरवारी, राग अलापेंगे सब अपना-अपना, पर सिंहासन साझा होगा॥ अन्धेर लिये सारी नगरी होगी, अन्धों मे काना राजा होगा ।...........................॥ हाँ , इस लेख के शीर्षक के मुताविक चंद बातें कहना चाहूँगा कि आज क्रिकेट का खेल एक भ्रष्टाचार की जननी बन चुका है। इस बात से अधिक उत्साहित होने की जरुरत नहीं कि आज इस खेल के गंदे हिस्से में कुछ पाकिस्तान के खिलाड़ियों के फंसने की ख़बरें है। सिर्फ इतनी सी बात नहीं है कि केवल पाकिस्तानी खिलाड़ी ही ऐसा काम कर रहे है। याद करे कि अभी आई पी एल पर यह खुले आरोप लगे है कि उसके भी सारे मैच पहले से फिक्स थे। तो क्या जो खेल फिक्स करके खेले गए तो क्या उसमे खेलने वाले खिलाड़ी पाक साफ़ थे ? इस खेल ने देश के सारे खेलों को निगल लिया है। दूसरे खेलों के खिलाड़ी जो देश के लिए खेलते है वे पाई-पाई को तरसते है और इस खेल के खिलाड़ी......? ...

अर्थ-अनर्थ !

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छवि गूगल से साभार , कार्टून को बड़े आकर में देखने के लिए कृपया उस पर क्लिक करे !

ताक बैठे है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर!

क्या कभी सोचा है तुमने इस सवाल पर, क्यों आज ये देश है अपना, अपने ही हाल पर। ढो रहा क्यों अशक्त शव अपना काँधे लिए, ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥ भ्रष्टाचार भरी आज यह सृष्ठि क्यों है, कबूतरों के भेष में बाजो की कुदृष्ठि क्यों है। 'शेर-ए-जंगल' लिखा क्यों है गदहे की खाल पर, ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥ महंगाई से निकलता दरिद्र का तेल क्यों है, राष्ट्र धन से हो रहा फिर लूट का खेल क्यों है।   शठ प्रसंन्न है आबरू वतन की उछाल कर, ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥

क्या लिखू ?

लिखने को तो बहुत कुछ था, मगर इस खिन्न मन की किन्ही गहराइयों से एक आवाज आ रही है कि लिखकर क्या करेगा ? अपना खून जलाएगा , अपने आँखों की रोशनी कमजोर करेगा, अपनी उँगलियों को कष्ट देगा, अपना बिजली का बिल बिठाएगा, अपने इन्टरनेट सर्विस प्रोवाईडर का घर भरेगा, अपने कंप्यूटर के की बोर्ड को गुस्से में जोर-जोर से उँगलियों से पीटेगा, अपने घरवालों पर खीजेगा, इससे ज्यादा है भी क्या तेरे बस का ? इसलिए रहने दे लल्लू , तेरे बस का कुछ नहीं ! लेकिन फिर मेरी अंतरात्मा की गहराइयों से कुछ विरोध के स्वर फूटने लगते है, जो चीख-चीखकर मुझसे ये कहते है कि गोदियाल, तू कबसे इतना स्वार्थी हो गया ? तू कबसे सिर्फ अपने ही बारे में सोचने लगा ? क्या यही तेरे उस तथाकथित स्वदेशप्रेम के नाटक का पटाक्षेप है, यदि हाँ, तो धिक्कार है तुझपर ! फिर तो डूब मर, कहीं चुल्लूभर पानी में ! इंतना कहने के बाद मेरी आत्मा मुझे यह कहकर धिक्कारने लगती है कि तू क्यों आया इस संसार में ? तुझे तो पैदा ही नहीं होना चाहिए था! ये शब्द मुझे इसकदर भेदते है कि मै जोर से चीख उठता हूँ, लेकिन मेरी वह चीख कोई नहीं सुनता, सिर्फ कमरे की दीवारें कांपकर रह जाती...

मर्यादा का पालन !

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राजनीति में मर्यादा का भी पालन होना चाहिए : मनमोहन सिंह एक और !! रहम करो माई बाप ! माया-ममता का पालन करते-करते तो हम सड़क पर आ गए और आप है कि.......!!!! छवि गुगुल से साभार

क्या सोचकर इस जश्न मे शरीक होवे?

जहां तक इन्सानों का सवाल है, मै समझता हू कि इस दुनिया मे भिन्न-भिन्न विचारधाराओं मे चार प्रकार का दृष्टिकोण रख्नने वाले लोग पाये जाते है, पहला आशावादी और दूसरा निराशावादी ( ये दोनो ही मिश्रित दृष्टिकोण वाले भी कहे जा सकते है ) तीसरा होता है घोर आशावादी और चौथा घोर निराशावादी। घोर आशावादी और घोर निराशावादी इन्सान आप शेयर मार्केट के उन तेजडियों और मंदडियों को कह सकते है, जो बाजार मे विपरीत परिस्थितियां होने के बावजूद भी शेयरों से इसी उम्मीद पर खेलते है कि आज मार्केट चढेगा अथवा उतरेगा। यह कतई मत सोचिये कि मै आप लोगो को लेक्चर दे रहा हू, बस यूं समझिये कि भूमिका बंधा रहा हू। मालूम नही लोग इस लेख को पढ्कर मुझे उपरोक्त मे से किस श्रेणी मे रखते है लेकिन इतना जरूर कहुंगा कि वर्तमान परिस्थितियों मे मुझे तो दूर-दूर तक अपने इस दृष्टिकोण मे बद्लाव के लिये आशा की कोई किरण नजर नही आ रही। जैसा कि आप सभी जानते है कि देश आज प्रत्यक्ष तौर पर अंग्रेजी दास्ता से मुक्ति की चौसठ्वी वर्षगाठ मना रहा है, यानि कहने को स्वराज मिले हुए त्रेसठ साल पूरे हो गये। लेकिन यहां के आम जन से मै कहुंगा कि अपने दिल पर हाथ रखक...

ब्लैकबेरी बनाम स्विस बैंक !

इसमे कोई सन्देह नही कि देश की आन्तरिक और सामरिक सुरक्षा के नज़रिये से ब्लैकबेरी सेलफोन प्रकरण अनेक देशों की सुरक्षा एजेंसियों के लिये एक संवेदनशील और चिन्ताजनक विषय बन गया है। और दुश्मन देश की गुप्तचर एजेंसिया और बुरे मंसूबे वाले आतंकवादी संगठन और लोग निश्चिततौर पर इसका गलत इस्तेमाल कर सकते है। भारत ही नही बल्कि विश्व के अनेक देशों जैसे चीन, अल्जीरिया, य़ूएई, सऊदी अरब, लेबनान और बहरीन ने भी इस बारे मे कदम उठाने शुरु कर दिये है। देश की सुरक्षा चिन्ताओं के प्रति हमारी अत्यधिक सजग सरकार ने भी त्वरित कार्यवाही करते हुए दूरसंचार प्रदाताओं और ब्लैकबेरी की निर्माता कम्पनी रिसर्च इन मोशन (रिम) को नोटिस दिया था कि अगर सुरक्षा एजेन्सियों को ब्लैकबेरी एंटरप्राइज सर्विसेज और ब्लैकबेरी मेसेंजर सर्विसेज तक पहुंच नही मुहैया कराई गई तो ३१ अगस्त तक ब्लैकबेरी की सेवायें बंद कर दी जायेंगी। मरता क्या नही करता वाली कहावत के हिसाब से शुरुआती ना-नुकुर के बाद ब्लैकबेरी ने सरकार की बात मान ली है। मानेंगे भी क्यों नही धंधा जो करना है। और देश की सुरक्षा के लिहाज से इसके उपभोक्ताओं को भी यह बात भली प्रकार से समझ आ...

मनमोहन सिंह जी की जय बोलिए क्योंकि वे भी आज २२७३ दिन के प्रधानमंत्री हो गए !

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आज जब एक दैनिक अंगरेजी अखबार की वेब-साईट पर उसकी न्यूज हेडिंग पर नजर गई तो पता चला कि मनमोहनसिंह जी इस देश के प्रधानमन्त्री की कुर्सी को लम्बे समय तक सुशोभित करने वाले तीसरे प्रधानमंत्री बन गए है ! नि:संदेह उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं किया जा सकता, मगर हर जगह इतनी अनिश्चितता के वातावरण में उस साईट का इस बात पर उत्साहित होना भी जायज ही है! उनके बारे में मेरा यह अपना आंकलन रहा है कि श्री मनमोहन सिंह जी के साथ अक्सर हर चीज "अति" वाली सीमा तक रही है! वे अति की सीमा तक साफ़ छवि वाले ऐंसे ईमानदार व्यक्ति है, जिन्हें अपने नेतृत्व के अधीन हो रहे तमाम भ्रष्टाचारों में से कोई एक भी भ्रष्ट कृत्य अथवा घोटाला नजर नहीं आता है! वे एक बड़े अर्थशास्त्री भी है ! और सुनने में आया है कि दुनिया के कई बड़े देशों के नेतावों ने कुछ समय पहले कनाडा में संपन्न अन्तराष्ट्रीय बैठक में उनकी इस बात के लिए जमकर तारीफ़ भी की कि उन्होंने तरह-तरह के टैक्स अपनी जनता पर लगाकर अन्तराष्ट्रीय मंदी का सफलतापूर्वक मुकाबला किया! अब यह पता नहीं कि उनका यह मंदी के साथ अर्थशास्त्रीय मुकाबला था, अथवा इस देश के करोड़ों लोगो ...

आस्था ही सड्क पर न आ जाये, इसका भी ध्यान रखे !

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अब जब श्रावण मास अपने अंतिम चरण मे पहुंच गया तो अब जाकर उत्तर भारत के खासकर चार राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा के बहुत से लोगो की जान मे जान आई है। हर साल की भांति इस साल भी सड्कों पर कांवड़ियों का हुजूम उमडा। पूरे श्रावण माह कांवड़िये उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धूम मचाये रहते हैं। दूर-दूर से ये हरिद्वार आते हैं, और यहां से गंगाजल लेकर इच्छित शिव मंदिर में जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। यहां तक कि ये कांवड़िये अब गंगोत्री और गौमुख तक जाने लगे हैं। इनका दायरा अब राज्य स्तर तक पहुंच रहा है। जिसके लिये सम्बद्ध राज्य सरकार और प्रशासन को एक महिने पहले से युद्ध-स्तर पर तैयारियां शुरू करनी पडती हैं। चुंकि यह करोडों हिन्दुओं की अस्था से जुडा मसला है इसलिए भावनाऒं का आदर भी नि:सन्देह जरूरी है। मगर साथ ही हमे यह भी देखना होगा कि कहीं कोई चीज अत्याधिक तो नही हो रही? भग्वान शिव के प्रति जनता के मन मे जो आदर और आस्था है, हमारे कृत्य कहीं उसे कोई चोट तो नही पहुचा रहे ? क्योंकि पिछले आठ-दस सालों से जबसे हमारे इस देश की दोयम दर्जे की राजनीति ने आस्था के इस क्षेत्र मे अपनी घुस...

ये अहसान फरामोश भिखमंगे !

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मेरा मानना है कि विपदा में फंसा हर प्राणी सबसे असहाय होता है, और हमने जहां तक इस भारत भूमि का इतिहास है, अपने पूर्वजों के मुख से, अपने पौराणिक गर्न्थों में, अपने संस्कारों में यही पाया है, यही पढ़ा है कि इंसान तो छोडिये, विपदा में फंसे प्राणी की पशु-पक्षी भी मदद करते है! किस्से-कहानियों में अक्सर जाल में फंसे शेर और चूहे की कहानी, डूबती चींटी और चिड़िया जैसी अनेकों कहानिया तो आपने भी पढी होंगी ! मानवता के नाते एक विवेकशील इंसान का यही परमधर्म होता है कि अपनी काविलियत के हिसाब से, मुसीबत में फसे जरूरतमंद की यथोचित मदद करे! यही इंसानियत का सार है,और यह भी कह लीजिये कि एक सच्चा धर्म भी यही है! और मैं यह भी खूब समझता हूँ कि शायद उससे बढ़कर और कोई बेरहम इंसान इस दुनिया में नहीं सकता , जो दो शब्द सम्वेदना और सहानुभूति के न कहकर, पीड़ितों का उपहास उडाये ! अपना एक पड़ोसी मुल्क है पाकिस्तान ! घृणा से परिपूर्ण देश (फुल ऑफ़ हेट )! कुछ हमारे मित्र जो यह कहकर कि पाकिस्तानियों को छोडिये, उनसे हमें क्या लेना, उनसे पल्ला झाड़ने की बाह्यमन से कोशिश तो करते है, मगर साथ ही यह भी जानते है कि आज भी अधिकाँश पाक...