मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी,
हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी,
हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।
बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ,
फेहरिस्त लम्बी है इस तन्हाई की,
अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' ,
राह तकते-तकते इक हरजाई की।
भले ही वो हैंगओवर मेरे लिए कुछ ही पल का था,
नशा मेरे प्यार का मगर, तीखा नहीं हल्का था,
क्या बताऊं किस कदर उस नशे मे मैं खो गया,
नशा जो पलभर के वास्ते तेरी आंखों से छलका था।
परिंदों ने घर बसाया, बच्चों संग फुर हुए,
निशानियां बसावट की मैं देख पाया था,
अपने छोटे से आशियां में उनके लिए,
जो मैंने भी इक छोटा सा नीड़ बनाया था।
रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं,
और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता,
कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं,
और कितना चल पाऊंगा, मैं हिसाब ही नहीं देता।
जज़्बात ऐसे लगने लगे हैं मानो ये जज़्बाती नहीं,
जमाने की हसरतें और आदतें हैं जो जाती नहीं,
अधजगी नीदं मे जुबां लगे है कुछ पढने को आतुर,
और मैं हूं कि उसे पढ़ने को किताब ही नहीं देता।
अनियमित नींदचर्या, स्लीपिंग डिसआर्डर कह लो,
दर्द की कोई सीमा नहीं जितना सह सको, सह लो,
डगमगाते कदम कहते हैं कि बहक जाने दो हमें भी,
मगर 'परचेत' मौका-ए-बहकना ख्वाब ही नहीं देता।
तू खुद ही से इकबार रूबरू तो हो जा,
फिर जो कहना है, उसे आलेख लेना,
अरे वो, कश्ती के मुसाफिर, उतरने से पहले,
एकबार समन्दर तो जाकर देख लेना।
मेरी डांडी-कांठियों का मुलुक ज्यैल्यू,
Go there in the spring.
हैरा बण मा बुरांश का फूल
जब बण मा आग लगाणा होला,
भीटा पाखों थैं फ्योलिं का फूल,
पिन्ग्ला रंग मा रंग्याणा होला ..
लाइयां पैयां ग्वीराल फूलु ना,
The earth will be decorated,
Go there and sing.
रातों के हर पहर-दोपहर,
जब भी मैं करवट बदलूं,
बदली हुई हर करवट पर,
कसम से आहें भरता हूं ,
उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,
कह देता कि मैं तुमपर मरता हूं ,
मत पूछो, ये नशा कौन सा करता हूं,
सच में, मैं तुम्हें बतानें से डरता हूं।
गर तुम न खरीददार होते,
यकीन मानिए,
टके-दो-टके में भला कौन बिकता?
मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी
कभी,
बस, निवेश गलत किया है तुमने,
इसीलिए घर में "धन" नहीं टिकता।
रूठ जाते हैं मुझसे मेरे अपने ही और
मुझको मनाने मे जरा भी रुचि नहीं,
दिलचस्प हों भी अगर मुहब्बत की राहें,
क्या फायदा, जब दिल मे ही शुचि नहीं?
सबब खामोशी, तेरा बहाना अच्छा है,
इश्क़ हुआ मगर इजहार न किया,
अंदाज़े मोहब्बत छुपाना अच्छा है,
शकुन बुरा ही सही, दिल जलाना अच्छा है।
कह रहा हूं मैं तुमसे,
ऐ बेस्वाद, बेसुरे भड़वे,
जुबां पे थोड़ी मीठास घोल,
मत बोल इतने भी बोल कडुए।
तू शिद्दत रख और समर्पण कर,
मत पड़ फरेब में जिस्मानी शाम की,
रूहानी एहसास खुदा की इबादत ,
लिखदे तू जाकर अपने नाम की।
न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची,
बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची,
उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत',
थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।
तेरी याद आना
गुज़रे जमाने की बात हो गई,
पानी का गिलास
सामने टेबिल पर पड़ा देखकर,
अब तो हिचकियों भी नहीं आती।
अभी नहीं, सफ़र जब खत्म होने की दहलीज पर होगा,
तभी सोचेंगे ऐ जिंदगी ! कि ज़ख्म कहां-कहां से मिले।
पर्व रंगों का है वेरंगीन बन,
बैठा हूं बातें करता खुद से,
कभी न जाने क्यों ऐसा लगे,
हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।
मदहोश-बेखबर, था तो नहीं,
दर्द का एहसास है बे-खुद से,
घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर,
अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।
मैं अभी सो रहा हूं, मर्जी के हिसाब से,
मर्जी के हिसाब से मुझे जागना है,
तुम मत रुको मेरे लिए, ऐ ज़िन्दगी,
भाग लो, जितनी तेजी से तुम्हें भागना है।
सफर मे धूप तो बहुत होगी,
सूरज को ढक सको तो चलो,
एम्बूलैंस लेकर जा रही है रोगी,
राह उसकी रोक सको तो चलो।
मोहब्बत मे, आंखों मे भर आए आंसुओं को
गिरने न देना 'परचेत',
क्योंकि प्यार के आंसू ही रूह की खुराक होते हैं।
सवाल ये नहीं है कि जवानी में हम क्यों जीने मरने की कसमें खाते हैं,
सवाल ये है कि साठ के बाद ही क्यों 'परचेत',दर्द भरे गीत पसंद आते हैं।
इश्क़ कोई पोंछा नहीं है,
सिखा गई आज काम वाली बाई,
किधर जाऊं समझ नहीं आता,
आगे कुआं है और पीछे खाई।
इस जिंदगी का फलसफा बस, इतना सा रहा 'परचेत',
मुकाम पर हम खुद को लानत-मलामत हजार देते हैं,
संदेश उसतक पहूंचा देना, ऐ तख्त पर लटकाने वालों,
चलो, कुछ यूं करते हैं अब जिंदगी, तुझको गुज़ार देते हैं।
बेवफा क्या हुआ,
कतार में खड़े हैं कुशलक्षेम पूछने वाले,
जब बावफ़ा था 'परचेत'
तो गली का कुत्ता भी नहीं पूछता था।
अपने मुहल्ले में जरा सा सोबर दीखिए
ओर संस्कृत बोलना सीखिए,
खुद ही पूरी संस्कृत मत खाइए,
थोड़ा बीवी को भी सिखाइए।
जब झगड़े का मूड़ हो तो संस्कृत में ही लड़ना,
जमकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ना,
झगड़ा कोई सुन रहा होगा, मन में न खल रहा होगा,
पड़ोसियों को लगे कि घर में हवन-पूजन चल रहा होगा।
अपने जो भी कहने को थे, सब अजनबी हुए,
और खामोशियां बन गई हमारी जीवन साथी,
क्या नहीं त्यागा था उनके लिए हमने 'परचेत',
हम-सफ़र तो थे किंतु, उनसे हम-नवाई ना थी।
अपना तन-मन लुटा के हारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी,
आगोश तुम्हारे, मेरा सुलभ लगे मन,
चाहे तन हो कितना ही भारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।
संबंधों के तौर-तरीके मैं ना जानू,
और बनावटीपन मैं ना मानू,
या फिर कह लो दुनियादारी,
अब रह नहीं सकती मैं कुंवारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।
कोमल हूं पर कमजोर नहीं हूं,
सहमी-सहमी भोर नहीं हूं,
हर पल साथ खड़े हो जब तुम,
कहके दिखाए कोई मुझे अबला नारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।
शरीक हुए थे जो कल के कवि सम्मेलन में,
वो सब के सब, एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे,
एक से बढ़के एक पैदाइशी चमचे, तलवेचाट,
बस,यही कहूंगा कि सबके सब उल्लू के पठ्ठे थे।🤣
रिश्तों की खाइयों को पाटिये कि अब और न बढ़ें,
दिलों के सहरा में नजर आ रही दरार बहुत भारी है,
अगम्य राह, सत्य का पथ इतना दुर्गम कैसे हो गया,
बाधित क्यों है आवाजाही, तहक़ीक़ात अभी जारी है।
सदचित विभ्रम है और कानून का कोई खौफ नहीं,
राष्ट्र भयभीत किया जा रहा, बिखरने की तैयारी है,
समृद्धि के पथ पर पता नहीं यह कौन सी दुश्वारी है,
संयम पांवों तले क्यों आया, तहक़ीक़ात अभी जारी है।
हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे,
मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में।
बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले,
हमने तो प्यासे को भी पानी पिलाया था, मदीने में।।
पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम,
सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी,
सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,
लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,
उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत',
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
मांग रही थी वो आज मुझसे
मेरे प्यार का हलफनामा,
मौर्निग वाक पर जाती है जो
पहनकर, रोज मेरा ही गर्म पजामा।
तुम्हारे ओठों से चिपककर सांसों के सहारे,
तुमपर ही समर्पित हो जाता,
ऐ काश कि अगर 'परचेत' !
मैं तुम्हारे सान्निध्य की कोई बांसुरी होता।
हिम्मत ही नहीं रही जब,
दिखाने को कुछ नया करके,
फायदा ही क्या है 'परचेत',
तब अफसानें बयां करके।
While landing at our courtyard,
A mysterious bumblebee
is humming,
It looks,
at our door,
a treasure trove of happiness
is coming.
मुहब्बत के खातिर तुम्हारी हर बगावत की,
हमेशा ही अगुवाई करता,
फक़त ख्वाबों में ही मुहब्बत की दुहाई दोगे
तो 'परचेत', अंजाम यही होगा।
दिलों की हसरत, मिलन की चाहत, न तो इबादत ही रंग लाई
और न ही दिल की दुआ ,
हो जाता मिलन अचानक हमारा भी किसी मोड़ पर 'परचेत,'
कभी ऐसा इत्तेफाक न हुआ।
सांझ ढले, मेरे साथ बैठकर
एक पैग व्हिस्की,
कभी वो संग-सग पीती थी,
जब न तो आभासी दुनिया थी,
और ना ही वो इस कदर ,
अलग ही दुनियां में रहकर जीती थी।
अब उसने व्हिस्की पीना छोड़ दिया है,
आजकल दिन-रात सेल-फोन पीती है।।
हौसलों के दमपर अभी तक,
जी है जिंदगी हमने,
डटकर किया है मुकाबला,
राह की दुश्वारियों का,
हर शै से निकले हैं हम,
उबरकर भी, उभरकर भी,
जरा भी न कभी बेबस हुए,
बोझ ढोते लाचारियों का।
वो लम्हा तुम जरा बताओ,
जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,
कौन सा था वो लम्हा-लम्हा
जिसमें, प्यार का रंग नहीं था?
तुम जानते हो कि मेरे होते,
सलामत है लाज तुम्हारी,
इसीलिए आज तक मैं,
तुम्हारे राज तक नहीं गया ।
मांगने की आदत जिंदगी में
मुझसे कभी पाली न गई,
मोहब्बत में इसीलिए मैं भरोंसे के
अल्फ़ाज़ तक नहीं गया ।
वो अब आ नहीं सकता फिर से,
गुज़र गया जो वक्त अपनी राहों से,
किन्तु, मुश्किल तो होगा जिंदगी तेरा
सुगमता से निकलना, मेरी पनाहों से।
घड़ी की तरह खिसकती जा रही हो,
पकड़कर रखूंगा तुझे अपनी बांहों से,
सुगम-दुर्गम, हर दौर जिया है तेरे संग,
मुझे फर्क नहीं पड़ता,साहों-सलाहों से।
वर्तमान तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना,
उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के,
बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना,
सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।
क्या बताऊं कि ये
चोंतीस साल कैसे बीते,
किस मुश्किल में
हर लम्हा गुजरा जीते-जीते,
याद तो होगा तुम्हें कि मैंने
तुमको भी न्योता दिया था,
जवानी के फोल्डर जब मैंने,
'बीवी' ऐप डाउनलोड किया था!!
हूं मैं तुम्हारा यार ऐसा ,
कविता का सार जैसा,
प्रेम से गर प्यार ना निभे,
फिर प्यार का इजहार कैसा?
थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी
यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,
बस, ग़लती यही रही हमारी कि
दुखती रग पर उंगली रख दी थी।
कडकछाप मुद्रीकृत सारे ब्लौगर-सलौगर,
यू-ट्यूब पे कमाई की धौंस वाले यूट्यूबर,
आज सबके सब मैंने पशेमान कर दिए,
दस सेंट एडसेंस से मैंने भी कमाए थे,
सारे के सारे गुगल को ही दान कर दिए।🤣
अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत,
किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी,
रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर
जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।
याद तो होगा तुमको
वो दौर-ए-जवानी,
इक दोराहे पर अचानक
हम-तुम मिले थे,
जहां सड़क तो
खाली-खाली थी मगर,
सड़क किनारे कुछ
चाहत के फूल खिले थे।
शनै:-शनै: जब हमने
कदम बढ़ाए उसतरफ,
इधर, इसतरफ
एक वीरान सा सहरा था,
उधर एक अशांत मन
जमीं पे ठहरा था,
अंततः न तो छांव ही मिल पाई,
न पानी ही,
ज़ख्म जो तुमने दिया था,
बहुत गहरा था।
पर्व लोहड़ी का था
और हम आग देखते रहे,
उद्यान राष्ट्रीय था और
हम बाघ देखते रहे।
ताक में बैठे शिकारी
हिरन-बाज देखते रहे,
हुई बात फसल कटाई की,
हम अनाज देखते रहे।
मिले न 'फूल' तो हमने
'चतुरों' से दोस्ती कर ली,
मजबूरी का नाम गांधी,
जिंदगी यूं ही बसर कर ली।
उलझकर मेरी बातें कुछ यूं,
तुम्हारी बातों में रह गई,
दिल की जो भी ख्वाहिशें थी,
जज्बातों में बह गई।
जिया उलझाने की तुम्हारी
ये हरकतें बड़ी नासाज़ लगी,
श्रुतिपुट जो सुनना न चाहते थे
वो तुम्हारी नज़रें कह गई।
शाम-ओ-सहर,
हमारे मिलने पर,
बीवियों की डपट का
जो रंग लग गया,
अब क्या बताऊं,
तुम्हें ऐ दोस्त!
कांच के गिलासों पे भी
जंग लग गया।
गैर समझा करते थे जिन्हें हम,
दिल ने उन्हें कुछ इसतरह अपनाया,
दूर भाग खड़ी हुई तन्हाई हमसे,
हम अकेले को जब मिला हमसाया ।
फिर वो हमसाया कुछ यूं हमें भाया,
तमाम जिंदगी की पलट गई काया,
जिन परछाइयों से डरते थे कभी हम,
आखिर,उन्हीं परछाइयों ने हमें अपनाया।
जब भी, जो भी जुबां पे आता है तुम्हारी, बक देते हो,
मुफ्त में जिसका भी लिखा हुआ मिल जाए पढ़ देते हो,
फुर्सत मिले तुम्हें तो सोचना, एक कमेंट के भूखें को
क्या, सही में कभी आप उसको उसका हक देते हो?
वर्ण आखिरी, वैश्य, क्षत्रिय, विप्र सभी,
सनातनी नववर्ष का जश्न मनाया कभी ?
नहीं, स्व-नवबर्ष के प्रति जब व्यवहार ऐसा,
फिर पश्चिमी नवबर्ष पर तकरार कैसा?
समझ पाओ तो समझ लेना क्षुब्ध भावनाएं,
आपको नूतनवर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। 🎂 🙏
मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी, हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।