Wednesday, May 14, 2025

वक्त की परछाइयां !


उस हवेली में भी कभी, वाशिंदों की दमक हुआ करती थी,

हर शय मुसाफ़िर वहां,हर चीज की चमक हुआ करती थी,

अतिथि,आगंतुक,अभ्यागत, हर जमवाडे का क्या कहना,

रसूखदार हवेली के मालिकों की, धमक हुआ करती थी।

वक्त की परछाइयों तले, आज सबकुछ वीरान हो गया,

चोखट वीरान,देहरी ख़ामोश,आंगन में रमक हुआ करती थी।


 

मज़ाक

 

ऐ दीवान-ए-हज़रत-ए-'ग़ालिब, 

तुम क्या नाप-जोख करोगे 
हमारी बेरोजगारी का,
अब तो हम जब कभी
कब्रिस्तान से भी होकर गुजरते हैं,
मुर्दे उठ खड़े होकर पूछते हैं, लगी कहीं?

Monday, August 19, 2024

प्रश्न -चिन्ह ?

 पता नहीं,कब-कहां गुम हो  गया

 जिंदगी का फ़लसफ़ा,

न तो हम बावफ़ा ही बन पाए 

और ना ही बेवफ़ा।

Friday, May 17, 2024

संशय!

इतना तो न बहक पप्पू , 

बहरे ख़फ़ीफ़ की बहर बनकर,

४ जून कहीं बरपा न दें तुझपे, 

नादानियां तेरी, कहर  बनकर।

वक्त आ गया है !

वतन-ए-हिंद से लग्न लगानी है तो,

वक्ष पे 'राम' लगाना होगा।

'धर्म-निरपेक्षता' की कपट प्रवृत्ति को

अब 'वीराम' लगाना होगा ।।

Wednesday, May 15, 2024

शून्य प्रत्यय !









शहर में किराए का घर खोजता 

दर-ब-दर इंसान हैं 

और उधर,

बीच 'अंचल' की खुबसूरतियों में

कतार से, 

हवेलियां वीरान हैं।

'बेचारे' कहूं या फिर 'हालात के मारे',

पास इनके न अर्श रहा न फर्श है,

नवीनता का आकर्षण ही

रह गया जीने का उत्कर्ष है, 

इधर तन नादान हैं 

और उधर,

दिलों के अरमान हैं।

बीच 'अंचल' की खुबसूरतियों में

कतार से, 

हवेलियां वीरान हैं।।

Wednesday, February 28, 2024

सहज-अनुभूति!

निमंत्रण पर अवश्य आओगे,

दिल ने कहीं पाला ये ख्वाब था,

वंशानुगत न आए तो क्या हुआ,

चिर-परिचितों का सैलाब था।

है निन्यानबे के फेर मे चेतना, 

किंतु अलंकृत सभी अचेत हैं,

रही बात हमारी नागवारी की,

तभी तो हम 'परचेत' हैं।



Saturday, February 24, 2024

यकीं !

 तु ये यकीं रख, उस दिन 

सब कुछ ठीक हो जायेगा,

जिस दिन, जिंदगी का 

परीक्षा-पत्र 'लीक' हो जायेगा।

Friday, February 23, 2024

द्वंद्व !

 











निरुपम अनंत यह संसार इतना, क्या लिखूं,

ऐतबार हुआ है तार-तार इतना, क्या लिखूं ।


सर पर इनायतों का दस्तार इतना, क्या लिखूं 

है मुझपर आपका उपकार इतना, क्या लिखूं ।


और न सह पायेगा मन भार इतना, क्या लिखूं,

दिल व्यक्त करे तेरा आभार इतना, क्या लिखूं। 


सरेआम डाका व्यवहार पर इतना, क्या लिखूं,

दिनचर्या में लाजमी आधार इतना, क्या लिखूं।


इस दमघोटू परिवेश में भी दम ले रहा 'परचेत',        

है इस ग़ज़ल का दुरुह सार इतना, क्या लिखूं ।

Thursday, October 26, 2023

भैंस, भैंस की बात ठहरी।

ना ही अभिमान करती, ना स्व:गुणगान गाती,

ना ही कोई घोटाला करती, न हराम का खाती,

स्वाभिमानी है, खुदगर्ज है, खुल्ले में न नहाती,

इसीलिए हमारी भैंस, कभी पानी में नहीं जाती।

Wednesday, August 23, 2023

ऐतिहासिक उपलब्धि।



कोटि-कोटि हम सबका नमन तुमको,

आज,बढ़ा दिया है देश का मान तूने।

पहुंचा के विक्रम को 'चंद्र-दक्षिण ध्रुव',

ऐ हमारे 'इसरो' के प्यारे, 'चंद्रयान' तूने।।🙏🙏

Tuesday, January 10, 2023

जोशीमठ आपदा

धसगी जोशीमठ, हे खाली करा झठ,

भागा सरपट, हे धसगी जोशीमठ।

नी रै अपणु वू, ज्यूंरा कु ह्वैगि घौर,

नी खोण ज्यू-जान, तै कूड़ा का भौर,

जिंदगी का खातिर, छोडिद्यावा हठ,

भागा सरपट, हे धसगी जोशीमठ।


Saturday, December 31, 2022

नूतन वर्ष मे....

उठे जो भी कदम, वो दमदार नजर आए,

आपका हर फैसला समझदार नजर आए,

गुजरी है दुनिया, विगत मे अंधेरी राहों से,

नये साल मे हर राह, चमकदार नजर आए।

🍾🌷🥂🌻

                   शुभ-प्रभात🙏

इन्ही आंकाक्षाओं, उम्मीदो और अभिलाषाओं

के साथ आपको, आपके सभी पारिवारिक जनों

और ईष्ट-मित्रों को मेरी और मेरे परिवार की तरफ

से नूतनवर्ष 2023 की मंगल कामनाएं।🙏


Sunday, December 4, 2022

लघुकथा- क्षीण संप्रत्यय !

अकेली महिला और उसके साथ उसके दो नाबालिग बेटे, अरुण और वरुण। मेरे मुहल्ले मे मेरे घर से कुछ ही दूरी पर एक तीन मंजिला बडे से मकान के एक छोटे से खण्ड, जिसे आज की किरायाखोरों की तथाकथित सभ्य दुनिया मे "आरके RK" (रूम अटैज्ड किचन) के नाम से जाना जाता है, मे अभी कुछ दिन पहले ही किराए पर रहने आई  थी।

कल रविवार था। शाम के पांच बजे के आसपास एक काली चमचमाती हुई एसयूवी, गली के नुक्कड़ पर ठीक उसी घर के नीचे जाकर रुकी थी जहां उसमें से उतरकर एक सलीकेदार वस्त्रधारण किये हुए, एक भद्र अधेड पुरुष उस मकान की मालकिन से अभी हाल मे उस जगह किराए के कमरे पर शिफ्ट हुई उस महिला का पता पूछते हूए उसके उस "आरके" के दरवाजे पर पंहुचा था और उसने दरवाजा खटखटाया था। बारह बर्षीय वरुण ने दरवाजा खोला तो बाहर खडे उस अधेड़ ने उससे पूछा, बेटा मम्मी हैं घर पर ? उस बालक ने सकारात्मकता मे अपनी मुंडी हिलाई और अंदर की तरफ मुडते हुए जबतक वह अपनी मम्मी से कुछ कह पाता, उसकी मां उन अधेड़ की आवाज को पहचान गई थी, अतः वह तुरंत बोली, बेटा डाक्टर साब को अंदर ले आओ।

 भद्र अधेड़ के उस 'आरके' के अंदर घुसने के बाद मकानमालकिन और अगल-बगल के किराएदारों के कान खडे हो गये थे। उस तथाकथित "आरके" की सुराखों के  रास्ते दरवाजे और दीवारों पर कान लगाए हुए वे शक्की किस्म के तथाकथित अति जागरूक लोग अंदर से बाहर गैलरी मे आ रही आवाजों को सुन रहे थे।  मां, अपने दोनों नाबालिग बेटों  से सिसकयां भरते हुए कह रही थी, "बेटों, तुम दोनों के पैदा होते ही तुम्हारे पापा हमें मझधार मे छोड़कर कहीं और चले गये और उसके उपरांत मैने तुम दोनों को एक-दूसरे से अलग करने के लिए क्या-क्या कोशिशें नहीं की? मगर सब बेकार।

इतना सुनते ही बाहर गैलरी मे उस महिला के 'आरके' से कान सटाये हुए पडोसियों मे आपस मे खुसर-पुसर शुरू हो गई। कोई कहता,  कैंसी मां है, अपने ही बेटों को एक-दूसरे से अगल करने पर आमादा है । कोई कहता बडी ही जालिम औरत है, तो कोई आंहें भरकर मिमियाता, "वाह रे कलयुग!"

कुछ पल उपरांत अंदर से फिर उस महिला की एक सिसकी भरी करुणामय आवाज आई, बेटों, ये डाक्टर सहाब हमारे भगवान हैं क्योंकि इन्होंने ही सिर से जुड़े पैदा हुए तुम दोनों भाइयों की नि:शुल्क सर्जरी कर तुम दोनों को स्वतंत्र जिंदगी जीने का हक दिया। ये हमारे वास्तविक भगवान हैं, इनके चरण छुओ जो ये आज अपने कीमत वक्त को नजरअंदाज कर फरिश्ते की तरह तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें आशिर्वाद देने, यहां हमारे घर पहुंच गये।

जैसे ही उस वास्तविकता से पर्दा हटा, वहां बाहर खडी मकानमालकिन और उसके सभी किराएदार गैलरी से गायब हो चुके थे।


Tuesday, October 25, 2022

मेरी अभिलाषा दिवाली पर लक्ष्मी जी के समक्ष प्रस्तुत..

 हे माते 🙏,

इस दिवाली थोडा सा

अपुन को भी "Gift" कर दे,

आप तारणहार हो,

अपने इस भक्त का 'Stock' भी,

थोडा सा "Uplift" कर दे।

क्योंकि ये "Beggar" वर्षो से

शेयर के "Multibagger"

बनने की आश मे,

भावनाओं मे बह गया है,

तमाम बोझ तले दबकर

"Stagger" बनकर रह गया है।


Wednesday, October 12, 2022

गूढ



नेपथ्य आपका कुठौर,अलहडपन हमारा ठौर था,

आज जो येह जमाना है, कल समय कुछ और था,

इतराओ बुलंदियों पे अपनी, मगर ये भी मत भूलो !

अभी वक्त है आपका तो कभी हमारा भी दौर था।




Sunday, October 2, 2022

भौंचक!

 कभी सोचा नहीं था ऐसा कि जो,

अति सक्रिय थे समाज मे कलतक,

जरूरत आने पर, आज छुपे हुए होंगे,

कबुतर का चेहरा ओढे घर खलिहानों मे,

अहिंसा के दुश्मन, बाज छुपे हुए होंगे।

Sunday, September 25, 2022

पता, क्या पता..?

इस मानसून की विदाई पर, 

जो कुछ मौसमी प्रेम बीज तू ,

मेरे दिल के दरीचे मे बोएगी,

यूं तो खास मालूम नहीं , मगर

यदि वो अंकुरित न हुए तो 

इतना पता है कि तू बिजली बुझाकर, 

अ़ंधेरे मे  फूट-फूट के रोएगी।

#बरसातीप्यार  😀😀



Friday, September 23, 2022

विडम्बना कहूँ ?



कुछ प्यार के इजहार मे हैं 

कुछ पाने के इंतजार मे हैं,

फर्क बस इतना है,ऐ दोस्त!

कि तुम इस दयार मे हो, 

और हम उस दयार मे हैं।


मुहब्बत मे डूबे हुए को,

बीमार कहती है ये दुनिया, 

कुछ स्वस्थ होकर जहां से गये, 

कुछ अभी उपचार मैं हैं।


इस जद्दोजहद मे शिरकत

सिर्फ़, तुम्हारी ही नहीं है, 

मंजिल पाने को सिद्दत से,

हम भी कतार मे हैं।


हमें नसीब हुआ ही कब था,

वक्त गैरों से विरक्त होने का?

एहसानों के सारे बोझ,

बस, यूं कहें कि उलार मे हैं।


बेरहमी से ठुकराई गई,जबकि 

सच्ची थी उलफ़त हमारी ,

और नफरतों के सौदागर,

अब उनके दुलार मे हैं।


ऐसे अनगिनत महानुभावों से, 

हम खुद भी रुबरु हुए जिन्होंने,

पहले  सिर्फ़ अपना भला किया,

और अब शामिल परोपकार मे हैं।



Saturday, September 3, 2022

उम्मीद..

'उसूल' तो कुछ थे ही नहीं,

जिनके दूर हो जाने का डर सताता,

सिर्फ़, मेरे ख्वाबों का अनुसरण ही, 

बता सकता है, मुझे रास्ता।

Wednesday, August 31, 2022

टसन

 वो गर्दिशों के साये जो

सफर-ए-जिंदगी ने पाये,

सिकवा करें भी तो अब

बेफिजूल करें काहे,

सिर्फ़ इतनी सी अपनी 

नाकामयाबी थी हाये, 

जवानी मे ही अपना 

जनाजा न उठा पाये....

Thursday, August 25, 2022

टीस....







अक्सर , गम़ सदा ही मुखर रहे, 

खुशियों के राज मे,

फिर सिमट गये ख्वाब सारे,

उम्र की दराज़ मे।

Saturday, August 20, 2022

बादल फटे पहाड पर...

 

पहाड़ों की खुशनुमा, 

घुमावदार सडक किनारे,

ख्वाब,ख्वाहिश व लग्न का 

मसाला मिलाकर,

'तमन्ना' राजमिस्त्री व 'मुस्कान' 

मजदूरों के सहयोग से, 

उसने वो जो घर बनाया था कभी,

सुना है कि आज, उस घर पर इंद्रदेव 

इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने 

बादलों से जाकर कहा कि फटो 

और उस मकां को बहाकर

 मेरे पास ले आओ।

Thursday, March 31, 2022

मिथ्या

सनक किस बात की, 

जुनून किस बात का?

पछतावे की गुंजाइश न हो, 

शुकून किस बात का?







Monday, March 28, 2022

वहम

न हम 'हम' मे रहे

न 'अहम' मे,

जिंदगी कट गई

इसी 'वहम' मे ।

Thursday, November 25, 2021

मेरा देश महान....


जहां, छप्पन इंच के सीने वाला भी

यू-टर्न  ले लेता है,

वहां, 'मार्क माय वर्ड्स' कहने वाला पप्पू, 

भविष्यवेता है।

समय की कसौटी...

 


Friday, November 19, 2021

'डेमोक्रेजी'

 कृषि सुधार 'व्हिस्की के पैग' का

तुम्ही बताओ सुरूर क्या था? 

वो 'साला' कानून अगर,

जितना बताया, 

उतना  ही काला था तो लाना जुरूर क्या था?

सालभर आते-जाते, दिल्ली की सीमाओं पर 

जिन्होंने दुर्गति झेली,

ऐ हुजूर, लगे हाथ यह भी बता देते, 

उनका कुसूर क्या था?

#आज जार्ज बरनार्ड शा फिर सही साबित हुए।



Wednesday, November 17, 2021

गूढ़ सत्य






अपने तमाम एहसास हमने, 

कुछ यूं लफ्जो़ मे पिरोए हैं,

तुम साथ तो चेहरे पे मुस्कुराहट बिखेरी,

और अकेले मे रोए हैं।




Tuesday, November 16, 2021

खोट

रूप कुरूप नजर जो आये,

अयथार्थ दिशा मे दर्पण देखो, 

तृप्ति हेतु करो जो अर्पण,

उस अर्पण का तर्पण देखो।


क्या बदला है गत बर्षों मे,

नजर न आए, कण-कण देखो,

दृष्टि का यह दोष है कह लो,

सृष्टि बदलती क्षण-क्षण देखो।


पतित प्राण असंख्य जगत मे,

जम्हूरियत का वरण देखो,

बडबोली हो रही दुःशीलता,

आचरण का हरण देखो।


मोल इसकदर डोल रहा क्यों,

सनातन अपना प्रण देखो,

तन-मन और कसैला मत कर,

मन-मंदिर का जनगण देखो।


सुख की इच्छा दुःख का कारण,

माया बडी विलक्षण देखो,

शीश झुकाया दर पर किसके,

मन का व्यग्र समर्पण देखो।


Saturday, November 13, 2021

शहर मेरा धुआं-धुआं सा है..

 









सहरा मे पसरा हुआ कुहासा है,

और शहर मेरा धुआं-धुआं सा है।

कोई कहे ये 'दिवाली' का रोष है,

कोई  दे रहा 'पराली' को दोष है,

मुफ्त़जीवी, मुरीद हैं गिरगिटों के,

विज्ञापनों से खाली हुआ कोष है।

नेत्र पट्टी क्षुब्ध, तराजू रुआंसा है,

और शहर मेरा धुआं-धुआं सा है।


सभ्य समाज के माथे पर दाग है,

जमुना मे बहता नीर नहीं झाग है,

महामारी से ठंडे पडे है कई चूल्हें,

असहज सीनो मे धधकती आग है।

सोचकर खुश है 'आत्ममुग्धबौना',

नर,खर,गदर्भ, सभी को फा़ंसा है,

और शहर मेरा धुआं-धुआं सा है।



Friday, November 5, 2021

शुभ दीपावली










'दीपोत्सव"

मुल्क़ मे हाकिमों के हुक्मों की गहमा़गहमी़ है।

'दीया' खामोश है और रोशनी सहमी़-सहमी़ है।

डर है, दम घुटकर न मर जाएं, कुछ 'मीं-लार्ड्स',

'भाग' से ज्यादा जीने की, कैंसी गलतफहमी़ है?


Thursday, October 14, 2021

फ़कत़ जिंदा-दिली..

है कहीं अमीरी का गूम़ां

तो कहीं गरीबी का तूफ़ां,

ये आ़बोहवा, मेरे शहऱ की,

कुछ गरम है, कुछ नरम है।


कहीं तरुणाई का योवनवदन

छलकते जाम, हाथों मे रम है,

कहीं उ़म्रदराज़  हुई जो काया,

मुख़ पे झलकता बुढापे का गम है।


है कहीं पर तो फुरसत ही फुरसत

तो पास किसी के वक्त बहुत कम है,

फ़लसफ़ा जिन्दगी का अज़ब 'परचेत',

यथार्थ गायब, बस भरम ही भरम है।





Monday, April 26, 2021

दौर

खौ़फजदा है दुनिया

कोरोना के नाम से,

गुजर रही है जिंदगी

कुछ ऐसे मुकाम से ।

प्यार मे गले मिलना

गुजरी सदी की बात है,

दूर हो जाते हैं अजीज भी,

जरा से जुकाम से।।

Sunday, March 14, 2021

फुलदेई..












जनि प्यारी बेट्ळौंन तख 'फूलदेई'

सुबेरी-सुबेर कै तेरी देळी मा,

वनि, 'फुलदेई' की खबर पौंछी

यख टीवी परै, मेरी 'देहळी' मा।


फूल मेट्या, फूल जनि बेट्ळौंन

सग्वाडि, पुंग्डी, बौण बिटीकी,

नांगि खुट्यौंन, सुबेरी-सुबेर,

चसा पाळा, ह्यूं  मा हिटीकी।


जसिलो ब़िंसरी घाम पौंछी,

डा़ंंडी, पांखी, गद्वारी, भेळी मा,

वनि, 'फुलदेई' की खबर पौंछी

यख टीवी परै, मेरी 'देहळी' मा।

Monday, March 8, 2021

खलिश..

जब वो,

दर्द-ऐ-दिल अपना, 

शब्दों मे न समेट पाया

तो कमबख़्त,

आंसू बनके

उसकी आँखों से छलक आया।

Sunday, March 7, 2021

जम़ाना...

 


जिसदिन से तरसीम ऊपर गया

मिरी शख़्सियत और हैसियत का,

ख़्याल सताने लगा है जमाने को, 

मिरी खै़रियत और  कैफि़यत का।



तरसीम/तर्सीम= लेखाचित्र(graph)



Wednesday, March 3, 2021

ऐ जिंदगी...

ऐ जिंदगी,

तू मेरे घर मत आना...

अकेला ही रहता हूँ,

हर गम अकेले ही सहता हूँ,

दिनभर दौड-धूप का मारा, 

दुनियांं से थका हारा,

साफ-सफाई का मोहताज.....

पसंद नहीं आएगा तुझको,

ये मेरा कबाड़खाना।

ऐ जिंदगी,

तू मेरे घर मत आना...


यही काफी है मेरे लिए

कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ,

हर गम-ओ-खुशी

तेरे दरमियाँ से गुजरता हूँ,

मगर रूठे जो तू कभी...

तो फिर मनाने को ,

दे न पाऊंगा तुझको

मैं दिल का कोई नज़राना ।

ऐ जिंदगी,

तू मेरे घर मत आना...



Sunday, February 21, 2021

तलब

 बयां हरबात दिल की मैं,सरे बाजार करता हूँ, 

मेरी नादानियां कह लो,जो मैं हरबार करता हूँ।

हुआ अनुरक्त जबसेे मैं,तेरी हाला का,ऐ साकी,
तलब-ऐ-शाम ढलने का,मैं इन्त्तिजार करता हूँ।


नहीं अच्छा हद से कुछ,कहते लोग हैं मुुुझसे,
मगर तेरे इस़रार पर,मैंं हर हद पार करता हूँ।


खुद पीने में नहीं वो दम,जो है तेरे पिलाने में,
सरूरे-शब तेरी निगाहों में,मैं इक़रार करता हूँ।


ईशाद तेेरा कुछ ऐसा,मुमकिन नहीं कि ठुकरा दूँ,

जाम-ऐ-शराब-ऐ-मोहब्बत,मैं कब इंकार करता हूँ।

कहे'परचेत',ऐ साकी,है कहने को न कुछ बाकी,
कुछ तो बात है तुझमे,तेरी मधु से प्यार करता हूँ।

Sunday, February 14, 2021

बुजदिलों,अपना कायरकृत्य 'पुलवामा' देखो...










खुद  की हिंसावादी सोच का  कारनामा देखो,

बुजदिलों,  कायराना  कृत्य 'पुलवामा' देखो।


छल कर के जिन वीरों को, तुमने सीना ठोका,

हमारे उन वीरों की शहादत का पंचनामा देखो।


बुझा दिये तुमनें घर, देहलीज़ के चराग जिनके

उम्रदराज़ उन मांं-बाप ने कैसे है दिल थामा देखो।


पलभर मे खत्म हो गई खुशहाल दुनियां जिनकी,

इंतजार मे गुमशुम बैठी शहीदों की वो वामा देखो।


पाखंड तुम्हारे सब पराजित होगे, ऐ क्षद्म-वेशियो,

अपना वह विद्वंशी,दुष्कुलीनजनक ओसामा देखो।


है भूल तुम्हारी,कमजोर समझना सहिष्णुता 'परचेत',

मित्रता सीखो द्वेष प्रेमियों, हमारे कृष्ण-सुदामा देखो।






Friday, February 12, 2021

असमंजस

प्रश्न विकट है, समय निकट है,

देह-ईमान किधर दफना़ऊ? 

चहूंओर, गिद्ध हैं, गीदड़ हैं। 

डाल-डाल से, ताल-ताल से,

हैं नज़र गढा़ए निष्ठा-भक्षी, 

शठ,लुच्चे-लफंगे, लीचड़ हैं। 

गजब येह भंवरधारा,'परचेत',

कुटिल, कपटमय कीचड़ हैं,

पतितता के आकंठ मे डूबे, 

जहां भ्रष्टाचार के बीहड़ हैं।।

Sunday, February 7, 2021

प्रकृति



तवाही का मंजर-ए-खौफ़, ऐ मानव, 

तू अपने दिल मे पाले रखना,

क्षंणभंगूर सी है यह जिंदगी,

 कुदरत की ये तस्वीरे संभाले रखना।

एकाकीपन का सबब..

मत पूछ मुझसे, इस ढलती हुई उम्र के 

मेरे एकाकीपन का सबब, ऐ जिन्दगी !

बस, यूं समझ कि यह सब तेरे कर्ज की 

अगली किश्त अदाइगी़ की जद्दोजहद है।

Saturday, February 6, 2021

एक सम्बोद्धन, मिया खलीफा के सगे भाइयों को...









निर्लज़्ज़ता व दम्भ़ भरी फि़जा़ देख,

कुछ यूं सा अहसास हुआ 'परचेत',

गद्दारी,अपने ही लहू मे छिपी रही होगी

वरना, किसी को  तीन-तीन गुलामियां 

इत्थेफाक़न ही नसीब नहीं हुआ करती ।

Tuesday, February 2, 2021

सच का सामना।











ये वह बांंध है, जो  

गढ-हिमालय के टिहरी मे

पवित्र भागीरथी की लहरों पे लेटे है,

यौवन के अपने इस 

बुलंद शिखर पर,

स्व:वदन, दिव्य छटा लपेटे है,

ऐ जहां वाले, 

भागीरथी के इस द्वारपाल  को

कभी उम्रदराज न होने देना

क्योंकि, वह अपने अंदर उफनते 

समन्दर की सी, गहराइयां समेटे है।



Sunday, January 31, 2021

प्रश्न

फिरकापरस्ती एंव सियासी चाल के

जहां असंख्य मुरीद हों ऐसे,

गणतंत्र किसान ट्रैक्टर परेड की आढ मे

लालकिले के दीद हों ऐसे,

फिर तो सोचते ही रहो 'परचेत' कि

देश-हित के फैसले मुफी़द हों कैसे।

Tuesday, January 26, 2021

गणतंत्रपर्व का हर्ष और विसाथद..

वैरियों से जुडे हों जिनके तार ऐसे,

कृषक भेष मे लुंठक, बटमार ऐसे,

कापुरुष किसान परेड की आड मे,

कर रहे है, देश-छवि शर्मशार ऐसे।


इधर ये, वीरों के शौर्य को सलाम करके 

लोग करते गणतंत्र पर्व को साकार ऐसे ,

उधर वो, लालकिले को  रौंदने मे लगे हैं,

कुछ फसादी, तुच्छ-स्वार्थी मक्कार ऐसे।


नेताओं की महत्वाकांक्षा ने कर रखा

सम्पूर्ण व्यवस्था के तंत्र को लाचार ऐसे,

कापुरुष किसान परेड की आड मे,

कर रहे है, वतन-छवि शर्मशार ऐसे।


सभी ब्लॉग मित्रों  को  गणतंत्र दिवस की 

हार्दिक शुभकामनाएं।🙏










Friday, January 22, 2021

आग्रह..

वक्त की कीमत, हमेंं 

मत समझा ऐ दोस्त, 

समय अपना व्यतीत के,

हमारा तो पीछा ही 

नहीं छोडते ये कमबख़्त, 

कुछ पछतावे अतीत के।


Thursday, January 21, 2021

टीस..

बीच तुम्हारे-हमारे ये रिश्ते, 

यूं न इसतरह नासाज़ होते, 

फक़त,इसकदर दूरियों मे 

सिमटे हुए न हम आज़ होते,

तुम्हारी सौगंध, हम 

हर लम्हे को बाहों मे समेटे रखते,

थोडा जो अगर तुम्हारे,

मर्यादा मे रखे अलफाज़ होते।

Wednesday, January 20, 2021

जिह्व-स्वाद।

 ना ही कोई बंदिश, ना ही कोई परहेज़,

 मैं अपने ही उदर पर कहर ढाता रहा।

 लजीज़ हरइक पकवान वो परोस्ते गये

और स्वाद का शौकीन, मैं खाता  रहा।।

Tuesday, January 19, 2021

विचलन..

टलोलता ही फिर रहा हूँ उम्र को, 

तभी से मैं हर इक दराज़ मे,

जबसे, कुछ अजीज ये कह गये कि

'परचेत' तू अब, उम्रदराज़ हो गया।


Sunday, January 17, 2021

तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ..







अजीब सी पशोपेश मे हूँ, 

मैं इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ?

इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, 

तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ।


हो क़दरदान तुम बहुत, 

गुल़रुखों के नगमा-ए-साज के,

तारों भरी रात, 

नयनोँ मे बरसात, 

धुन कौन सी बजाऊँ?

अजीब सी पशोपेश मे हूँ, 

मैं इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ?

इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, 

तुम सुनो तो  मैं सुनाऊँ।।


अजीबोग़रीब अफ़साने हैं, 

इस मुक्त़सर सी जिंदगी के,

लबों पे कबतक लिए फिरूँ, 

क्यों न कागज़ पर उतर जाऊँ?

अजीब सी पशोपेश मे हूँ, 

इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ?

इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, 

तुम सुनो तो  मैं सुनाऊँ।।


थे अबतक हम भी खामोश

तेरी खामोशी को देखकर,

हमें महफिलों की शान नहीं बनना,

सिर्फ़ बात तुम्हें दिल की बता पाऊँ।

अजीब सी पशोपेश मे हूँ, 

इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ?

इक गजल लिखी है मैंने तुमपर, 

तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ।।



Thursday, January 14, 2021

नश्तर..

उधर सामने खडे थे संस्कार,

बनकर के मेरे पहरेदार,

संकुचायी सी मैं कुछ बोली नहीं,

तुम हरगिज़ इसे गलत मत समझना,

इत्तेफ़ाक़न, मैं इतनी भी भोली नहीं।


तुम्हारे जैसे बहुतेरे मिले हमको,

जिंदगी की राह मे मन डुलाने वाले,

किन्तु, फिर भी कभी मैं डोली नहीं,

तुम हरगिज़ इसे गलत मत समझना,

इत्तेफ़ाक़न, मैं इतनी भी भोली नहीं।


शक्ल से भले ही कोई बांके लगे हो,

बेकार है, बांकी जो अगर उसकी,  

अपनी  खुद की भाषा-बोली नहीं,

तुम हरगिज़ इसे गलत मत समझना,

इत्तेफ़ाक़न, मैं इतनी भी भोली नहीं।


अरे वो तमाम पैमानों के पैरवीकारो,

नापने से कद कभी बढता नहीं, गर

मनसाही जो कभी अपनी तोली नहीं,

तुम हरगिज़ इसे गलत मत समझना,

इत्तेफ़ाक़न, मैं इतनी भी भोली नहीं।


Sunday, January 10, 2021

बिम्बसार

तुम न कभी अश्क बहाना, ऐ दोस्त,

क्यूंकि तुम बे'गम' हो,

ये तुम्हारा धुर्त 'शो'हर तो,

यूं ही, मजे लेने के खातिर रो लेता  हैं।

खलिश..

मंजिल के करीब पहुंचने ही वाली थी

जब यह सफ़र-ए-जिन्दगी, ऐ दोस्त!

तुमने नींद मे खलल डालकर, 

स्वप्न विच्छेदन कर दिया

Thursday, January 7, 2021

अन्तरद्वंद







यारअब बता भी दो, 

छुपा रही हो जो हमसे, 

अपना वो दर्द जौन सा ।

कुछ तो बात होगी वरना, 

ये नजरें तुम्हारी  हमको,

यूं 'कातर ' न नजर आती।।


Tuesday, January 5, 2021

अजनबी तपन..

 दिल मे ही अटक गई , वो छोटी सी ख़लिश हूँ,

यकीनन, न तो मैं राघव हूँ और ना ही तपिश हूँ।

मुद्दत से,अकेला हूँ दूर बहुत, करीबियों से अपने,

मगर न जाने क्यों ऐ 'परचेत', इसी मे मैं खुश हूँ।

Sunday, January 3, 2021

उम्मीद कायम है...

 








उम्मीदों से भरा ये मिज़ाज अच्छा है, 

जश्न मनाने का ये रिवाज़ अच्छा है,

आगे चलके गुल जो भी खिलाये मगर,

 इस नये साल का आगाज़ अच्छा है।

Friday, January 1, 2021

Ambition


 











As cliché as 

this might sound, 

it is really true,

what goes around 

comes around.  

So, it would be 

appropriate always

that the flight of 

our wishes

should always match 

the reality of the ground .








Thursday, December 31, 2020

ऐ गुजरने वाले साल...।












ऐ गुजरने वाले साल, तेरे रहते मैंने,

'गुड' की जगह, 'बैड' फ्राइडे देखा,

बारहमास, कोई पर्व मनाया न गया,

किसी भी शहर न कोई 'हाईडे' देखा,

किसकदर भारी हो सकता है बुरा वक्त,

एक-दो नही,पूरे पैंतालीस 'ड्राइडे' देखा।😀



सभी स्नेही मित्रों को नूतनबर्ष 2021 की मंगलमय कामनाएं।🙏

Tuesday, December 29, 2020

कटु सत्य।

लगे हैं जो मेरे शब्द तुमको अप्रिय, 

निकले न मेरे मुंह से होते,

ऐ प्रिये, जबरन जो मेरे मुंह मे 

अपने शब्द, तुमने न ठूंसे होते।

Sunday, December 27, 2020

ऐ साल 2020 !

 











असहज छटपटाहट, 

नकाबी हितस्वार्थ, 

अहंवादी हठता और 

प्रतिद्वंद्विता की शठता, 

शाश्वत चीखती रह गई

कुछ सर्द सी आजमाइशें।

है फैला चहुंओर, 

इक तिजा़रती शोर,

बेचैन दिल के अंतस मे ही

कहींं दफ्ऩ होकर के रह गई ,

कुछ कुत्ती सी ख्वाहिशें।


दिल मे बची है तो बस,
लॉकडाउन की खलिश
और राहबंदी की टीस,
तूने छाप ऐसी छोडी
तु याद रहेगा सदा,
अलविदा,
ऐ साल, दो हजार बीस।

Tuesday, December 15, 2020

तार्किक..

ब़ंद कबूतरखाने से जब, इक तोता निकला तो

सब के सब ने एक स्वर कहा, ये कैसे, ये कैंसे ?

एक ज्ञानी सज्जन, जो समीप ही खडे थे बोले,

राजशाही अस्तबल से, इक खोता निकला जैसे।

Sunday, December 13, 2020

वादा रहा..

 व्यग्र,व्याकुल इस जिंदगी को, 

मिल जाएगा निसाब जिस दिन,

ऐ मेरी अतृप्त ख्वाहिशों, 

कर दूंगा तुम्हारा भी हिसाब उस दिन।

Monday, December 7, 2020

अतृप्त मन...

इन आवारा चक्षुओं ने,

छुप-छुप के ताकी हैं,

मेरी, वो ख्वाहिश,

जो अभी भी बाकी हैं।

दिल की हर तमन्ना

सिर्फ,नशेमन ने हाकी है,

गोया, अतृप्त हैं ख्वाहिश,

जो अभी भी बाकी हैं।


xxxxxxx


तेरी हर परेशानी, रंज और ग़म 

बेहिचक वो मुझको दे दे, 

उससे हरव़क्त यही गुजा़रिश करता हूंं ,

ऐ दोस्त, मुझे जब भी कभी ,

देव-दर्शन होते हैं , सिर्फ़  और सिर्फ़,

तेरी खुश़हाल जिंदगी की शिफारिश़ करता हूँ।





Sunday, December 6, 2020

साल एक और गुजरा....






हैं चहुं ओर चर्चा मे अदाएँ,

कोरोना दिखा रहा मुजरा,

उधर, बंद खौफज़दा जिंदगी,

इधर, साल एक और गुजरा।


कभी थोक मे बढी मुश्किलें,

कभी जीवन हुआ खुदरा,

कुछ तो सफर ही मे गुजरे,

जीना हुआ दुभर, दुभरा।


बेताब है, आगोश मे आने को,

है जब से ये नया दुश्मन उभरा,

आसपास ही छुपा बैठा है कहीं,

ऐ नादांं, सम्भल के रह तू जरा।


टूटी कई ख्वाहिशे, बिखरे सपने,

है सहमी-सहमी लगती यूं धरा,

उधर, बंद खौफज़दा जिंदगी,

इधर, साल एक और गुजरा।




Tuesday, November 24, 2020

रूबरू बोतल..

औकात मे रह, वरना

मैं तुझे फोड डालूंगा...

सच्ची कह रहा हूँ...

दूर रह मुझसे, वरना... 

मैं तुझे तोड डालूंगा।


माना कि तुझे मैंने खूब,

पिया भी व पिलाया भी,

हम बीच रिश्ते को वजन

दिया भी और दिलाया भी,

किंतु, प्रकट न हो,

यूं तकलीफ़ियों सी भी,

क्योंकि, हद होती है 

नजदीकियों की भी।


ख्वाहिश बनके रोज, 

बुलाया न कर मयखाने,

कोई, बीच तेरे-मेरे, 

इस रिश्ते को न जाने।


समझ ले, कांच की है,

पत्थर से न टकराना,वरना

पत्थर से  ही तोड़ डालूंगा,

दूर रह मुझसे, वरना... 

मैं तुझे फोड डालूंगा।।


Monday, November 23, 2020

लोन औन फोन...

 ऐ साहुकार, तु कर न 

वसूली की तकरार,

मुझे दिए हुए लोन पे,


मन्ने तो मांगा नी था,

लोन देने का कौल 

तेरा ही आया था 

भैया, 

मेरे फोन पे ।

Friday, November 6, 2020

इतना न इतराओ...

जब हम न होंगे, 

मायूस तो तुम अवश्य होंगी 

हमें खोकर ।

जीवन मे पग-पग,

बिंदास हमें लगने वाली ऐ, 

हर एक ठोकर ।।

Monday, October 26, 2020

चुनौती..

हिम्मत है तुझमें तो तू निकल के दिखा, 

मुख से, पेट से, दांतों या फिर आंखों से,

ऐ मेरे दर्द, अब तू बच नहीं सकता, क्योंकि

मैने तुझे बांध दिया है, जिंदगी की सलाखों से।

Tuesday, October 13, 2020

नाम चीन-अनाम पाक।

दुआ है कि इसीतरह फूले-फले व्यवसाय तुम्हारा,

ऐ तमाम दौरा-ए-कोरोना, कफन बेचने वालों,

मगर, कुछ कतरा-ए-कफ़न अपने लिए भी सम्भाले रखना,

क्या पता, कब इसकी जरूरत, तुम्हें भी आन पडे।



Sunday, September 27, 2020

आओ, तुमको कथा सुनाऊं

मोदीजी सुनाते मन की बात, 

और मैं मन की व्यथा सुनाऊंं, 

सुनो ऐ प्यारे हिन्द वासियों,

आओ, मैं तुमको कथा सुनाऊं।


एक सूखी डंठल, जड़ मजीठ का,

किंतु, कथावाचक हूँ व्यास पीठ का,

छै महिने लॉकडाउन, बंद कमरे मे

कितना इस मन को मथा सुनाऊं।


बताओ, वाचन करुं मैं शुरू कहाँ से,

राजा यथा सुनाऊं या प्रजा तथा सुनाऊं?

सुनो ऐ प्यारे हिन्द वासियों,

आओ, मैं तुमको कथा सुनाऊं।।


Friday, September 25, 2020

अचम्भा।

जबसे अकृत्यकारी चीन के कोरोना जी ने

तमाम दुनिया को फांसा हैं,

शायद आपने गौर किया हो,

केजरीवाल जी एक बार भी नहीं खांसा है।😂😂


Monday, September 21, 2020

कोरोना- भ्रम








हमने चेहरे पे मास्क क्या लगाया 'परचेत',  

कुछ नादां  हमें बेजुबांं समझ बैठे,

फितरतन, चुप रहने की आदत तो न थी, 

क्या करे, बेवश थे चीनी तोहफे़ के आगे।

Sunday, September 20, 2020

कोरोना विडंबना

 गले लगाया है तेरी जुल्फो़ंं की मोहब्बत ने, 

जबसे तन्हाइयों को,

 गाहक मिलने ही बन्द हो गये, 'परचेत' 

तमाम शहर के नाइयों को।

Saturday, September 12, 2020

मुखबंदी

 चम्मचे-ए-खास अभी अभी गये,

मुंह खोला तो गुलाम नबी गये।।😀😀

Thursday, September 10, 2020

कोरी ऐंठन

 हो चाहे जितनी भी मुहब्बत 

तुझको संजय रौत से,

करे जितनी भी नफ़रत 

तू कगंना रणौत से, 

देखना,सत्ता का ये गुरूर, 

तुम्हें ले डूबेगा हुजूर ।

Sunday, September 6, 2020

परिचित, आज फिर मिलने कुछ शामें आई थीं।








निकले थे दिनकर इंद्रप्रस्थ से

और सांझ उनकी गुरुग्राम गई,

गुम, कुछ वाहियात सी ख्व़ाहिशे,

आडे-तिरछे जिन्हें बुना था कभी,

चुस्त एकाकीपन की सलाइयों से,

ढूंढते हुए उन्हें इक और शाम गई।



xxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

पद्य पर गजब का नशा था जमाने मे,

और मै व्यवस्थ रहा, गद्य सजाने मे।





Saturday, August 29, 2020

एक लघु मगर जरूरी पोस्ट- अभी सोने का नहीं, लुडक जाओगे।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है, आपको याद होगा शेयर बाजार जब इक्तालिस हजारी थे तो 55 हजारी की बात की जा रही थी और कर कौन रहे थे ? बाजारू गिद्ध। फिर क्या हुआ ? 41 हजारी 30 से भी कहीं नीचे आ लुडका। अब भला , दोष कोरोना का ही क्यों न रहा हो।

बस, इस संक्षिप्त पोस्ट के मार्फत आपको यही चेताना है कि वही स्थिति आज  बुलियन मार्केट की है। दलाली गिद्धों ने तात्कालिक फायदे के लिए इसे चढाया हुआ है, बहुत आवश्यकता के अलावा इसमे न उल्झें।

नीचे दो चित्र चस्पा किए हैं उनसे स्थिति को समझने की कोशिश करें।




Thursday, August 27, 2020

यह मोड...







कभी लगा ही नहीं,

फासला-ए-मोहब्बत,

शब्दों की मोहताज रही हो,

प्रेम सदा ही प्रबल रहा, 

बात वो कल की हो, 

या फिर आज रही हो।

तुम्हीं बताओ, बीच हमारे

दूरियों के दरमियाँ,

कुछ गलत एहसास तुमको

होने दिया हो हमने,

बावजूद इसके कि कभी 

तबीयत भी नासाज रही हो।।

Friday, August 21, 2020

ऐ जिंदगी।

ऐ जिंदगी बता,
तूने क्यों ये गजल छेडी,
इन बदरंग सफो़ंं मे,
हम तो जिये ही जा रहे थे तुझको, 
हर पल हसींंन लम्हों मे,
दफाओं की दरकार तो सिर्फ़, 
शिकायतों को हुआ करती है,
हमने तो कभी सोचा ही नहीं, 
नुक्शानों मे जिए कि नफ़ोंं मे।

ऐ जिंदगी, मुझको अब इतना भी मत तराश कि 
बदन की दरारें, नींद मे खलल का सबब बन जांए।







Tuesday, August 18, 2020

बेवफा ख्वाहिशे

 


इतनी संजीदा जे बात तुमने, 
गर यूं मुख़्तसर सी न कही होती,
मिलने को हम तुमसे, 
मुक्तसर से अमृतसर पैदल ही चले आते।

Sunday, August 16, 2020

सरकारों की नासमझी और प्रशासन की अकर्मण्यता का खामियाजा भुगतने को मजबूर पहाड़ी।

 01 अप्रैल 1973 को बंगाल टाइगर्स को बचाने की मुहिम के तहत तत्कालीन इंदिरा सरकार ने टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किया था। मकसद यही था कि तेजी से लुप्त होती जा रही बंगाल टाइगर की आबादी को संरक्षित किया जाये, किंतु भ्रष्टाचार से ग्रसित सिस्टम के तहत कोई खास सफलता हासिल न हुई।

परिणाम स्वरूप, २००६ मे, जब श्रीमती सोनिया गांधी की सरकार सत्ता मे थी , टाइगर्स की की गई गिनती मे टाइगर्स की आवादी मात्र १४११ रह गई। 

फिर शुरू हुआ सरकार, नौकरशाहों और तथाकथित पर्यावणविदों द्वारा अपनी अक्षम्यताऔं पर पर्दा डालने का सिलसिला। विभिन्न स्थानों से बाघ, तेंदुए इत्यादि मांसाहारी प्राणी एक वन से दूसरे वनों को स्थानांतरित किये गये और ऐसे ही बहुत से हिंसक प्राणी उत्तराखंड के जंगलों मे छोड दिए गये।

मगर, बुद्धि से पैदल ये ज्ञानी लोग यह भूल गये कि जिन मांसाहारी प्राणियों को वे उत्तराखंड के जंगलों मे छोड रहे हैं,उनके पोषण की इन्होंने क्या व्यवस्था की है। होना ये चाहिए था जिस वक्त एक निश्चित संख्या मे हिंसक जन्तुओं को उत्तराखंड के जंगलों मे छोडा गया था, उसके छह गुना तादाद मे अहिंसक जीवों जैसे पहाड़ी हिरन और अन्य पहाड़ी जीवों को भी इन वनों मे छोडा जाता ताकि ये हिसंक प्राणी अपने उपभोग का म़ांंस इन जीवों से प्राप्त कर सकें मगर बडा सवाल ये कि अपना घर भरने से फुर्सत किस सर

कारी महकमे को थी?

नतीजन, वनों मे जो भी अहिंसक प्राणी सीमित संख्या मे थे, वो सब हिंंसक प्राणियों का निवाला बन चुके और अब सारे हिंसक प्राणी जैसे, बाघ तेन्दुए गांवो की ओर रुख करने को मजबूर हो गये। यही कारण है कि जिस बाघ ने ११ अगस्त को श्रीनगर के समीप मलेथा गांव मे तीन बहनों मे से एक को अपना निवाला बनाया था, वही, सुप्त प्रसाशन का लाभ उठाते हुए.१५ अगस्त को मलेथा गाँव के ही एक स्कूल मे झंडारोहण को भी पहुंच गया और ग्राम प्रधान सहित कई को घायल कर गया।

-पीसी गोदियाल


लगता नहीं है दिल मेरा, इन उजडी हुई दीवारों मे

 














लगता नहीं है दिल मेरा,
इन उजडी हुई दीवारों मेंं,
दम घुटता है कभी-कभी, 
भीत के बंद कीवारों मेंं।

सजर खामोश,पता ना चले,
कब दिन उगे, कब ढले,
कब नमी थी, कब शुष्कता,
समीप से गुजरी बहारों मेंं।

दम घुटता है कभी-कभी, 
भीत के बंद कीवारों मेंं।।

मंजर हसीं हो तो क्या सही,
दफ्ऩ दिल मे ही हैं बाते कई,
मुसाफिर बहुत हैं राह मे मगर,
बंद हैं सभी अपने दयारों मे।

दम घुटता है कभी-कभी, 
भीत के बंद कीवारों मेंं।।

एक ही चमन के सभी अनजाने,
यूंही पल-पल गुजरे, गुजरे जमाने,
जाने, कब, कौन, कहां खप गया,
इस गली उस गली, पास बाजारों में।

दम घुटता है यहां हरदम, 
भीत के बंद कीवारों मेंं।।

Saturday, August 15, 2020

पावन पर्व


आप सभी ब्लौगर मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की मंगलमय 

                                शुभकामनाएं।🙏


Wednesday, August 12, 2020

अभी जाना तो नहीं चाहते थे वे इस दौर से, राहत न मिली तो जाना पडा इंदौर से।

भांति-भांंति के हुरी ख्वा़ब, 

मन मे लेकर इंदौर से 

झूमते हुए निकले थे जो कल,

जन्नत फुल होने की वजह से,

सुना है, उन्हें खुदा के  किसी

'राहत' कैंप मे ठहराया गया है,बल ।

Friday, August 7, 2020

दोष

मालूम था हमको,वो बुरी चीज है,

जिसे पीती है दुनियांं बडे नाज से,

मगर, ऐ साकी, बर्बाद हम यूं हुए,

कुछ तेरे पिलाने भर के अन्दाज से।



Wednesday, August 5, 2020

देवनगरी,"अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"














जन्मस्थली मुक्त हो गई, दैत्य कारावास से,
श्रीराम लौटेंगे अवध, आज फिर वनवास से।

दीपों से जगमगा उठे हैं, निर्मल सरयू के तट,
सजने लगे फिर दोबारा,अयोध्या के सूने पट।

गूंज रहा देश कौशल,'श्रीराम' के जयघोष से,
मुक्त होगी शीघ्र दुनिया,व्याधि,संताप दोष से।

हासिल करेंगे रामराज, दुष्टजनों के नाश से,
श्रीराम लौटेंगे अवध, आज फिर वनवास से।
                                          






Tuesday, August 4, 2020

मैं क्या बोलूं ?

धर्म-ईमान,
मालूम है, 
यहां सबकुछ,
टके-सेर बिकता है,
और जो खरीददार,
वो वैंसा है नहीं, 
जैंसा दिखता है।

Sunday, August 2, 2020

गजब।

ऐ खुदा, 
क्या लॉकडाउन की वजह से,
बंद हो गई है तेरी चक्की भी,
सैनेटाइजेशन की हद तो देखो,
दाम अलग किंंतु स्वाद एक जैसा
दे रही, कच्ची और पक्की भी।
अब तो हैरानगी यह देखकर और बढने लगी है कि
सोशल-डिस्टेंसिग बरत रही, मेरे गांव की मक्की भी।।😀






Tuesday, July 28, 2020

आरजू

गर सुधार न हो पाये तो
 तुम माफ कर देना,
हर उस किये को,
कसूर चाहे बाती का हो
या तेल की गुणवत्ता का,
नहीं मालूम, मगर तुम
दोष मत देना, दीये को।

Sunday, July 26, 2020

व्यथित राग।














न जाने, क्यों अजनबी सा लगने लगा
अपना ही घर आजकल,
कुछ ज्यादा ही म़जहबी हो गया शायद, 
बेगानोंं का ये शहर आजकल।

झूमते निकल जाया करते थे बेपरवाह

मदमस्त जिस गली से कभी
मुश्किलों भरी सी लगने लगी है नाज़नीं, 
अल्हड सी वो डगर आजकल।

गलतफहमियों की बस्ती मे जो 
पाली थी थोडी सी खुशफहमियां,
न जाने कहाँ गुम होकर के रह गई, 
उल्फ़त की वो नजर आजकल।

वसंती खुशियों का सबब मिलता था 

जिनसे, पत्थरों के शहर को,
जेठ मे भी पातियों से ओंस टपका रहे,
बलखाते वो शजर आजकल।

उजड रहे क्रुर वक्त की आंंधियों मे

बसे हुए कुटुम्ब के कुटुम्ब सारे,
उत्कर्ष के इस चरम पर 'परचेत',
हो रहे कुल-कुनबे, दरबदर आजकल।

आरज़ू

मंजूर तेरी हर ख्वाहिश, भले ही तू मेरे पास मत रहना, बस, इतनी सी आरज़ू है , अकेले तू उदास मत रहना।